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आत्म-मुग्ध, आत्म-लिप्त, आत्म-विरत!

मुझे ‘गर्म हवा’ फिल्म का प्रसंग याद आ रहा है| विभाजन के समय के वातावरण पर बनी थी वह फिल्म, जिसमें स्वर्गीय बलराज साहनी जी ने आगरा के एक मुस्लिम जूता व्यापारी की भूमिका बड़ी खूबसूरती से निभाई थी|

 

 

उस फिल्म में एक मुस्लिम नेता का चरित्र दिखाया गया है, जिसे तालियाँ बजवाने का शौक है, जैसा कि नेताओं को होता ही है| वह अपने भाषणों में कहता है कि वह भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने वाला आखिरी व्यक्ति होगा| इस प्रकार की बात अक्सर नेता लोग तालियाँ पिटवाने के लिए करते हैं| लेकिन बाद में इन नेताजी को लगता है कि बदलते माहौल में यहाँ उनकी नेतागिरी नहीं चलने वाली| ऐसे में वे अचानक अपनी बेगम को बताते हैं कि हम पाकिस्तान जाएंगे, उनका सामान तांगे में लदता है, और अचानक उनकी तसवीर उल्टी हो जाती है और पृष्ठभूमि में तालियों की आवाज आती है| बड़े प्रतीकात्मक तरीके से यहाँ उनके पलटी मारने, कथनी और करनी के अंतर को दर्शाया गया है|

अचानक यह प्रसंग याद आ गया, और एक बात और कि जब वे जा रहे होते हैं, तब उनका जवान बेटा देखता है कि युवक लोग जूलूस निकाल रहे हैं और रोजगार आदि संबंधी अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं| बेटा तांगे से उतर जाता है और बोलता है कि उसकी जगह तो यही है, वह यहाँ रहकर ही अपने युवा साथियों के साथ संघर्ष करेगा|

मैं बात करना चाह रहा था ऐसे लोगों की जो जीवन में आत्म मुग्ध रहते हैं, नेतागण अधिकतर इसी श्रेणी में आते हैं| उनको दूसरों के दोष दिखाई देते हैं और वास्तव में दूसरों के दोष निकालना ही उनका मुख्य काम होता है| वे यह तो सोच ही नहीं पाते कि उनमें भी कोई दोष हो सकता है| यह वास्तव में बहुत खराब स्थिति होती है जब व्यक्ति न केवल अपनी कमियों पर ध्यान देना बंद कर देता है अपितु इस संबंध में सुनना भी नहीं चाहता, तब उसके सुधार की गुंजाइश नहीं बचती और वह क्रमशः लोगों के बीच अपना सम्मान खोता जाता है|

हम जो कुछ एक अधिकारी/कर्मचारी होने के नाते, सिस्टम का एक पार्ट होने के नाते करते हैं, वह हमारी एक भूमिका होती है और उस भूमिका का निर्वाह होने से हमें तसल्ली भी होती है| लेकिन एक यात्रा इसके साथ-साथ चलती है या शायद चलनी चाहिए!

एक प्रसंग याद आ रहा है सेवाकाल का| हमारे एक महाप्रबंधक थे, मिस्टर दुआ, जब मैं एक विद्युत परियोजना में काम करता था| वे अपने पद की भूमिका तो ठीक से निभाते ही थे, लेकिन एक क्रिएटिव व्यक्ति होने के नाते वे संस्कृतिक गतिविधियों में भी रुचि लेते थे और भाग लेते थे| उन्होंने इस दृष्टि से वहाँ लॉयंस क्लब की गतिविधि प्रारंभ कीं| अब वे इसमें रुचि लेते थे तो अधिकारीगण भी सदस्य बनते गए| इस प्रकार एक विशाल नेटवर्क वहाँ तैयार हो गया| आसपास के सोशली एक्टिव लोग भी इसमें जुड़ते गए|

अब कुछ उपयोगी काम तो होते ही होंगे इसके अलावा बहुत से लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने और तालियाँ पिटवाने का भी अवसर मिला| लेकिन मिस्टर दुआ को हमेशा तो वहाँ नहीं रहना था| उनका ट्रांसफर हुआ और एक मिस्टर सिंह उनके स्थान पर आए| महाप्रबंधक से निचले स्टार के लॉयंस क्लब में सक्रिय अधिकारियों ने लॉयन्स क्लब का एक प्रोग्राम रखा और मिस्टर सिंह के पास उसके लिए आमंत्रित करने गए| इस पर मिस्टर सिंह बोले- ‘न मैं जाऊंगा और न तुमको जाने दूंगा| आप यहाँ बिजली पैदा करने आए हैं या ये सब करने आए हैं|’

हर व्यक्ति की इस संबंध में अपनी फिलोसफ़ी है| कुछ लोग सिर्फ सिस्टम का पुर्जा बने रहना पसंद करते हैं, कुछ इन सीमाओं का बार-बार अतिक्रमण करते हैं|

मेरे अपने सेवाकाल के दौरान मैंने ऐसे कई लोगों से प्रेरणा प्राप्त की और स्वयं भी ऐसा व्यक्ति बनने की कोशिश की, जिससे कोई भी व्यक्ति अपने मन की बात कह सकता है, आपकी कमी भी बता सकता है| जबकि एक-दो अधिकारी ऐसे भी थे, जिनके बारे में सभी जानते थे कि उनसे सहज होकर कुछ देर बात करना भी संभव नहीं है| कुछ ही देर में उनके सहज व्यवहार की सीमा समाप्त हो जाती है और किसी न किसी बहाने से ब्लास्ट पाइंट आ जाता है|

आज ऐसे ही खयाल आया कि इन आत्म मुग्ध किस्म के प्राणियों को श्रद्धांजलि दी जाए|

जबकि मैं यह आलेख समाप्त करने को था तभी यह खबर मिली कि प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और मेहनती कलाकार सुशांत सिंह राजपूत ने अपने मुंबई स्थित निवास में आत्महत्या कर ली| ये परेशानियाँ सिर्फ पैसे की कमी से ही नहीं होतीं जी! सबको संतोष प्राप्त हो यही कामना है| ऐसा प्रतिभाशाली कलाकार जिससे समाज को ऐसी अनेक प्रभावशाली भूमिकाएँ निभाए जाने की उम्मीद रहती है, उसके अचानक चले जाने और इस मामले में तो हथियार डाल देने की जानकारी मिलने पर बहुत दुख होता है|

क्यों ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति, और ऐसा सफल व्यक्ति, जीवन में अंदर ही अंदर घुटता रहता है और दुनिया को तभी मालूम होता है जब वह आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम उठा लेता है| काश ये दुनिया ज्यादा रहने लायक होती|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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