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बड़ी भूल हुई अरे हमने, ये क्या समझा, ये क्या जाना!

आज मोहम्मद रफी साहब का गाया एक बेहद खूबसूरत गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत 1967 मे रिलीज़ हुई फिल्म- ‘पत्थर के सनम’ के लिए मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने लिखा था और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी के संगीत निर्देशन में रफी साहब ने बेहद खूबसूरती और फीलिंग्स की साथ गाया है|

 

 

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत गीत-

 

पत्थर के सनम, तुझे हमने मोहब्बत का खुदा जाना,
बड़ी भूल हुई अरे हमने, ये क्या समझा, ये क्या जाना|

 

चेहरा तेरा दिल में लिए चलते रहे अंगारों पे,
तू हो कहीं, सजदे किये, हमने तेरे रुखसारो के|
हमसा ना हो, कोई दीवाना|

 

सोचा था ये बढ़ जाएगी, तनहाईयाँ जब रातों की, 
रस्ता हमें दिखलाएगी, शम-ए-वफ़ा उन हाथों की|
ठोकर लगी, तब पहचाना|

 

ऐ काश के होती खबर, तूने किसे ठुकराया है,
शीशा नहीं, सागर नहीं, मंदिर सा एक दिल ढाया है|
ता-आसमां, है वीराना|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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