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खेल-खिलौने- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Playthings’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

 

खेल-खिलौने

 

अरे बालक, कितने खुश होकर तुम धूल में बैठे रहते हो, पूरी सुबह, एक टूटी टहनी से खेलते हुए|
मैं मुस्कुराता हूँ, तुम्हें उस छोटी से टूटी टहनी से खेलते देखकर|
मैं अपने हिसाब-किताब में व्यस्त हूँ, घंटों संख्याओं को जोड़ते हुए|

 

शायद तुम मेरी तरफ देखकर सोचते हो, “अपनी सुबह को बर्बाद करने का यह कैसा मूर्खतापूर्ण तरीका है!”
बच्चे, मैं डंडियों और मिट्टी के साथ खेल में व्यस्त रहने की कला भूल चुका हूँ|
मैं महंगे खिलौनों की खोज में रहता हूँ, और सोने-चांदी के ढेर लगाता हूँ|

 

तुम्हें जो कुछ भी मिलता है, उससे तुम खुशी देने वाले खेल सृजित कर लेते हो, मैं अपना समय और शक्ति, दोनों बर्बाद करता हूँ, ऐसी वस्तुओं पर, जिन्हें मैं कभी नहीं पा सकूँगा|

 

अपनी कमजोर सी नौका से, मैं पार करना चाहता हूँ अपनी अभिलाषाओं का समुद्र, और यह भूल जाता हूँ कि मैं भी एक खेल ही खेल रहा हूँ|

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Playthings

Child, how happy you are sitting in the dust, playing with a broken twig all the morning.
I smile at your play with that little bit of a broken twig.
I am busy with my accounts, adding up figures by the hour.
Perhaps you glance at me and think, “What a stupid game to spoil your morning with!”
Child, I have forgotten the art of being absorbed in sticks and mud-pies.
I seek out costly playthings, and gather lumps of gold and silver.
With whatever you find you create your glad games, I spend both my time and my strength over things I never can obtain.
In my frail canoe I struggle to cross the sea of desire, and forget that I too am playing a game.

 

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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4 replies on “खेल-खिलौने- रवीन्द्रनाथ ठाकुर”

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