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Big shock for Mumbai film industry!

Yesterday and today have been very shocking days for Mumbai film industry and the fans of Hindi films.

Yesterday was the day when Irfan Khan who challenged his limits in every role he played on the silver screen. From Pan Singh Tomar to English medium. He went so deep into the roles he played that it was wonderful watching his actions, dialogues and the expression through his eyes. He was among the very few actors who live in the hearts of millions of their fans.

Today was another day when the film fans were ruined through the sudden demise of Rishi Kapoor Ji, the heart throb of millions. The worthy son of great Raj Kapoor Ji and grand son of Prithviraj Kapoor Ji, he took their success story and creativity still further.

I remember an interview in which Rishi Kapoor Ji told told about the start of his film career in his early teens. He told that when he heard his father the great Raj Kapoor Ji telling his mother that would make chintoo (Rishi Kapoor) play the role of child Joker in his film Mera Naam Joker, the child Rishi Kapoor went to his room and started practicing his signatures feeling that he would then have to give autographs to his fans.

With the wonderful role in Mera Naam Joker and then the superhit romantic film Bobby, Rishi Kapoor became the heart throb of millions. He was a very popular romantic hero got married to his romantic film heroine Nitu ji and gave many memorable performances. His role in Amar Akbar Anthony and specially the song ‘Parda hai Parda’ were superb.

After the end of romantic era Rishi Kapoor Ji played many roles as a character artist and I can say that his contribution as a character artist might be more valuable than the performances as a hero.

These two stars of the film fraternity were unique in their own ways. While Irfan ji was a self made person, gained the place after great struggle, Rish ji took the family tradition forward through his hard work and devotion.

Both these great men fought with cancer, appeared to have won the battle but finally lost it.

It is really a great loss for all of us since both of them were growing stronger as artists with time.

I pay my humble tribute to both these great artists.

Thanks for reading.

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Still miles to go!

We are now entering the third stage of Lock Down. This has caused a severe loss to the human race.

We all had been part of huge gatherings for entertainment, musical festivals, film festivals etc. Now we fear coming near to another person. In some western countries situation is such that dead bodies did not find people to accompany them till the burial ground, many bodies have been carried in big trucks and buried unattended.

There is so much fear in coming near others, there was a news yesterday only that two persons who were feeding poor people and thus doing a great job, they were found Corona positive, so practically they were spreading this dreaded disease while they tried to help others.

There have been and are corona villains, who acted irresponsibly, also sometimes we find that several corona warriors who are serving the humanity get infected.

It’s a long race and I hope that together we would win this battle, would again be able to enjoy community programs and tell future generations the kind of trouble the human race faced during this period.

Let’s again be committed to defeat this dreaded pandemic.

Thanks and all the best.

….

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Forced Leave

A scene inside Heathrow airport

 

I have been sharing my blog posts since long time almost daily. it has been on one PC for last 2-3 years almost and this laptop has traveled with me to several places in India and it has traveled twice to London also.

Now suddenly this PC that I was using has developed some problems which appear beyond repair and any effective efforts to get it repaired or replaced would be possible after end of lock-down only and the other PC that I have don’t have the facility that I need for blogging, specially in Hindi.

Hence it appears that I may have to remain on forced leave for indefinite time. I am sorry for that and would try to join again as soon as possible.

Please have great time.

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भीड़ है क़यामत की, फिर भी हम अकेले हैं!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

एक हिंदी फिल्म आई थी गमन, जिसमें ‘शहरयार’ की एक गज़ल का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया गया था। वैसे यह गज़ल, आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी की घुटन, कुंठाओं आदि का बहुत सुंदर चित्रण करती है। इंसान को भीतर ही भीतर मारने वाली ऐसी परेशानियां, शहर जिनका प्रतीक बन गया है! शहर जहाँ हर कोई दौड़ रहा है, एक अंधी दौड़ में, बहुत सी बार यह भी नहीं पता होता कि कहाँ पहुंचना है, कहाँ जाकर रुकना है।

 

अब उस गज़ल को ही शेयर कर लेता हूँ, फिर आगे बात करेंगे-

सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है,
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है।

 

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढ़ूंढें,
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यों है।

 

तनहाई की ये कौन सी मंज़िल है रफीकों,
ता-हद-ए नज़र एक बियाबान सा क्यों है।

 

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में,
आईना हमें देख के हैरान सा क्यों है।

ये सब नेमतें हैं, आज के आधुनिक जीवन की, शहरी जीवन की, जिसमें हम लगातार एक दौड़ में शामिल हैं, भीड़ के बीच में हर व्यक्ति अकेला है। किसी के शेर हैं न-

ज़िंदगी की राहों में, रंज़-ओ-गम के मेले हैं,
भीड़ है क़यामत की, फिर भी हम अकेले हैं।

 

आइने के सौ टुकड़े करके हमने देखा है,
एक में भी तनहा थे, सौ में भी अकेले हैं।

ये हालात हैं, ये सच्चाइयां आज की ज़िंदगी की, ऐसे में कोई सहारा पाने के लिए, कोई सार्थकता तलाश करने के लिए, कितनी भारी संख्या में लोग बाबाओं के पीछे लग जाते हैं, वे इतने लीन हो जाते हैं अपने इस नए अवतार में, कि अगर आपको रेल या बस में मिल जाएं, तो उनका प्रयास रहता है कि लगे हाथ आपका भी कल्याण कर दिया जाए। वो आपको ऐसी ज्ञानवर्द्धक कहानियां सुनाने लगते हैं, कि उसके बाद भी यदि आपका उद्धार न हो, तो समझिए कि आपके पापों का बोझ ही शायद बहुत अधिक है, जो उनकी संगत में आने पर भी आपको सुधरने नहीं दे रहा है।

कुछ लोग राजनैतिक झंडा उठा लेते हैं, उनको लगता है कि उनका नेता ही इस देश में क्रांति लेकर आएगा। किसी का एक नेता में अपरंपार प्रेम होता है तो किसी के मन में किसी एक के प्रति असीम नफरत है।

कुछ लोग अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए धर्म की रक्षा में लग जाते हैं और वे जानते हैं कि धर्म की रक्षा के रास्ते में इंसानों की औकात क्या है, उनको तो एक इशारे पर मिटाया जा सकता है।

दिक्कत यही है कि जो लोग इन सन्मार्गों पर नहीं भटके हैं, वे परेशान रहते हैं, उनको अपने जीवन में कोई सार्थक(?) उद्देश्य नहीं मिल पाता।

मेरी संवेदना और सहानुभूति सदैव उस अकेले व्यक्ति के साथ हैं-

हजारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते,
है कौन सा वो इंसान यहाँ पर, जिसने दुःख न झेला।

नमस्कार।

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कोई सपनों के दीप जलाए!

आज फिल्म- ‘आनंद’  के लिए मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है, जो आज तक लोगों की ज़ुबान पर है। उस समय राजेश खन्ना जी सुपर स्टार थे और अमिताभ बच्चन के कैरियर को आगे बढ़ाने में इस फिल्म की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

योगेश जी के लिखे इस गीत को मुकेश जी ने सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में गाया था। आइए इसके बोलों के बहाने मुकेश जी के गाये इस अमर गीत को याद कर लेते हैं-

 

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आए,
मेरे ख़यालों के आँगन में,
कोई सपनों के दीप जलाए।

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आए।
कभी यूँ हीं, जब हुईं, बोझल साँसें,
भर आई बैठे बैठे, जब यूँ ही आँखें,
तभी मचल के, प्यार से चल के,
छुए कोई मुझे पर नज़र न आए, नज़र न आए।

 

कहीं तो ये, दिल कभी, मिल नहीं पाते,
कहीं से निकल आए, जनमों के नाते।
घनी थी उलझन, बैरी अपना मन,
अपना ही होके सहे दर्द पराये।
दिल जाने, मेरे सारे, भेद ये गहरे,
खो गए कैसे मेरे, सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने, यही तो हैं अपने,
मुझसे जुदा न होंगे इनके ये साये, इनके ये साये।

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए,
चुपके से आए।

 

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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हरी कलगी बाजरे की – अज्ञेय

आज हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद के प्रणेता और नई कविता के सूत्रधार स्व. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इस कविता में भी उन्होंने इस बात पर बल दिया है कि अब कविता में नए प्रतीकों की खोज की जानी चाहिए क्योंकि पुराने प्रतीकों का उपयोग होते-होते वे घिस गए हैं।

अज्ञेय जी एक महान कवि, कहानीकार और उपन्यासकार थे और प्रयोगवाद के प्रणेता थे, उन्होंने भाषा में अनेक प्रयोग किए और कविता को एक नया स्वरूप प्रदान किया। समय की आवश्यकताओं को देखते हुए उन्होंने भाषा के छायावादी मायाजाल को तोड़ते हुए कविता की नई भाषा गढ़ने की पहल की। वैसे ये वास्तविकता है कि साहित्य के ये सभी आंदोलन यूरोप में पहले ही आ चुके थे और भारत में बाद में आए।

प्रस्तुत है अज्ञेय जी की यह कविता-

 

 

 

हरी कलगी बाजरे की

 

हरी बिछली घास।
दोलती कलगी छरहरे बाजरे की।

 

अगर मैं तुम को ललाती सांझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कुंई,
टटकी कली चम्पे की, वगैरह, तो
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है।

 

बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गये हैं।
देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच।

 

कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।
मगर क्या तुम नहीं पहचान पाओगी :
तुम्हारे रूप के-तुम हो, निकट हो, इसी जादू के-
निजी किसी सहज, गहरे बोध से, किस प्यार से मैं कह रहा हूं-
अगर मैं यह कहूं-

 

बिछली घास हो तुम लहलहाती हवा मे कलगी छरहरे बाजरे की ?

 

आज हम शहरातियों को
पालतु मालंच पर संवरी जुहि के फ़ूल से
सृष्टि के विस्तार का- ऐश्वर्य का- औदार्य का-
कहीं सच्चा, कहीं प्यारा एक प्रतीक
बिछली घास है,
या शरद की सांझ के सूने गगन की पीठिका पर दोलती कलगी
अकेली
बाजरे की।

 

और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूं
यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट आता है-
और मैं एकान्त होता हूं समर्पित

 

शब्द जादू हैं-
मगर क्या समर्पण कुछ नहीं है ?

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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मेरा गीत – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘My Song’ का भावानुवाद-

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

मेरा गीत

 

मेरा गीत घेरे रहेगा अपने संगीत से तुम्हे, मेरे बच्चे, जैसे
प्रेम से परिपूर्ण बांहों का घेरा।

 

मेरा यह गीत स्पर्श करेगा तुम्हारे माथे पर, आशीर्वाद के एक चुंबन की तरह।
जब तुम अकेले रहोगे, यह तुम्हारे पास बैठेगा और तुम्हारे कानों में
धीरे से बोलेगा, जब तुम भीड़ में रहोगे तब, यह तुम्हारे चारों तरफ घेरा बना लेगा
सुरक्षा का।

 

मेरा यह गीत, तुम्हारे लिए एक जोड़ी पंख बन जाएगा, जो तुम्हारे
हृदय को अनंत के छोर तक ले जाएगा।

 

यह अंधेरी रात में, जब तुम्हारे मार्ग पर अंधेरा हो, तब ऊपर आकाश में चमकता एक
भरोसेमंद सितारा बन जाएगा।

 

मेरा गीत तुम्हारी आंखों की पुतलियों में बैठ जाएगा और
तुम्हारी दृष्टि को प्रत्येक वस्तु की तह तक ले जाएगा।

 

और जब मृत्यु के बाद मेरी वाणी मौन हो जाएगी, तब मेरा गीत
तुम्हारे जीवित हृदय में  गूंजेगा।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

My Song

 

This song of mine will wind its music around you, my child, like
the fond arms of love.
This song of mine will touch your forehead like a kiss of
blessing.
When you are alone it will sit by your side and whisper in
your ear, when you are in the crowd it will fence you about with
aloofness.
My song will be like a pair of wings to your dreams, it will
transport your heart to the verge of the unknown.
It will be like the faithful star overhead when dark night is
over your road.
My song will sit in the pupils of your eyes, and will carry
your sight into the heart of things.
And when my voice is silent in death, my song will speak in
your living heart.

 

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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भाभी माँगे खट्टी अमिया, भैया रस की खीर!

आज एक बार फिर से देश के लोकप्रिय कवि और गीतकार माननीय श्री सोम ठाकुर जी का एक बेहद लोकप्रिय गीत शेयर कर रहा हूँ, मेरा सौभाग्य है कि आयोजनों के सिलसिले में मुझे उनसे कई बार मिलने का और अनेक बार उनका काव्य-पाठ सुनने का अवसर प्राप्त हुआ है।

 

 

इस गीत की विशेषता यह है कि एक समय था जब आकाशवाणी से प्रातः काल प्रसारित होने वाले ‘ब्रज माधुरी’ कार्यक्रम में नियमित रूप से यह गीत प्रसारित होता है। लीजिए प्रस्तुत है हमारे महान भारतवर्ष का गौरव गान करने वाला यह गीत-

 

सागर चरण पखारे, गंगा शीश चढ़ावे नीर,
मेरे भारत की माटी है चन्दन और अबीर,
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

मंगल भवन अमंगलहारी के गुण तुलसी गावे,
सूरदास का श्याम रंगा मन अनत कहाँ सुख पावे।
जहर का प्याला हँस कर पी गई प्रेम दीवानी मीरा,
ज्यों की त्यों रख दीनी चुनरिया, कह गए दास कबीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ- सौ नमन करूँ।

 

फूटे फरे मटर की भुटिया, भुने झरे झर बेरी,
मिले कलेऊ में बजरा की रोटी मठा मठेरी।
बेटा माँगे गुड की डलिया, बिटिया चना चबेना,
भाभी माँगे खट्टी अमिया, भैया रस की खीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

फूटे रंग मौर के बन में, खोले बंद किवड़िया,
हरी झील में छप छप तैरें मछरी सी किन्नरिया।
लहर लहर में झेलम झूमे, गावे मीठी लोरी,
पर्वत के पीछे नित सोहे, चंदा सा कश्मीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ- सौ नमन करूँ।

 

चैत चाँदनी हँसे , पूस में पछुवा तन मन परसे,
जेठ तपे धरती गिरजा सी, सावन अमृत बरसे।
फागुन मारे रस की भर भर केसरिया पिचकारी
भीजे आंचल , तन मन भीजे, भीजे पचरंग चीर,
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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Corona, Lock Down and Masks!

Today again talking about the Pandemic Covid-19, lock down regulations etc. There is a question asked whether I wear mask, and when was the first time I saw somebody wearing a mask etc.

 

 

Let me say that I have been watching people wearing masks since long time. The reason for people wearing masks being that I lived in Delhi-NCR area and some people there had wearing masks their just because the air quality there sometimes becomes so unbearable due to massive pollution. Further there have been spread of Bird-flu etc. during several previous years and that is also a reason that I have been seeing people wearing masks since long.

However this time reason for wearing masks is much more serious than the previous occasions. The pandemic of Corona virus is such a grave threat to humanity that it has made the whole world remain indoors. The big powers, the rich nations which initially ignored this threat,  spread from Wuhan area of China, paid a very heavy price for their casualness. The spread of this disease is so fast that its patients grow in multiples, through social contacts, therefore remaining indoors and maintaining social distancing is the most effective way to stop the spread of this dreaded disease.

Yes one thing I would like to admit that I have never worn a mask till date. My son and daughter in law go outdoors for purchasing etc. and they wear mask then. I have not moved out from the 17th floor residence, where we are with my son in Bangalore, not gone out of our house even, so use of mask was not needed. I was a regular evening walker before start of lock-down, but now walk also is done indoors.

I feel that while some people may remain indoors like me, this option is not available to everybody, especially for those who work in essential services, medical staff, police, vendors for supply of daily need items etc. for them the use of masks is a great help and very useful.

I feel that our dealing with this dreaded virus was very effective since we implemented lock-down and social distancing in time, but like our film scripts, their came a notorious villain called – Maulana Saad of Tabligi Jamaat, who kept thousands of people in his ‘Marqaz’ gathering in Nizamuddin Delhi area, for so many days, even when assembly of more than 50 persons was not allowed. This gathering included many people from such countries, where spread Corona has been very serious and further these foreign people traveled and hided themselves in Mosques in different parts of our country. Still there are some people who have not come out and might be acting as big spreaders of this disease.

Further it is quite shameful that in some areas of our country, there are people of one community hiding and attacking police and medical personnel, who go there for their treatment etc. It is really not understandable how these people can act in such an uncultured and inhuman way, against those who are not caring about themselves but taking great risk to save other people.

Definitely the Medical staff going door to door for testing and treatment of people, police personnel who maintain the lock-down in various areas and of course the media people and those carrying things door to door and all those who work in the essential services, are the masked superheroes and we are proud of them.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Are you using a mask to protect yourself from Covid-19? What do you think of masks? When was the first time you saw someone with a mask? What about masked superheroes? According to you, which masked superhero can save Planet Earth now? #AnythingAboutMask

Thanks for reading.

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मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो !

आज मैं फिर से अपने प्रिय शायरों में से एक स्व. निदा फाज़ली जी की एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ। निदा साहब बड़ी सादगी से बहुत बड़ी बात कह देते थे। यह गज़ल को भी उनकी इस अनूठी प्रतिभा का परिचय देती है।

इसमें बताया गया है कि ज़िंदगी में चुनौतियां तो आती ही रहेंगी, लेकिन साहस के साथ हम हर चुनौती का मुक़ाबला कर सकते हैं।
लीजिए प्रस्तुत है यह बेहतरीन गज़ल-

 

 

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो,
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो।

 

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं,
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो।

 

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता,
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो ।

 

कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा,
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो।

 

यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें,
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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