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रंग होगा न बदन होगा न चेहरा होगा!

आज मैं साहिर होशियारपुरी जी की लिखी एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे जगजीत सिंह जी और चित्रा सिंह जी ने बड़े खूबसूरत अंदाज़ में गाया था। यह एक छोटी सी लेकिन बहुत प्यारी गज़ल है, इसका पहला शेर ही यह बताता है कि जब समय बदलता है तब बहुत कुछ बदल जाता है। बहुत से लोगों को खास तौर पर जो समाज में बदलाव लाना चाहते हैं उनको बहुत कुछ सहना पड़ता है, सभी सफल भी नहीं हो पाते लेकिन जो अपने उद्देश्य में सफल हो पाते हैं उनको बहुत सम्मान भी मिलता है, इस मामले में मूल मिसाल तो ईसा मसीह जी की है और उसके बाद अनेक जन-नायक, जैसे हमारे देश में महात्मा गांधी जी और अनेक स्वतंत्रता सेनानी और इस प्रकार के व्यक्तित्व अनेक देशों में हुए हैं, उनका ज़िक्र किया जा सकता है।

 

 

लीजिए प्रस्तुत है यह गज़ल-

 

तुमने सूली पे लटकते जिसे देखा होगा,
वक़्त आएगा वही शख़्स मसीहा होगा।

 

ख़्वाब देखा था के सहरा में बसेरा होगा,
क्या ख़बर थी के यही ख़्वाब तो सच्चा होगा।

 

मैं फ़िज़ाओं में बिखर जाऊंगा ख़ुशबू बनकर,
रंग होगा न बदन होगा न चेहरा होगा।

 

-साहिर होशियारपुरी

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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2 replies on “रंग होगा न बदन होगा न चेहरा होगा!”

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