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अंतरतम में स्थित वह – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Innermost One’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

 

 

अंतरतम में स्थित वह

 

वही है, जो मेरे अंतरतम में स्थित है,
जो मेरे अस्तित्व को, अपने गहन, अदृश्य स्पर्शों से जागृत करता है।

 

वही है जो अपने सम्मोहन को इन आंखों में बसा देता है
और मुदित भाव से मेरे हृदय के तारों पर खेलता है
हर्ष और पीड़ा की विविध तालों के साथ।

 

यह, वही है जो अपनी माया का जाल बुनता है
स्वर्ण और रजत, नील और हरित के बेतरतीब प्रभावों के साथ,
और अपनी आसन मुद्रा में अपने चरणों को झांकने देता है,
जिनको स्पर्श करके मैं स्वयं को भूल जाती हूँ।

 

दिन आते हैं युग बीत जाते हैं,
और यह हमेशा वही होता है, जो मेरे हृदय में अनेक नामों से विचरण करता है,
अनेक वेशों में, हर्ष और विषाद के अनेक मनोभावों के बीच।
`
-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Innermost One

 

He it is, the innermost one,
who awakens my being with his deep hidden touches.

 

He it is who puts his enchantment upon these eyes
and joyfully plays on the chords of my heart
in varied cadence of pleasure and pain.

 

He it is who weaves the web of this maya
in evanescent hues of gold and silver, blue and green,
and lets peep out through the folds his feet,
at whose touch I forget myself.

 

Days come and ages pass,
and it is ever he who moves my heart in many a name,
in many a guise, in many a rapture of joy and of sorrow.

 

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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