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हरी कलगी बाजरे की – अज्ञेय

आज हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद के प्रणेता और नई कविता के सूत्रधार स्व. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इस कविता में भी उन्होंने इस बात पर बल दिया है कि अब कविता में नए प्रतीकों की खोज की जानी चाहिए क्योंकि पुराने प्रतीकों का उपयोग होते-होते वे घिस गए हैं।

अज्ञेय जी एक महान कवि, कहानीकार और उपन्यासकार थे और प्रयोगवाद के प्रणेता थे, उन्होंने भाषा में अनेक प्रयोग किए और कविता को एक नया स्वरूप प्रदान किया। समय की आवश्यकताओं को देखते हुए उन्होंने भाषा के छायावादी मायाजाल को तोड़ते हुए कविता की नई भाषा गढ़ने की पहल की। वैसे ये वास्तविकता है कि साहित्य के ये सभी आंदोलन यूरोप में पहले ही आ चुके थे और भारत में बाद में आए।

प्रस्तुत है अज्ञेय जी की यह कविता-

 

 

 

हरी कलगी बाजरे की

 

हरी बिछली घास।
दोलती कलगी छरहरे बाजरे की।

 

अगर मैं तुम को ललाती सांझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कुंई,
टटकी कली चम्पे की, वगैरह, तो
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है।

 

बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गये हैं।
देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच।

 

कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।
मगर क्या तुम नहीं पहचान पाओगी :
तुम्हारे रूप के-तुम हो, निकट हो, इसी जादू के-
निजी किसी सहज, गहरे बोध से, किस प्यार से मैं कह रहा हूं-
अगर मैं यह कहूं-

 

बिछली घास हो तुम लहलहाती हवा मे कलगी छरहरे बाजरे की ?

 

आज हम शहरातियों को
पालतु मालंच पर संवरी जुहि के फ़ूल से
सृष्टि के विस्तार का- ऐश्वर्य का- औदार्य का-
कहीं सच्चा, कहीं प्यारा एक प्रतीक
बिछली घास है,
या शरद की सांझ के सूने गगन की पीठिका पर दोलती कलगी
अकेली
बाजरे की।

 

और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूं
यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट आता है-
और मैं एकान्त होता हूं समर्पित

 

शब्द जादू हैं-
मगर क्या समर्पण कुछ नहीं है ?

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

***

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