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खेल-खिलौने- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Playthings’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

 

खेल-खिलौने

 

अरे बालक, कितने खुश होकर तुम धूल में बैठे रहते हो, पूरी सुबह, एक टूटी टहनी से खेलते हुए|
मैं मुस्कुराता हूँ, तुम्हें उस छोटी से टूटी टहनी से खेलते देखकर|
मैं अपने हिसाब-किताब में व्यस्त हूँ, घंटों संख्याओं को जोड़ते हुए|

 

शायद तुम मेरी तरफ देखकर सोचते हो, “अपनी सुबह को बर्बाद करने का यह कैसा मूर्खतापूर्ण तरीका है!”
बच्चे, मैं डंडियों और मिट्टी के साथ खेल में व्यस्त रहने की कला भूल चुका हूँ|
मैं महंगे खिलौनों की खोज में रहता हूँ, और सोने-चांदी के ढेर लगाता हूँ|

 

तुम्हें जो कुछ भी मिलता है, उससे तुम खुशी देने वाले खेल सृजित कर लेते हो, मैं अपना समय और शक्ति, दोनों बर्बाद करता हूँ, ऐसी वस्तुओं पर, जिन्हें मैं कभी नहीं पा सकूँगा|

 

अपनी कमजोर सी नौका से, मैं पार करना चाहता हूँ अपनी अभिलाषाओं का समुद्र, और यह भूल जाता हूँ कि मैं भी एक खेल ही खेल रहा हूँ|

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Playthings

Child, how happy you are sitting in the dust, playing with a broken twig all the morning.
I smile at your play with that little bit of a broken twig.
I am busy with my accounts, adding up figures by the hour.
Perhaps you glance at me and think, “What a stupid game to spoil your morning with!”
Child, I have forgotten the art of being absorbed in sticks and mud-pies.
I seek out costly playthings, and gather lumps of gold and silver.
With whatever you find you create your glad games, I spend both my time and my strength over things I never can obtain.
In my frail canoe I struggle to cross the sea of desire, and forget that I too am playing a game.

 

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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जिगर मा बड़ी आग है!

ओंकारा फिल्म का एक गीत याद आ रहा जो गुलज़ार साहब ने लिखा, एक तरह से एक्स्प्रेशन के मामले में एक्सपेरीमेंट है| इस गीत का संगीत दिया है विशाल भारद्वाज जी ने और इसे गाया है सुनिधि चौहान और सुखविंदर सिंह ने| लीजिए इस गीत की कुछ पंक्तियाँ देख लेते हैं-

 

 

ना गिलाफ, ना लिहाफ,
ठंडी हवा भी खिलाफ ससुरी,
इत्ती सर्दी है किसी का लिहाफ लै ले,
जा पड़ौसी के चूल्हे से आग लै ले|

 

बीड़ी जलाई ले, जिगर से पिया,
जिगर मा बड़ी आग है!

अब बात ये है कि हमारे विभिन्न अंगों की अलग-अलग भूमिका होती हैं जिन्हें चिकित्सक अच्छी तरह जानते हैं| लेकिन इन अंगों की दूसरी भूमिका भी होती है, जिसको कवि-शायर ज्यादा अच्छी तरह जानते हैं| इन अंगों में से सबसे खराब हालत बेचारे दिल की होती है, जिसके बारे में मैंने पहले भी अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में लिखा है| उसे बेचारे को बार-बार टूटना पड़ता है, कभी खिलौना बनना पड़ता है| अब उर्दू शायरी में दिल का काम तो टूटना होता ही है, परंतु हृदय में तो पहले ठेस ही लगती थी, लेकिन पूरब-पश्चिम के गीत में इंदीवर जी ने बेचारे हृदय को भी तोड़ ही डाला|

 

कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे
तड़पता हुआ जब कोई छोड दे, 
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा, 
तुम्हारे लिए|

 

ऐसे बहुत से उदाहरण खोजे जा सकते हैं जिनमें हमारे अंगों को शायरों की कल्पना को रूपायित करने के लिए अजीब भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं| जैसे ऊपर जिस गीत का उल्लेख किया गया है, उसमें जिगर को एक अलग तरह की भूमिका दी गई है| वैसे चिकित्सकों की निगाह में जिगर की जो भी भूमिका हो, हम ऐसा कहते हैं- उसमें बहुत जिगरा है, यानि हिम्मत है|

लेकिन ऊपर उल्लिखित फिल्म- ओंकारा के गीत में तो जिगर बेचारे को लाइटर या अंगीठी की भूमिका दे दी गई, भला जिगर बेचारा क्या बीड़ी जलाने के काम आएगा| लेकिन जब शायर ऐसा चाहते हैं, तो ऐसा ही सही| वैसे गीत यह बड़ा मजेदार है| आज इसके बहाने ही कुछ बात करने का मन हुआ सो कर ली, हमको भी तो कुछ क्रिएटिव आज़ादी है न जी|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

 

 

आस्था के बारे में एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना था।

ये माना जाता है कि यदि आप सच्चे मन से किसी बात को मानते हैं, इस प्रसंग में यदि आप ईश्वर को पूरे मन से मानते हैं, तो वह आपको अवश्य मिल जाएंगे।

इस बीच कवि सोम ठाकुर जी के गीत ‘प्रेम का प्याला’ से कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

जीते जी तरना चाहे तो, पी ले गंगाजल के बदले,
मीरा ने टेरे श्याम पिया तो अर्थ हलाहल के बदले,
मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी।

 

ये प्याला प्रेम का प्याला है, तू नाचके और नचाकर पी,
खुल खेलके पी, झुक झूमके पी, मत गैर से नज़र बचाकर पी।
ये प्याला प्रेम का प्याला है।

बहुत ही सुंदर गीत है ये, जितना अचानक याद आया, मैंने शेयर कर लिया। असल में यह आस्था और विश्वास का ही मामला है। बच्चे का विश्वास! वो जो मानता है, पूरी तरह मानता है, कोई ढोंग नहीं करता।

तो प्रसंग यह है कि एक पंडित जी रोज सुबह नदी में स्नान करने जाते, वे नदी किनारे अपने वस्त्र आदि रखकर नदी में स्नान करते। अक्सर एक बच्चा, जो गाय चराने आता था, उससे वे अपने सामान का ध्यान रखने को कहते थे और वो ऐसा करता भी था।

वह बच्चा उनको स्नान के दौरान प्रार्थना करते देखता, जिसमें वे अपने कंठ को अपनी उंगलियों के बीच हल्का सा दबा लेते थे। एक बार जब वे इसी प्रकार बच्चे से निगरानी के लिए बोलकर, नदी में जा रहे थे तब बच्चे ने पूछा पहले ये बताओ कि आप ये कंठ को क्यों दबाते हो। पंडित जी ने बोला हम भगवान की प्रार्थना करते हैं, दर्शन देने के लिए कहते हैं।

बच्चे ने पूछा कि क्या आपको भगवान दिखाई देते हैं, पंडित जी ने टालने के लिए बोल दिया कि ‘हां’।
इसके बाद बच्चा एक बार नदी में नहाने के लिए गया और उसने अपना कंठ दबाकर प्रभु से प्रार्थना की कि वे उसको दर्शन दें। कुछ देर तक दर्शन न होने पर वो बोला ‘आप जानते नहीं मैं कितना ज़िद्दी हूँ, मुझे दर्शन दो, नहीं तो मैं कंठ से हाथ नहीं हटाऊंगा!’

प्रभु ने सोचा यह पागल तो मर जाएगा, सो उन्होंने नदी किनारे भगवान श्रीकृष्ण के रूप में, प्रकट होकर कहा अब तो हाथ हटाओ देखो मैं आ गया, बच्चे ने कहा वहीं रुको, फिर पूछा, ‘आप कौन हो’ , उन्होंने कहा मैं वही ईश्वर हूँ, जिसको तुम बुला रहे थे।‘ बच्चा बोला, मैं नहीं मानता, उसने उनको रस्सी से पेड़ के साथ बांधकर कहा- ‘रुको, मैं अभी आता हू‘, वह भागकर पंडित जी को बुलाकर लाया, शुरू में तो पंडित जी को कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन बाद में बच्चे की ज़िद के कारण, भगवान ने ढोंगी पंडित जी को भी दर्शन दिए, तब जाकर भगवान बंधन मुक्त हो पाए।

बस यही बात है आज की, प्रेम में ढोंग नहीं, पागलपन ज्यादा काम आता है।

नमस्कार।

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Lead me Light or Darkness!

 

Today again I am submitted my views based on an #IndiSpire prompt. The question is whether the role of masses is only of becoming good and obedient followers. In Indian culture and philosophy, let me refer to The Bhagvad Gita, where Lord Krishna tells in his message to Arjuna-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्

The Lord says that whenever the evil powers would become strong and not allow nice people to live in peace, then I would come on earth to eradicate the evil forces.
This is an assurance in a sense, that God helps good people in some form or the other, but normally people start thinking that it is the duty of God almighty to remove their troubles and they don’t have to do anything except praying before God.

Today we are the largest democracy in the world, with equal voting rights for every adult citizen, irrespective of his or her education, caste, colour, financial status etc. It is a great virtue in a way but it is also there that many people follow some powerful person in their area. I remember what Mr. Morarji Desai the very effective Prime Minister of our country, said in a public meeting at Ramlila ground, Delhi long ago. Let me tell that it was Mr. Morarji Desai performed very well and also Mr, Narsimha Rao took big initiatives to remove licence Raj and improve our financial condition, with Mr. Manmohan Singh as his finance minister. It was really the courage of Mr. Narsimha Rao in approving these bold decisions. But they were never given due importance since they didn’t belong to a particular family.

So what Mr. Desai said in that public meeting was that he went to a village in Gujrat, for asking the people to vote for him. He first met the village Pradhan. The village Pradhan told him Mr. Desai now that you have met me, please rest assured that all the village people would vote for you. On this Mr. Desai said that all the people would take their own considered decision for their own vote. The Pradhan said if you wish you can meet people, but I am telling you that they all follow, what I tell them to do.

We have a popular saying in Hindi-

 

महाजनो येन गतः स पन्थाः।

Which have a deeper meaning but for common people it means that the way on which the rich and powerful people move, the way they behave, becomes the example to be followed by other people.

Recently during Lock down we saw that thousands of migrant laborers moved from their places of work, where they had been working since long, to their native places. There is a humanitarian angle in that to some extent, but many of the people just followed the trend. They also said that they don’t need anything but want to go back to their homes. Many of them made excessive payments to bus operators etc. for returning home. Many others moved long distances on foot.

It is a general trend in our country, when we hear that some commodity is in shortage, we all store it more and more so that we may not have to face much problem, let other face if they have to.

The bad elements take benefit of this attitude of common people. Another example from Lock down period only is of the big gatherings that happened at some Mumbai stations and some places in Gujrat and other states. Behind these happenings were the rumours spread be some notorious people that train tickets are being booked or some relief money is being distributed.

It is very clear that crowds don’t have brains, they can be taken in any direction by wiser and shrewd people. And this is not the development of today. In India I can say that it has always been happening. Mostly bad people take benefit of this.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt – Why is “herd mentality” phenomena so rampant in India? So many just blindly follow what others would be doing! Or they mindlessly do what others tell them to, without questioning it. Is it “Bandwagon Effect”? Has rationality died? #HerdMentality

 

Thanks for reading.

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देवों के देव महादेव!

मैंने पहले भी अपनी ब्लॉग पोस्ट में यह उल्लेख किया है की लॉक डाउन प्रारंभ होने के बाद हमने हॉटस्टार पर धार्मिक सीरियल – ‘देवों के देव महादेव’ देखना प्रारंभ किया था और अभी तक हम इसे देख रहे हैं| हर रोज हम 4-5 एपिसोड तो देख ही लेते हैं, और ऐसा लगता है की अभी भी इसका 20% भाग देखना बाकी है|

 

महादेव जिनको आदि-देव कहा जाता है और उनके साथ आदि-शक्ति जगदंबा पार्वती| वास्तव में कैलाश में बसने वाले महादेव – त्रिदेव के दिव्य सदस्य ऐसे हैं कि जिनके चमत्कारों का वर्णन करना बहुत कठिन है| महादेव और जगत जननी, अनेक बार अनेक रूपों में मिलते हैं| बम भोले कहे जाने वाले महादेव कभी बेलपत्र से प्रसन्न हो जाते हैं और जब रुष्ट हो जाते हैं तब त्रिदेव और सारे देवता उनको मनाने में लग जाते हैं| सभी लोग जब श्रेष्ठ वस्तुओं, सुख-सुविधाओं के पीछे भागते हैं तब महादेव दुनिया के कल्याण के लिए विषपान करते हैं, और देवता लोग अमृत पाकर खुशी मनाते हैं|

देवताओं पर जब संकट आता है, तब वे महादेव की शरण में आते हैं और बाद में उनको भूल जाते हैं, अहंकार में डूब जाते हैं| इन्द्र के अहंकारी स्वभाव के अनेक उदाहरण इस कथा में आते हैं| तुलसीदास जी ने देवताओं के बारे में लिखा है-

आए देव सदा स्वारथी, बात करहीं जनु परमारथी|

महादेव के यशस्वी पुत्र- कार्तिकेय, जो देवताओं के सेनापति थे, गणेश जी, जिनको उनके श्रेष्ठ गुणों और बुद्धिमत्ता के कारण- प्रथम पूज्य होने का सम्मान प्राप्त हुआ| इनकी पुत्री – अशोक सुंदरी, जिनके पति नहुष देवराज इन्द्र का आसन भी प्राप्त कर लेते हैं लेकिन अपने अहंकार के कारण एक ऋषी से श्राप पाकर सर्प बन जाते हैं|

ऐसे अनेक पौराणिक पात्र हैं जिनकी कथाएँ इस विराट सीरियल के माध्यम से जानने को मिलती हैं| कुछ पात्र हैं- महादेव की ही ऊर्जा से उत्पन्न – जलंधर और अंधक, जलंधर तो त्रिलोकाधिपति भी बन जाते हैं, इनके अलावा बाणासुर जो महादेव के आशीष से ही महाबली बनता है और फिर सबके लिए खतरा बन जाता है|

ऐसा लगता है कि असुर लोग पहले शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए ही तपस्या करते हैं और फिर उन देवों के लिए भी खतरा बन जाते हैं, जिनसे वे वरदान प्राप्त कराते हैं| कुछ ऋषी तो ऐसा लगता है कि हमेशा श्राप देने के लिए ही तैयार रहते हैं, लेकिन कहा जाता है कि उनके श्राप भी दुनिया के कल्याण के लिए ही होते हैं|
तुलसीदास जी ने महादेव और माता पार्वती के बारे में लिखा है-

भवानी शंकरौ वंदे, श्रद्धा विश्वास रूपिणौ

वास्तव में माता भवानी के मन में अपार श्रद्धा है, लेकिन वैसा अडिग विश्वास नहीं है, जैसा महादेव के मन में है, शायद यही कारण है कि वे जब श्रीराम को सीता जी की खोज में वन में भटकते हुए देखते हैं, तब वे सीता माता का वेष बदलकर उनकी परीक्षा लेने चली जाती हैं| श्रीराम उनको तुरंत पहचान कर प्रणाम करते हैं और इसके बाद महादेव उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने से इंकार कर देते हैं, क्योंकि उन्होंने सीता का रूप धरा था, जिनको महादेव अपनी माता का दर्जा देते हैं|

ऐसे अनेक पौराणिक प्रसंग इस सीरियल में आते हैं, जिनको देखना और जानना सभी के लिए अच्छा होगा| जब यह सीरियल प्रसारित हुआ था तब शायद एक वर्ष से अधिक तक प्रसारित हुआ था, हमने इसको लॉक डाउन की अवधि में देखा है और आशा है कि जल्द ही इसे पूरा कर लेंगे|

एक त्रुटि मुझे इस सीरियल में, काल-क्रम की दृष्टि से लगी, शायद सीरियल निर्माताओं तक मेरी बात पहुँच पाए| सीरियल में यह दिखाया कि आदि शक्ति पहले जन्म में सती के रूप में श्रीराम जी की परीक्षा लेती हैं और बाद में पार्वती के रूप में पुनः महादेव से मिलती हैं| लेकिन फिर पार्वती के रूप में उनके अवतार के बाद ही श्रीराम का जन्म दिखाया गया है और वे सीता जी को विवाह के लिए आशीर्वाद भी देती हैं|

इस सीरियल में प्रसंग तो इतने हैं कि उनको लिखते ही जा सकते हैं, लेकिन मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि यह सीरियल देखने लायक है| एक बात और मेरी 6 वर्ष की पोती भी यह सीरियल नियमित रूप से देखती है और कभी-कभी ऐसी भाषा बोलती है- ‘आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा दायित्व है’|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था!

 

आज मैं मुशायरों और कवि सम्मेलनों में ख्याति अर्जित करने वाली शायरा- सुश्री अंजुम रहबर जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर सी गजल-

 

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था,
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था|

 

मैं उस को देखने को तरसती ही रह गई,
जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था|

 

बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे,
घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था|

 

मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को,
हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था|

 

दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में,
मैं जिसको चाहती थी वो लड़का ग़रीब था|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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मैंने देखा स्वप्न – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Dreamt’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

मैंने देखा स्वप्न

 

मैंने देखा स्वप्न, की वह मेरे सिरहाने बैठी है, कोमलता से मेरे बालों में उँगलियाँ फिराते हुए,
अपने स्पर्श की धुन को बजाते हुए| मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा
और अपने आंसुओं से संघर्ष कराते हुए देखता रहा, जब तक कि मौन भाषा की पीड़ा ने
मेरी नींद को एक बुलबुले की तरह नहीं फोड़ दिया|
मैं उठकर बैठ गया और अपनी खिड़की के ऊपर आकाश-गंगा की चमक को देखा,
जैसे मौन की एक दुनिया जल रही हो, और मैं सोचता रहा कि क्या इस क्षण
उसको भी ऐसा ही स्वप्न आया होगा, जिसकी ताल मेरे स्वप्न से मिलती हो|

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

I Dreamt

 

I dreamt that she sat by my head, tenderly ruffling my hair with
her fingers, playing the melody of her touch. I looked at her face
and struggled with my tears, till the agony of unspoken words burst
my sleep like a bubble.
I sat up and saw the glow of the Milky Way above my window,
like a world of silence on fire, and I wondered if at this moment
she had a dream that rhymed with mine.

 

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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तुम प्राणों की अगन हरो तो!

 

एक बार फिर से आज मैं हिन्दी के दुलारे गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक भावुकता और प्रेम से भरा गीत शेयर कर लूँ| भावुकता वैसे तो जीवन में कठिनाई से ही कहीं काम आती है, आजकल बहुत कम मिलते हैं इसको समझने वाले, परंतु कवि-गीतकारों के लिए तो यह बहुत बड़ी पूंजी होती है, अनेक गीत इसके कारण ही जन्म लेते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है भारत भूषण जी का यह खूबसूरत गीत-

 

 

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ
प्रिय मिलने का वचन भरो तो !

 

पलकों-पलकों शूल बुहारूँ
अँसुअन सींचू सौरभ गलियाँ,
भँवरों पर पहरा बिठला दूँ
कहीं न जूठी कर दें कलियाँ|
फूट पड़े पतझर से लाली
तुम अरुणारे चरन धरो तो !

 

रात न मेरी दूध नहाई
प्रात न मेरा फूलों वाला,
तार-तार हो गया निमोही
काया का रंगीन दुशाला|

 

जीवन सिंदूरी हो जाए
तुम चितवन की किरन करो तो !

 

सूरज को अधरों पर धर लूँ
काजल कर आँजूँ अँधियारी,
युग-युग के पल छिन गिन-गिनकर
बाट निहारूँ प्राण तुम्हारी|
साँसों की जंज़ीरें तोड़ूँ
तुम प्राणों की अगन हरो तो|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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जीवन पर कविता – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Poem on Life’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

 

जीवन पर कविता

 

हमें प्रदान किया जाता है जीवन,
अर्जित करते हैं हम इसे, न्यौछावर करके|

 

मृतकों को प्रसिद्धि का अमरत्व प्राप्त करने दो,
परंतु जीवित लोगों को पाने दो प्रेम का अमरत्व|

 

जीवन की त्रुटियाँ पुकारती हैं  उस दयापूर्ण सौंदर्य को 
जो उनके अकेलेपन को अपनी  पूर्ण सत्ता
में समाहित कर ले |

 

जीवन, एक बच्चे की तरह हँसता है,
    मृत्यु के झुनझुने को तेजी से घुमाते घुमाते हुए|

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Poem on Life

 

Life is given to us,
we earn it by giving it.
Let the dead have the immortality of fame,
but the living the immortality of love.
Life’s errors cry for the merciful beauty
that can modulate their isolation into a
harmony with the whole.
Life, like a child, laughs,
shaking its rattle of death as it runs.

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मायानगरी का स्वर्ण मृग !

आज मुंबई की मायानगरी की बात कर लेते हैं, जिसे लोग हॉलीवुड की तर्ज पर बॉलीवुड भी कहते हैं| एक से एक प्रतिभाएँ रही हैं इस मुंबई में, और यह क्षेत्र भारत का फिल्मी देवलोक जैसा लगता है|

 

 

मुंबई मायानगरी का हिस्सा रहे महान कलाकारों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि कोई नाम गिनाने लगे तो जितने नाम वह बताएगा उससे दो गुने छूट जाएंगे| मेरे उस्ताद और सपनों के सौदागर- महान शोमैन राजकपूर भी इसी नगरी में थे, जिनके सपनों का महल आर के स्टूडिओ भी आज बिक चुका है| मेरे परम प्रिय गायक – मुकेश जी भी इसी नगरी का हिस्सा थे, जिनकी निश्छल आवाज आज भी हमारे मन में गूँजती है- ‘सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है’| जैसा मैंने पहले कहा इतने महान लोग, नाम लेना शुरू करें तो ये सिलसिला समाप्त ही नहीं होगा- निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, गीतकार, संगीतकार, गायक, टैकनीशियन आदि-आदि| हजारों लोगों ने इस मायानगरी से अपनी पहचान बनाई है|

मुंबई की यह मायानगरी हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली प्रतिभाओं से भरी पड़ी है, लोग यहाँ अपनी किस्मत आज़माने के लिए आते ही रहते हैं और एक बार जो जनता के दिल पर अपनी छाप छोड़ देता है, लोग उसको अपने सिर-आँखों पर बिठाते हैं|

ये दुनिया है यहाँ पर आना-जाना तो लगा ही रहता है, पिछले दिनों हमने ऋषि कपूर और इरफान खान जैसे महान कलाकारों को असमय खो दिया| यह सिलसिला तो चलता ही रहता है, जब ऊपर वाला बीमारी के बहाने या किसी दुर्घटना के कारण किसी को अपने पास बुला लेता है|

लेकिन हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत जिस प्रकार गए, वह अत्यंत हृदय विदारक है और इस फिल्मी नगरी की मानवीयता पर बहुत से गंभीर प्रश्न खड़े करता है|

ये ऐसी दुनिया है, जहां एक बार जब कोई कलाकार जनता का दिल जीत ले तो लोग उसे कंधों पर उठा लेते हैं, ऐसी ऊंचाई प्रदान करते हैं, जिसकी कहीं और कल्पना नहीं की जा सकती है| यही कारण है कि यहाँ कंपिटीशन भी बहुत तगड़ा है| लोग घर से सीधे भागकर कर या बाकायदा फिल्मों से जुड़े कोर्स करके, थिएटर के माध्यम से, अनेक प्रकार से यहाँ आते हैं|

दूसरी तरफ वे लोग हैं जो पहले से इस परिवार का हिस्सा हैं| वे किसी फिल्मी घराने से हैं, अथवा पहले कुछ फिल्में कर चुके हैं और अब जनता को उतना प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं| ऐसे में कुछ लोग घेरेबंदी करते, चक्रव्यूह रचते हैं| दूर किसी छोटे से इलाके से आया संवेदनशील कलाकार जब अचानक ऊंचाई प्राप्त कर लेता है, तब वह प्रसिद्ध तो होता है लेकिन साथ ही अकेला भी हो जाता है| अपनी मुसीबतों को वह किसी से शेयर भी नहीं कर पाता| सुशांत सिंह राजपूत, जैसा उनको देखने से ही लगता था, अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति थे, ऐसा सुना गया है कि पिछले 6 महीनों में उनसे एक-एक करके 7 फिल्में छीन ली गईं| लॉबी वाले ये खलनायक न जाने कितनी प्रतिभाओं को मुंबई से और कभी जीवन से भी पलायन करने पर मजबूर कर देते हैं|

इस घटना के बाद मुझे लगता है कि और जागरूकता आएगी और ऐसे दुष्ट लोगों को कानूनी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ेगा|

एक विचार मेरे मन में आ रहा है, मुंबई में जहां फिल्म नगरी में इस प्रकार की घृणित लॉबी काम करती है, वहीं ठाकरे बंधु और उनकी नफरत की राजनीति करने वाली पार्टियों के छुटभैये भी आए दिन अन्य प्रदेशों से आने वालों को धमकाते रहते हैं| मैं समझता हूँ कि जिस प्रकार नोएडा में छोटी सी फिल्म-नगरी बनाई गई है, उसी प्रकार अन्य स्थानों पर भी राज्य सरकारों द्वारा फिल्म निर्माण के लिए स्थान, इन्फ्रा स्ट्रक्चर और प्रोत्साहन प्रदान किया जाए| क्या ही अच्छा हो कि कई फिल्म नगरी विकसित हो जाएँ, उनके बीच प्रतियोगिता हो, जिससे अन्य राज्य भी विकसित हों और इन छुटभैये लोगों की दादागिरी भी समाप्त हो|
ऐसे ही यह विचार आया कि फिल्मी दुनिया किसी प्रकार और अधिक मानवीय और नई प्रतिभाओं का खुले दिल से स्वागत करने वाली बन सके|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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