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पथ ही मुड़ गया था – डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन

हिंदी साहित्य का भंडार इतना वृहद है, एक से एक श्रेष्ठ कवि हमारे देश में हुए हैं, जिन्होंने साहित्य में अपना अमूल्य योगदान किया है। कुछ कवि हमें व्यक्तिगत रूप से ज्यादा अच्छे लगते हैं, हम उनकी रचनाओं को अक्सर याद करते हैं लेकिन कितने ही मां भारती के सपूत हैं, जिनको हम भूल जाते हैं।

आज मैं डॉ. शिव मंगल सिंह सुमन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, जिनका रचना-कोश भी अद्वितीय है, अपने समय में वे अक्सर काव्य-मंचों की अध्यक्षता किया करते थे। लीजिए प्रस्तुत है उनकी एक सुंदर रचना-

 

 

मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
पथ ही मुड़ गया था।

 

गति मिली मैं चल पड़ा
पथ पर कहीं रुकना मना था,
राह अनदेखी, अजाना देश
संगी अनसुना था।
चांद सूरज की तरह चलता
न जाना रात दिन है,
किस तरह हम तुम गए मिल
आज भी कहना कठिन है,
तन न आया मांगने अभिसार
मन ही जुड़ गया था।

 

देख मेरे पंख चल, गतिमय
लता भी लहलहाई
पत्र आँचल में छिपाए मुख
कली भी मुस्कुराई।
एक क्षण को थम गए डैने
समझ विश्राम का पल
पर प्रबल संघर्ष बनकर
आ गई आंधी सदलबल।
डाल झूमी, पर न टूटी
किंतु पंछी उड़ गया था।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

*****

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