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जंगल के राजा सावधान!

आज मैं हिन्दी कविता के एक महान स्तंभ स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बातचीत के लहजे में कविता लिखने के लिए प्रसिद्ध थे| आपातकाल में वे प्रतिदिन तीन रचनाएँ लिखते थे, जिसे ‘त्रिकाल संध्या’ नाम से संकलित किया गया| मेरा सौभाग्य है कि मुझे दिल्ली की एक काव्य गोष्ठी में उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर मिला| फिल्मों में गीत लिखने के अनुभव को लेकर लिखी गई उनकी कविता – ‘गीत फ़रोश’ विशेष रूप से लोकप्रिय हुई थी|

आजकल तो जीवों के प्रति दया के बहुत अभियान चल रहे हैं, बड़े-बड़े फिल्मी कलाकार भी इस मामले में अदालतों के चक्कर काट रहे हैं| भवानी दादा ने बहुत पहले अपने मनोरंजन के लिए जीवों का शिकार करने की इस प्रवृत्ति के विरुद्ध यह कविता लिखी थी|

 

 

जंगल के राजा, सावधान !
ओ मेरे राजा, सावधान !

 

कुछ अशुभ शकुन हो रहे आज l
जो दूर शब्द सुन पड़ता है,
वह मेरे जी में गड़ता है,
रे इस हलचल पर पड़े गाज l

 

ये यात्री या कि किसान नहीं,
उनकी-सी इनकी बान नहीं,
चुपके चुपके यह बोल रहे ।
यात्री होते तो गाते तो,
आगी थोड़ी सुलगाते तो,
ये तो कुछ विष-सा बोल रहे ।

 

वे एक एक कर बढ़ते हैं,
लो सब झाड़ों पर चढ़ते हैं,
राजा ! झाड़ों पर है मचान ।
जंगलके राजा, सावधान !
ओ मेरे राजा, सावधान !

 

राजा गुस्से में मत आना,
तुम उन लोगों तक मत जाना ;
वे सब-के-सब हत्यारे हैं ।
वे दूर बैठकर मारेंगे,
तुमसे कैसे वे हारेंगे,
माना, नख तेज़ तुम्हारे हैं ।
“ये मुझको खाते नहीं कभी,
फिर क्यों मारेंगे मुझे अभी ?”
तुम सोच नहीं सकते राजा ।

 

तुम बहुत वीर हो, भोले हो,
तुम इसीलिए यह बोले हो,
तुम कहीं सोच सकते राजा ।
ये भूखे नहीं पियासे हैं,
वैसे ये अच्छे खासे हैं,
है ‘वाह वाह’ की प्यास इन्हें ।

 

ये शूर कहे जायँगे तब,
और कुछ के मन भाएँगे तब,
है चमड़े की अभिलाष इन्हें,
ये जग के, सर्व-श्रेष्ठ प्राणी,
इनके दिमाग़, इनके वाणी,
फिर अनाचार यह मनमाना !
राजा, गुस्से में मत आना,
तुम उन लोगों तक मत जाना|

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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