समय की नंगी सलीबों पर, गले में अटकी हुईं फाँसें!

आज मैं हिन्दी कविता और नवगीत के यशस्वी हस्ताक्षर श्री ओम प्रभाकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वैसे तो मनुष्य को जीवन में आशावादी होना चाहिए, लेकिन एक कवि अपने समय की सभी स्थितियों को अभिव्यक्त करता है, विसंगतियों को उजागर करता है| इन अभिव्यक्तियों का मूल उद्देश्य इंसानियत को जगाना ही होता है|

ओम प्रभाकर जी की इस रचना में भी आज के समय की विसंगतियों को बड़ी कुशलता से उजागर किया गया है| प्रस्तुत है यह रचना-

 

 

बीत गए दिन
फूल खिलने के।

 

होती हैं केवल वनस्पतियाँ
हरी-हरी-सी
हर गली
हर मोड़ पर बैठी
मौत अपनी बाँह फैलाकर।

 

बर्फ़-सा
जमता हुआ हर शख़्स
चुप्पियों में क़ैद हैं साँसें,
समय की नंगी सलीबों पर
गले में अटकी हुईं फाँसें,
लिख रहे हैं
लोग कविताएँ
नींद की ज्यों गोलियाँ खाकर।

 

बीत गए दिन
अब हवाओं में गन्धकेतु हिलने के
फूल खिलने के।

 

ढोती है काले पहाड़ दृष्टियाँ
सूर्य झर गए,
दृश्य घाटी में गहरे उतर गए,
बीत गए दिन
उठी बाँहों से बाँहों के मिलने के
फूल खिलने के।

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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