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पवित्रता- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Purity’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

 

 

पवित्रता

 

मेरे जीवन के प्राण, मैं हमेशा अपने शरीर को पवित्र रखने का प्रयास करूंगा,
यह जानते हुए कि आपका जीवंत स्पर्श मेरे सभी अंगों पर मौजूद है।

 

मैं सभी असत्यों को अपने विचारों दूर रखने का प्रयास करूंगा, यह जानते हुए कि
आप ही वह सत्य हो, जिसने मेरे मन में औचित्य का प्रकाशमान दीप जलाया है।

 

मैं सभी बुराइयों को अपने हृदय से दूर भगाने का प्रयास करूंगा और अपने प्रेम को
पुष्पित रखूंगा, यह जानते हुए कि आप मेरे हृदय के आसन पर विराजमान हो।

 

और मैं हमेशा प्रयत्नशील रहूंगा कि, आपकी मेरे कार्यों के माध्यम से अभिव्यक्ति हो,
यह जानते हुए कि आप ही मुझे कार्यशील रहने की शक्ति प्रदान करते हो।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Purity

 

Life of my life, I shall ever try to keep my body pure, knowing
that thy living touch is upon all my limbs.

 

I shall ever try to keep all untruths out from my thoughts, knowing
that thou art that truth which has kindled the light of reason in my mind.

 

I shall ever try to drive all evils away from my heart and keep my
love in flower, knowing that thou hast thy seat in the inmost shrine of my heart.

 

And it shall be my endeavour to reveal thee in my actions, knowing it
is thy power gives me strength to act.

 

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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कोरोना के खतरे के बीच!

आजकल दुनिया भर में फैली कोरोना की महामारी, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में  आज के वातावरण के बारे में कुछ बात करने का मन है। यह एक ऐसा वातावरण है, जिसका अनुभव मुझे तो अपने जीवन-काल में कभी नहीं हुआ है। ऐसी महामारी जो पूरी दुनिया में बुरी तरह फैली है और जिसका प्रसार भी इतनी तेजी से होता है कि ऐसा उदाहरण कोई दूसरा ध्यान में नहीं है।

 

 

चीन से प्रारंभ हुई इस महामारी के दुनिया पर पड़े प्रभाव को देखते हुए, भारतवर्ष में इसके लिए ऐसे उपाय किए गए जिन्हें काफी प्रभावी कहा जा सकता है, परंतु ये देश इतना बड़ा है, इतनी जटिलताएं हैं यहाँ कि कोई भी उपाय प्रभावी रूप से लागू करना संभव नहीं है।

आज हमने अपने देश को पूरी दुनिया से काट लिया है, जैसा कि अनेक देशों ने किया हुआ है, विदेशों से भारतीय लोगों को भी यहाँ लाया गया, सभी जगह लॉकडाउन को प्रभावी रूप से लागू करने का प्रयास किया गया है। सभी स्कूल, कॉलेज, दफ्तर आदि बंद हैं, लोग ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे हैं, जहाँ संभव है। ये सब संभावना है कि व्यापार को, हमारी और पूरी दुनिया की इकॉनोमी को गंभीर नुकसान होगा, वो सब देखा जाएगा बाद में, लेकिन पहले लोगों को इस महामारी से बचाना है। सबसे बड़ी समस्या है उन दैनिक मजदूरों की जो रोज कुंआ खोदते है और रोज पानी पीते हैं। उनके जो नियोजक हैं, उनसे अनुरोध किया गया है कि वे उनको वेतन आदि दें, लेकिन असंगठित क्षेत्र में यह सुनिश्चित करना लगभग असंभव है।

दिल्ली में मैंने देखा है, गुड़गांव बॉर्डर के पास और अन्य स्थानों पर भी, दैनिक मजदूर इस प्रकार रहते हैं जैसे पिंजरे में, एक कमरे में 2-3 से लेकर 7-8 लोग तक, वे लोग आज के समय में ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का पालन तो अपने कमरों में रहते हुए भी नहीं कर सकते। उन लोगों पर इस लॉक आउट का सबसे ज्यादा असर पड़ा, क्योंकि उनके नियोजक उनको इस हालत में कुछ नहीं देने वाले। सरकार द्वारा जो व्यापक पहल की गई है उसका भी उनको शायद ठीक से संदेश नहीं पहुंच पाया और अचानक भारी भीड़ दिल्ली से और अन्य महानगरों से पैदल ही निकल पड़ी; उनके लिए बीमारी से ज्यादा बड़ा सवाल भूख का था। देखिए अब कितनों को प्रशासन के लोग रोक पाते हैं, जहाँ भी शेल्टर होम में उनको रखा जा सके।

वैसे लॉक डाउन को इस भगदड़ ने भारी नुकसान पहुंचाया है और इससे हमारे प्रयासों पर काफी बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

यही कामना है कि हमारे सम्मिलित प्रयास इस महामारी पर विजय पाने में सफल होंगे और वे लोग जो ऐसे में सामूहिक रूप से पलायन कर रहे हैं और वे लोग जो कोरोना के मरीजों को कहीं भी छिपाकर इस समस्या को और गंभीर बनाने में योगदान कर रहे हैं, उनसे अनुरोध है कि यह देशद्रोह ही नहीं मानवता के साथ अन्याय है।

इन परिस्थितियों में हमारे चिकित्सक, पुलिस और सेना, अर्धसैनिक बलों के जो लोग जनहित में अपनी ड्यूटी कर रहे हैं और मीडियाकर्मी आदि-आदि, जो भी लोग अपनी जान को जोखिम में डालकर अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं, वे आदर के पात्र हैं। मैंने कहीं पढ़ा था आज दुनिया में जितने कोरोना पीड़ित हैं, उनमें से लगभग 15% स्वास्थ्य कर्मी हैं। वे विशेष रूप से हमारे लिए आदरणीय हैं।

आइए हम सभी मिलकर आज इंसानियत के दुश्मन के रूप में उभरकर आई इस कोरोना महामारी को परास्त करें।

 

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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आज सड़क के जीव उदास हैं!

आज बाबा नागार्जुन जी की एक प्रसिद्ध कविता याद आ रही है- ‘अकाल और उसके बाद’। इस कविता में अकाल के प्रभाव को बड़े सुंदर तरीके से दर्शाया गया है। जब घर में चूल्हा जलता है तब केवल घर के मानव सदस्य ही तृप्त नहीं होते अपितु ऐसे अनेक जीव भी भोजन पाते हैं, जिनमें से कुछ पर तो हमारा ध्यान जाता है और कुछ पर नहीं।

आजकल दुनिया में जो कोरोना की महामारी फैली है, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में यह भी हुआ है कि हमने खुद को अपने घरों में बंद कर लिया है। मानव समाज की रक्षा के लिए यह एक प्रभावी कदम लगता है, लेकिन हम देखते हैं कि जब हम बाहर निकलते हैं, तब वहाँ भी अनेक ऐसे जीव हैं जिनका पेट हमारे कारण ही भरता है। कुछ के सामने तो हम स्वयं खाने के लिए कुछ डाल देते हैं और कुछ को हमारे खाने-पीने की गतिविधियों के परिणामस्वरूप कुछ मिल जाता है। आजकल सड़कों पर वे प्राणी, मैं यहाँ श्वान अथवा सड़क के कुत्तों और गायों का तो ज़िक्र कर ही सकता हूँ, वैसे तो अनेक जीव हैं, हम जहाँ चाट ठेले पर, चाय की दुकान या रेस्टोरेंट में कुछ खाते-पीते हैं, तब हम इनके आगे कुछ डालें य न डालें, इनको कुछ मिल ही जाता है। आजकल वे कितनी आस से देखते होंगे, यही खयाल आता है।

 

 

खैर मानव-जाति को इस महामारी से शीघ्र छुटकारा मिले, इस कामना के साथ, लीजिए प्रस्तुत है इससे बिल्कुल अलग परिस्थिति की यह कविता, जिसमें घर के भीतर के प्राणी अभाव झेलते हैं, जबकि आजकल इसका सामना बाहर के प्राणी इस अभाव का सामना कर रहे हैं, कोरोना की महामारी जल्द दूर हो यह इन मूक प्राणियों के लिए भी अच्छा रहेगा।

लीजिए प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन जी की यह कविता-

 

अकाल और उसके बाद

 

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिन तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।

 

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।

 

मानव मात्र की भलाई के लिए और विशेष रूप से भारत में सड‌क के जीवों के लिए भी यह कामना है कि इस दुष्ट रोग का शीघ्र नाश हो।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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पर अपने सपनों को पंख कब मिले!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

बहुत सी बार ऐसा होता है कि कोई कविता शुरू करते हैं, कुछ लाइन लिखकर रुक जाते हैं। फिर आगे नहीं बढ़ पाते, लेकिन वो लाइनें भी दिमाग से नहीं मिट पातीं।

कविता की ये पंक्तियां, कभी दीपावली के आसपास ही लिखी थीं। बहुत साल पहले, कब, ये याद नहीं है। पंक्तियां इस तरह हैं-

हम भी अंबर तक, कंदील कुछ उड़ाते
पर अपने जीवन में रंग कब घुले।
हमको तो आकर हर भोर किरण
दिन का संधान दे गई,
अनभीगे रहे और बारिश
एक तापमान दे गई।
आकाशी सतहों पर लोट-लोट जाते,
पर अपने सपनों को पंख कब मिले॥

आज, अचानक ये अधूरा गीत याद आया, तो सोचा कि इसको भी यहाँ, अपनी डिजिटल स्मृतियों में स्थापित कर दूं।

अब अपना ये पुराना, अधूरा गीत साझा करने के बाद, जगजीत सिंह जी की गाई, कैफी साहब की लिखी एक लोकप्रिय गज़ल के एक दो शेर याद आ रहे हैं, वो भी शेयर कर लेता हूँ-

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,
क्या गम है जिसको छिपा रहे हो।
आंखों में नमी, हंसी लबों पर,
क्या हाल है, क्या दिखा रहे हो।
बन जाएंगे ज़हर पीते-पीते
ये अश्क़ जो पीते जा रहे हो।

शायद ज़िंदगी में ऐसा तो चलता ही रहता है, कोई कैफी साहब जैसा शायर उसको इतनी खूबसूरती से बयां कर देता है।
आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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केवल कीं नंगी अठखेलियाँ हवा ने!

एक बार फिर से मैं अपने एक प्रिय कवि-नवगीतकार रहे स्व. रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।हूँ। यह गीत रंजक जी के 1969 में प्रकाशित हुए नवगीत संकलन ‘हरापन नहीं टूटेगा’ से लिया गया है।

आजकल दुनिया में जो कोरोना की महामारी फैली है, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में अचानक यह गीत भी, जो जीवन की नश्वरता को रेखांकित करता है, याद आ रहा है, अक्सर बार ऐसा भी होता है ना कि कोई व्यक्ति अंतिम सांस लेने से पहले किसी प्रियजन से मिलने के लिए बहुत बेचैन होता है। लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

 

 

एक लतर सपने के आतुर आधार के लिए,
मन के संसार के लिए।
जैसे रोगी सूने गाँव में पुकारे,
साधे हो साँस
किसी नाम के सहारे,
वैसे ही एक उमर पुतलियाँ उघारे,
आकुल उपचार के लिए।
छाया तक साथ नहीं बैठी सिरहाने,
केवल कीं नंगी
अठखेलियाँ हवा ने,
एक लचर मृग-तृष्णा लाँघ कर सिवाने,
प्यासी आकार के लिए।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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मरण बाद मैंनू सजा के चलणगे!

आज फिर से एक पंजाबी गीत शेयर कर रहा हूँ, यह गीत भी श्री शिव कुमार बटालवी जी ने लिखा है, वैसे इसे लोक गीत भी कहा जाता है, संभवतः कुछ लोग लोक मन से इतना जुड़ जाते हैं कि उनके गीत को समाज अपना लेता है। इस गीत को श्री आसा सिंह मस्ताना जी ने गाया था और बचपन में मैंने अनेक बार इस गीत को सुना है।

लीजिए प्रस्तुत है ये गीत, आजकल दुनिया में महामारी फैली है, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में अचानक जीवन की नश्वरता और दुनियादारी के ढोंग को दर्शाने वाला यह गीत याद आ रहा है, लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

जदों मेरी अर्थी उठा के चलणगे,
मेरे यार सब हुम हुमा के चलणगे

 

चलन गे मेरे नाल दुश्मन वी मेरे,
ए वखरी ए गल, मुस्कुरा के चलणगे

 

जींदे जी मैं पाइयां तन उत्ते लीरां,
मरण बाद मैंनू सजा के चलणगे

 

जिन्हा दे मैं पैरां ते रुलदा रह्यां हाँ,
ओ हात्थां ते मैंनू उठा के चलणगे

 

मेरे यार मोडा वटावन बहाने,
तेरे दर ते सजदा करा के चलणगे

 

बिठाया जिन्हा नू मैं पलकां दी छावें,
ओह बल्दी होइ आग ते बिठा के चलणगे

 

जदों मेरी अर्थी उठा के चलणगे,
मेरे यार सब हुम हुमा के चलणगे

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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मैं तैनू पीना के तू मैंनू पीनी?

आज एक अलग तरह का गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे ज़नाब गुलाम अली जी ने अनोखे अंदाज़ में गाया है। श्री शिव कुमार बटालवी जी ने इस गीत को लिखा है।

अक्सर कवि-शायर लोग शराब की तारीफ में बहुत सी कविताएं और गीत लिखते हैं। आज का यह गीत शराब के वीभत्स रूप को प्रदर्शित करता है। यह भी सच्चाई है कि अमीर लोग ज्यादातर गुणवत्ता वाली शराब पीते हैं, ज्यादातर लिमिट में पीते है और उसका आनंद लेते हैं।

ज्यादातर गरीब ही सस्ती शराब की लत के शिकार होते हैं और उनके परिवारों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ता है। लीजिए प्रस्तुत हैं इस पंजाबी गीत के बोल-

 

 

दस नी शराब दी ए बोतल-ए-कमीनी!
मैं तैनू पीना के तू मैंनू पीनी?

 

कुछ ते गमां ने मेरे दिल नू उजाड़ेया,
कुछ तेरे नशे मेरी जिंदड़ी नू सारेया,
कख वी न रेह्या पल्ले, धाधिये शौकीनी!
मैं तैनू पीना के तू मैंनू पीनी?
दस नी शराब दी ए बोतल-ए-कमीनी!

 

मिलेया ना प्यार ते मैं तैनू गले ला लेया!
भुलेया ना पहला गम, दूजा पल्ले पा लेया।
दोवां गम विच मेरा डूबना यकीनी।

 

दस नी शराब दी ए बोतल-ए-कमीनी!
मैं तैनू पीना के तू मैंनू पीनी?

 

लुक्के होये दुख मेरे कोई ना पिछानदा,
जिदे लायी मैं रुलेया, शराबी ओह वी जानदा,
मेरे लायी ते आज सारी दुनिया नबीनी।

 

दस नी शराब दी ए बोतल-ए-कमीनी!
मैं तैनू पीना के तू मैंनू पीनी?

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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चेहरा है जैसे झील मे हँसता हुआ कंवल!

जैसा कि मेरे नियमित पाठक जानते होंगे, मुकेश जी मेरे परम प्रिय गायक हैं, जब मैं फिल्मी गीत शेयर करता हूँ तब सबसे पहले मेरा ध्यान मुकेश जी के गाये हुए गीतों की ओर जाता है, इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य गायकों के प्रति मेरा उतना सम्मान नहीं है। ऐसे भी लोग हैं जो जब पुराने गीतों की बात करते हैं तब उनको मुकेश जी का नाम लेने में ही संकोच होता है।

हाँ जी अपनी-अपनी पसंद है। खैर आज मैं रफी साहब का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, मुझे रफी साहब के भी बहुत सारे गीत प्रिय हैं, पहले भी कुछ गीत शेयर किए हैं मैने उनके। आज का यह गीत 1960 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘चौदहवीं का चांद’ से है, शकील बदायुनी जी के लिखे इस गीत को रफी साहब ने रवि जी के संगीत निर्देशन में गाया था।

इस गीत में शकील साहब ने सौंदर्य की बहुत सुंदर उपमायें दी हैं और रफी साहब ने इसे बड़े सुरीले अंदाज़ में गाया है। लीजिए प्रस्तुत है यह अमर प्रेम गीत-

 

 

चौदहवीं का चाँद हो, या आफ़ताब हो,
जो भी हो तुम खुदा की क़सम, लाजवाब हो।
चौदहवीं का चाँद हो।

 

ज़ुल्फ़ें हैं जैसे काँधों पे बादल झुके हुए,
आँखें हैं जैसे मय के पयाले भरे हुए,
मस्ती है जिसमें प्यार की तुम वो शराब हो।
चौदहवीं का चाँद हो।

 

चेहरा है जैसे झील मे हँसता हुआ कंवल,
या ज़िंदगी के साज़ पे छेड़ी हुई गज़ल,
जाने बहार तुम किसी शायर का ख़्वाब हो।
चौदहवीं का चाँद हो।

 

होंठों पे खेलती हैं तबस्सुम की बिजलियाँ,
सज़दे तुम्हारी राह में करती हैं कहकशाँ,
दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का तुम ही शबाब हो,
चौदहवीं का चाँद हो, या आफ़ताब हो
जो भी हो तुम खुदा की क़सम, लाजवाब हो।
चौदहवीं का चाँद हो।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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Testing times for the human race!

We often learn from our scriptures, in the preachings and poetry of our Saints that it is our miseries which teach us the most effective lessons. I remember a famous poetry piece I think it is written by Goswami Tulsidas Ji, which says- ‘Sukh ke maathe sil pare, naam hriday se jaaye, balihari ya dukh ki, pal-pal naam rataaye’. It means ‘Let the happiness be hit by stones, since it makes us forget our God, I admire the grief, since it makes us remember God, again and again.

 

Yes it is true that when we face some miseries, when we are aggrieved and are unable to find a way to come out of that, then we remember the almighty, make prayers again and again. sometimes individuals face such miseries and sometimes, like it is now the community faces a misery which we know as epidemic or Pandemic, depending on its area of spread.

We know there are some diseases spread through mosquitoes or Viruses, which spread in some parts of the world, there are many casualties in some parts of the world. But the spread of virus based disease in almost whole of the world, with so many casualties everywhere, is something we have not seen in our life time. It does often happen that we defy safety instructions, related to health and feel that we can face it by ourselves, but this virus is a very serious threat to the human society.

Recently a famous Indian lady singer- Kanika Kapoor came back from London and attended several parties, where she sang before many VIPs in Lucknow etc. Later she was found to be Corona positive and it was felt that through her the disease might have traveled up to the parliament and Rashtrapati Bhawan also. However some prominent leaders who got themselves examined were found free from the disease, not sure if some other people may have got affected by it.

What we are finding now is that this disease may not have the death rate like some other diseases, but it spreads very fast and if we do not observe social-distancing, it might travel miles and miles very fast.

Almost all the affected countries have converted themselves into fortresses; they have cut themselves from rest of the world, cancelling all flights. It is such a dreaded disease, spreading so fast that we can’t claim ourselves to be having wonderful immunity and anybody might get affected by it if proper care is not taken.

By God’s grace the spread has not been so severe in India, like that in Italy, USA etc. after the origin of this disease in China. I can say one thing that India has taken a very good care of its citizens who were stranded in other countries which were having more serious threat of this disease and we are now adopting very strict measures, which started by one day Janta curfew as suggested by Modi Ji and several state governments have declared lock-down in many districts, cancelled trains and buses, since this disease travels much faster than us through them.

Yes we all like to socialize, travel as per our desire, but at present it is more important to remain safe by remaining indoors, we can do all other things like travelling, eating out, going to malls and cinema halls, once we win over this massive challenge before our country, society and the human race.

The spread of this deadly disease which has claimed  thousands of lives all over the world and taken millions of people in its grip, has posed a massive challenge before the human race and we all need to come together, follow the instructions of medical professionals and our leaders and get ourselves tested if there is any doubt at all.

These are the testing times for the humanity and all the governments and we as citizens need to be very cautious, vigilant and not take any risks. We may have to remain indoors for some time to enjoy later.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt – What lesson do you think the world should learn from the Corona virus disease (COVID-19)? #CoronaLesson .

Thanks for reading.

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ज्ञानेंद्रियां- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Senses’ का भावानुवाद-

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

ज्ञानेंद्रियां

 

मुझे नहीं लगता कि सन्यास से मुझे मुक्ति मिल सकती है।
मुझे आनंद के हजारों बंधनों में स्वतंत्रता के आलिंगन का अनुभव  होता है।

 

आप मेरे लिए छलका दो अपनी मदिराएं- अनेक रंगों, गंधों के स्वरूपों में,
जिससे मेरा यह मिट्टी का प्याला पूरी तरह भर जाए।

 

मेरी दुनिया, आपकी इस लौ से सैंकड़ों विविध रंगी दीप प्रज्ज्वलित कर लेगी
और उनको आपके मंदिर में मूर्ति के सामने सजा देगी।

 

नहीं, मैं अपनी ज्ञानेंद्रियों के द्वार कभी बंद नहीं करूंगा
दृश्य, ध्वनि और स्पर्श के आनंद में, आपका आनंद प्रतिध्वनित होगा।

 

हाँ, मेरे सभी भ्रम, प्रसन्नता के प्रकाश में नष्ट हो जाएंगे,
और मेरी सभी अभिलाषाएं प्रेम के फल का स्वरूप ग्रहण कर लेंगी।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Senses

 

Deliverance is not for me in renunciation.
I feel the embrace of freedom in a thousand bonds of delight.
Thou ever pourest for me the fresh draught of thy wine of various
colours and fragrance, filling this earthen vessel to the brim.
My world will light its hundred different lamps with thy flame
and place them before the altar of thy temple.
No, I will never shut the doors of my senses.
The delights of sight and hearing and touch will bear thy delight.
Yes, all my illusions will burn into illumination of joy,
and all my desires ripen into fruits of love.

 

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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