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हम उसी प्यास के समन्दर थे !

आज मैं हिन्दी गीत कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी अत्यंत भावुक और सृजनशील कवि थे और उनको कवि सम्मेलनों में बहुत आदर के साथ सुना जाता था|

अवस्थी जी का यह गीत भी एक अलग प्रकार के अनुभव को चित्रित करता है, कैशौर्य और युवावस्था के वे बेफिक्री भरे दिन, अलग ही तरह के होते हैं| लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए-

 

 

याद आते हैं फिर बहुत वे दिन
जो बड़ी मुश्किलों से बीते थे !

 

शाम अक्सर ही ठहर जाती थी
देर तक साथ गुनगुनाती थी !
हम बहुत ख़ुश थे, ख़ुशी के बिन भी
चाँदनी रात भर जगाती थी !

 

हमको मालूम है कि हम कैसे
आग को ओस जैसे पीते थे !

 

घर के होते हुए भी बेघर थे
रात हो, दिन हो, बस हमीं भर थे !
डूब जाते थे मेघ भी जिसमें
हम उसी प्यास के समन्दर थे !

 

उन दिनों मरने की न थी फ़ुरसत,
हम तो कुछ इस तरह से जीते थे !

 

आते-जाते जो लोग मिलते थे
उनके मिलने में फूल खिलते थे !
ज़िन्दगी गंगा जैसी निर्मल थी,
जिसमें हम नाव जैसे चलते थे !

 

गंगा की ऊँची-नीची लहरों से
हम कभी आगे कभी पीछे थे !

 

कोई मौसम हो हम उदास न थे
तंग रहते थे, पर निराश न थे !
हमको अपना बना के छोड़े जो
हम किसी ऐसे दिल के पास न थे !

 

फूल यादों के जल गए कब के
हमने जो आँसुओं से सींचे थे ।

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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