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प्रेमा नदी – सोम ठाकुर

आज मैं एक बार फिर से अपने प्रिय कवियों में से एक माननीय श्री सोम ठाकुर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह एक अलग तरह की कविता है जो अपना संपूर्ण प्रभाव पाठक/श्रोता पर छोड़ती है| लीजिए इस कविता का आनंद लीजिए-

 

 

 

मैं कभी गिरता – संभलता हूँ
उछलता -डूब जाता हूँ,
तुम्हारी मधुबनी यादें लिए
प्रेमा नदी|

 

यह बड़ी जादूभरी, टोने चढ़ी है,
फूटती है सब्ज़ धरती से, मगर
नीले गगन के साथ होती है,
रगो में दौड़ती है सनसनी बोती हुई
मन को भिगोती हुई,
उमड़ती है अंधेरी आँधियो के साथ
उजली प्यास का मरुथल पिए, प्रेमा नदी|

 

भोर को सूर्य घड़ी में
खुशबुओं से मैं पिघलता हूँ,
उबालों को हटाते ग्लेशियर लादे हुए
हर वक़्त बहता हूँ,
रुपहली रात की चंद्रा-भंवर में
घूम जाता हूँ,
बहुत खामोश रहता हूँ
मगर वंशी बनाती है मुझे
अपनी छुअन के साथ,
हर अहसास को गुंजन किए
प्रेमा नदी|

 

यह सदानीरा पसारे हाथ
मेरे मुक्त आदिम निर्झरों को माँग लेती है,
कदंबों तक झुलाती है
निचुड़ती बिजलियाँ देकर
भरे बादल उठाती है,
बिछुड़ते दो किनारे को
हरे एकांत का सागर दिए
प्रेमा नदी|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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