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मायानगरी का स्वर्ण मृग !

आज मुंबई की मायानगरी की बात कर लेते हैं, जिसे लोग हॉलीवुड की तर्ज पर बॉलीवुड भी कहते हैं| एक से एक प्रतिभाएँ रही हैं इस मुंबई में, और यह क्षेत्र भारत का फिल्मी देवलोक जैसा लगता है|

 

 

मुंबई मायानगरी का हिस्सा रहे महान कलाकारों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि कोई नाम गिनाने लगे तो जितने नाम वह बताएगा उससे दो गुने छूट जाएंगे| मेरे उस्ताद और सपनों के सौदागर- महान शोमैन राजकपूर भी इसी नगरी में थे, जिनके सपनों का महल आर के स्टूडिओ भी आज बिक चुका है| मेरे परम प्रिय गायक – मुकेश जी भी इसी नगरी का हिस्सा थे, जिनकी निश्छल आवाज आज भी हमारे मन में गूँजती है- ‘सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है’| जैसा मैंने पहले कहा इतने महान लोग, नाम लेना शुरू करें तो ये सिलसिला समाप्त ही नहीं होगा- निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, गीतकार, संगीतकार, गायक, टैकनीशियन आदि-आदि| हजारों लोगों ने इस मायानगरी से अपनी पहचान बनाई है|

मुंबई की यह मायानगरी हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली प्रतिभाओं से भरी पड़ी है, लोग यहाँ अपनी किस्मत आज़माने के लिए आते ही रहते हैं और एक बार जो जनता के दिल पर अपनी छाप छोड़ देता है, लोग उसको अपने सिर-आँखों पर बिठाते हैं|

ये दुनिया है यहाँ पर आना-जाना तो लगा ही रहता है, पिछले दिनों हमने ऋषि कपूर और इरफान खान जैसे महान कलाकारों को असमय खो दिया| यह सिलसिला तो चलता ही रहता है, जब ऊपर वाला बीमारी के बहाने या किसी दुर्घटना के कारण किसी को अपने पास बुला लेता है|

लेकिन हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत जिस प्रकार गए, वह अत्यंत हृदय विदारक है और इस फिल्मी नगरी की मानवीयता पर बहुत से गंभीर प्रश्न खड़े करता है|

ये ऐसी दुनिया है, जहां एक बार जब कोई कलाकार जनता का दिल जीत ले तो लोग उसे कंधों पर उठा लेते हैं, ऐसी ऊंचाई प्रदान करते हैं, जिसकी कहीं और कल्पना नहीं की जा सकती है| यही कारण है कि यहाँ कंपिटीशन भी बहुत तगड़ा है| लोग घर से सीधे भागकर कर या बाकायदा फिल्मों से जुड़े कोर्स करके, थिएटर के माध्यम से, अनेक प्रकार से यहाँ आते हैं|

दूसरी तरफ वे लोग हैं जो पहले से इस परिवार का हिस्सा हैं| वे किसी फिल्मी घराने से हैं, अथवा पहले कुछ फिल्में कर चुके हैं और अब जनता को उतना प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं| ऐसे में कुछ लोग घेरेबंदी करते, चक्रव्यूह रचते हैं| दूर किसी छोटे से इलाके से आया संवेदनशील कलाकार जब अचानक ऊंचाई प्राप्त कर लेता है, तब वह प्रसिद्ध तो होता है लेकिन साथ ही अकेला भी हो जाता है| अपनी मुसीबतों को वह किसी से शेयर भी नहीं कर पाता| सुशांत सिंह राजपूत, जैसा उनको देखने से ही लगता था, अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति थे, ऐसा सुना गया है कि पिछले 6 महीनों में उनसे एक-एक करके 7 फिल्में छीन ली गईं| लॉबी वाले ये खलनायक न जाने कितनी प्रतिभाओं को मुंबई से और कभी जीवन से भी पलायन करने पर मजबूर कर देते हैं|

इस घटना के बाद मुझे लगता है कि और जागरूकता आएगी और ऐसे दुष्ट लोगों को कानूनी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ेगा|

एक विचार मेरे मन में आ रहा है, मुंबई में जहां फिल्म नगरी में इस प्रकार की घृणित लॉबी काम करती है, वहीं ठाकरे बंधु और उनकी नफरत की राजनीति करने वाली पार्टियों के छुटभैये भी आए दिन अन्य प्रदेशों से आने वालों को धमकाते रहते हैं| मैं समझता हूँ कि जिस प्रकार नोएडा में छोटी सी फिल्म-नगरी बनाई गई है, उसी प्रकार अन्य स्थानों पर भी राज्य सरकारों द्वारा फिल्म निर्माण के लिए स्थान, इन्फ्रा स्ट्रक्चर और प्रोत्साहन प्रदान किया जाए| क्या ही अच्छा हो कि कई फिल्म नगरी विकसित हो जाएँ, उनके बीच प्रतियोगिता हो, जिससे अन्य राज्य भी विकसित हों और इन छुटभैये लोगों की दादागिरी भी समाप्त हो|
ऐसे ही यह विचार आया कि फिल्मी दुनिया किसी प्रकार और अधिक मानवीय और नई प्रतिभाओं का खुले दिल से स्वागत करने वाली बन सके|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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