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मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला!

आज गुलाम अली साहब का गाया हुआ एक गीत याद आ रहा है, जिसे 1990 में रिलीज़ हुई फिल्म- आवारगी में फिल्माया गया था, गीत को लिखा है- आनंद बक्षी जी ने और संगीत अनु मलिक जी का है। कुल मिलाकर यह गीत गुलाम अली जी ने बड़े सुंदर ढंग से गाया है और बहुत सुंदर बन पड़ा है।

गीत में जो कहा गया है वह तो स्पष्ट है ही कि किसी मनुष्य का पूरा जीवन, उसके सभी गुण कभी-कभी उसकी आवारगी की भेंट चढ़ जाते हैं। लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

 

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला,
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला।

 

बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते हैं,
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं,
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ,
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ,
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है,
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है,
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था,
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था,
मुझे तक़दीर ने, तक़दीर का मारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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2 replies on “मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला!”

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