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छोड़ दो ये – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Leave This’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

छोड़ दो ये



छोड़ दो ये भजन गाना, मंत्र जपना और माला फेरना!
किसकी पूजा करते हो तुम, मंदिर के एकांत अंधेरे कोने में, जबकि सभी दरवाजे बंद हैं?
अपनी आँखें खोलो और देखो, तुम्हारा ईश्वर तुम्हारे सामने नहीं है!

वह है वहां, जहां हलवाहा किसान कठोर जमीन जोत रहा है
और जहां पथ निर्माता पत्थर तोड़ रहा है|
वह उनके साथ है, धूप में और बारिश में,
और उसके कपड़ों पर धूल जमी है|
अपना आवरण उतारो और उसकी ही तरह धूल भरी मिट्टी में आ जाओ!

मुक्ति?
मुक्ति कहाँ मिल सकेगी?
हमारे स्वामी ने स्वयं ही सहर्ष सृजन के सभी बंधन स्वीकार किए हैं;
वह हमेशा के लिए हमारे साथ संबंध में बंधा है|

अपनी ध्यान मुद्रा से बाहर आओ, अपने पुष्पों और सुगंधियों को रहने दो!
क्या फर्क पड़ता है यदि तुम्हारे कपड़े जीर्ण और दागदार हो जाएँ?
उससे वहाँ मिलो और साथ खड़े रहो, अपने माथे पर पसीने के साथ|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Leave This


Leave this chanting and singing and telling of beads!
Whom dost thou worship in this lonely dark corner of a temple with doors all shut?
Open thine eyes and see thy God is not before thee!

He is there where the tiller is tilling the hard ground
and where the pathmaker is breaking stones.
He is with them in sun and in shower,
and his garment is covered with dust.
Put off thy holy mantle and even like him come down on the dusty soil!

Deliverance?
Where is this deliverance to be found?
Our master himself has joyfully taken upon him the bonds of creation;
he is bound with us all for ever.

Come out of thy meditations and leave aside thy flowers and incense!
What harm is there if thy clothes become tattered and stained?
Meet him and stand by him in toil and in sweat of thy brow.


-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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दो पल के जीवन से, एक उम्र चुरानी है!

पिछले सप्ताह में ही मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का जन्मदिन आया था और उसके बाद विख्यात निर्माता, निर्देशक और अभिनेता- मनोज कुमार जी का भी जन्मदिन आया जो अब 83 वर्ष के हो गए हैं| मनोज जी जहां एक बहुत अच्छे अभिनेता रहे वहीं उन्होंने राष्ट्रीयता की भावना से भारी बहुत प्यारी फिल्में भी बनाई हैं| एक और खास बात कि स्वर्गीय राज कपूर जी की तरह मनोज कुमार जी ने भी मुकेश जी की मधुर आवाज का भरपूर उपयोग अपनी फिल्मों में किया है|


आज मैं इन दोनों से जुड़ा एक गीत फिल्म- शोर से प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसे लिखा था संतोषानंद जी ने और लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी और लता जी ने गाकर इस गीत को अमर बना दिया था| एक और बात इस गीत में वायलिन का बहुत सुंदर उपयोग किया गया है|
लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-



एक प्यार का नगमा है
मौजों की रवानी है,
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|
एक प्यार का नगमा है||

कुछ पाकर खोना है,
कुछ खोकर पाना है,
जीवन का मतलब तो,
आना और जाना है|
दो पल के जीवन से,
इक उम्र चुरानी है|

ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|

एक प्यार का नगमा है||

तू धार है नदिया की,
मैं तेरा किनारा हूँ|
तू मेरा सहारा है,
मैं तेरा सहारा हूँ|
आँखों में समंदर है,
आशाओं का पानी है|


ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|
एक प्यार का नगमा है||


तूफान को आना है,
आकर चले जाना है,
बादल है ये दो पल का,
छाकर ढल जाना है|
परछाइयाँ रह जातीं,
रह जाती निशानी है|

ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|
एक प्यार का नगमा है||



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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हमको दिवाना तुमको, काली घटा कहेंगे!

हमारी फिल्में हों अथवा कहानी हो, उपन्यास हो, इन सबमें जीवन को ही तो चित्रित किया जाता है| और जीवन में अच्छे-बुरे सभी तरह के अनुभव होते हैं| जैसे दर्द भरे नगमे भी हमारी फिल्मों में बहुत सारे हैं, देशभक्ति के भी हैं, किसी भी भाव के लिए, जो हमारे मन में आ सकता है, उससे जुड़े हुए गीत हमारी फिल्मों में मिल जाएंगे|


आज रोमांस और मस्ती से जुड़ा एक युगल गीत यहाँ शेयर कर रहा हूँ| यह गीत मजरूह सुल्तानपुरी जी ने लिखा है और ‘गंगा की लहरें’ फिल्म के लिए किशोर कुमार जी और लता मंगेशकर जी ने बड़े मस्ती भरे अंदाज़ में गाया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-



-छेड़ो न मेरी जुल्फें,
सब लोग क्या कहेंगे|

-हमको दिवाना तुमको
काली घटा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||

-आती है शर्म हमको
रोको ये प्यारी बातें|

-जो तुम को जानते हैं,
वो जानते है तुम्हारी बातें|

तुम कह लो शर्म इसको
हम तो अदा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||


-मैं प्यार हूँ तुम्हारा
मेरा सलाम ले लो|


-तुम इस को प्यार समझो
तुम इसको
चाहत का नाम दे लो,
लेकिन ज़माने वाले
इस को खता कहेंगे|

-हम को दिवाना तुमको
काली घटा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||

-तौबा तेरी नज़र के
मस्ती भरे इशारे|


-देखेंगे हमको तुमको
जो मुस्करा के सारे,
उल्फत में दो दिलों को
बहका हुआ कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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What is truth?

Let’s talk a bit about truth. What is truth? Often it happens that we gather a number of facts and build a narrative to present something that we want people to believe and accept as truth.


Firstly I would like to quote a Shair by Urdu poet Krishna Bihari ‘Noor’ Ji, he says-


सच घटे या बढ़े तो सच न रहे,
झूठ की कोई इंतेहा ही नहीं|

Which means that if we add a little bit to the truth or decrease it a little bit, it does not remain truth, but when we are presenting some false picture, when we opt to tell lies, there is no limit about how far we can go.


We often listen to political leaders speaking about their parties, their values and achievements. They often know the art of presentation. They build a narrative by choosing the positive points associated with their party and appear to be quite convincing. When we listen to the party opposing them, then also we appear to be convinced. Same is the case with lawyers presenting the case of the victim or accused. The reason being that they choose the points which go in their favor to build the narrative and present the case.


For example, if we talk about the congress party in India, and some leader tells about the past achievements of the party, their role in the freedom movement, he can very well impress. But the fact remains that the congress party of today is in no way, the party that participated in the freedom struggle. The fact remains that it only has the same name, nothing else. Congress of that time was actually a movement, with all who wanted to fight for freedom gathered together for that mission. Today it has become a family owned party as per my narrative. But still one can present it any other way.


There could be so many examples, like the Sushant Singh Rajput suicide case. Suddenly we find that the Bollywood film fraternity appears to be having so many villains. Those people must have always been there, but suddenly when we find that a sensitive and creative young person lost his life due to bad behavior of some people there, this truth has surfaced. The guilty must be punished but the fact remains that the industry is the same which we adored earlier. There have always been all type of persons there. The nice people must be appreciated and the wicked must be exposed and punished, according to their acts.


Actually, truth does differ from person to person! For us truth is the way we see it. The color of the glasses we wear, we may call it our ideology or say political leaning, does determine how we see a particular activity, organisation or may be a person. There are people in the field of journalism who would never find anything done by Mr. Modi to be a positive step, while they never have the courage to oppose the senseless utterings of Mr. Rahul Gandhi, who keeps doing so.


So I would like to conclude that everybody has his or her own version of truth, depending on how he or she perceives it, political leaning and also vested interests, for which many people become part of some very powerful lobbies sometimes.


One more thing, in case of some activity done by somebody, whether it is some criminal act or one which benefits the society and which can’t be ignored by anybody, we can say that it is ‘naked truth’, since we can’t ignore some facts, inspite of the glasses of some ideology we wear, we can say that ‘it is naked truth’.

One more thing, in the present circumstances it is not easy to say that truth always wins, but I feel that our efforts and our faith should be so strong that it does make it happen. In any circumstances we must not lose this faith.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Why is it so difficult to establish the truth? Why is it called naked truth? Does truth really win? #NakedTruth

Thanks for reading.



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सर्द है अंगार की भाषा!

हिन्दी काव्य मंचों के अद्भुद हस्ताक्षर माननीय सोम ठाकुर जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| यह गीत मंचों के मतलब का कम और पढ़ने और मनन करने का अधिक है| गीत में हमारे भटकाव और लक्ष्यों के ओझल होने की बात है| गीत में हमारे रोशनी से भरे संकल्पों की भी बात की गई है|


लीजिए प्रस्तुत है सोम ठाकुर जी का यह अनूठा गीत –




दिन चढ़े ही भूल बैठे हम
धूप के परिवार की भाषा,
बोलती है रोशनी भी अब
मावसी आँधियार की भाषा|

गालियाँ देगी उन्हे मंज़िल
वक्त उनके नाम रोएगा,
भोर का इतिहास भी उनकी
सिर्फ़ ज़िंदा लाश ढोएगा,
नाव पर चढ़कर करेंगे जो
अनसुनी मझदार की भाषा|

स्वप्न हैं बेशक बहारों के
है ज़रूरत आगमन की भी,
मानते है बेड़ियाँ टूटी
तोड़िए जंजीर मन की भी,
गीत – क्षण से कर सकेंगे हम
प्यास को संसार की भाषा|

तू थकन का नाम मत ले रे
पर्वतों को पार करना है,
मरुथलों को मेघ देने हैं
फागुनो में रंग भरना है,
रंज है इस बात का हमको
सर्द है अंगार की भाषा|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं!

आज फिर से दुष्यंत कुमार जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक प्रतिनिधि कवि थे लेकिन उनको सामान्य जनता के बीच विशेष ख्याति आपातकाल में लिखी गई गज़लों के कारण मिली थी, जिनको बाद में एक संकलन – ‘साये में धूप’ के रूप में प्रकाशित किया गया|


प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी के इसी संकलन से यह गजल-


कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं|

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं|

वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको,
क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं|

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,
जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं|

मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने,
उस तरफ़ जाने से क़तराने लगे हैं|

मौलवी से डाँट खा कर अहले-मक़तब,
फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं|

अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम,
आदमी को भूल कर खाने लगे हैं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं!

आज फिर से दुष्यंत कुमार जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक प्रतिनिधि कवि थे लेकिन उनको सामान्य जनता के बीच विशेष ख्याति आपातकाल में लिखी गई गज़लों के कारण मिली थी, जिनको बाद में एक संकलन – ‘साये में धूप’ के रूप में प्रकाशित किया गया|
प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी के इसी संकलन से यह गजल-


नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं,
जरा-सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं|

वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है,
मेरे बयान को बंदिश निगल न जाए कहीं|

यों मुझको ख़ुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन,
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं|

चले हवा तो किवाड़ों को बंद कर लेना,
ये गरम राख़ शरारों में ढल न जाए कहीं|

तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है,
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं|

कभी मचान पे चढ़ने की आरज़ू उभरी,
कभी ये डर कि ये सीढ़ी फिसल न जाए कहीं|

ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते है,
चलो यहां से चलें, हाथ जल न जाए कहीं|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता!

उर्दू के विख्यात शायर निदा फाजली साहब की एक गजल शेयर कर रहा हूँ, निदा साहब बड़ी सहज भाषा में बहुत गहरी बात कह देते हैं| उनकी कुछ पंक्तियाँ जो बरबस याद आ जाती हैं, वे हैं- ‘मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’, ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए’, ‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’|

couple romancing

लीजिए आज उनकी इस गजल का आनंद लेते हैं-

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता,
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता|

सब कुछ तो है, क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें,
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता |

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता|

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता|

वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है ,
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नहीं जाता |

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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कैसा मौसम है ये!

आज हम ऐसे समय में चल रहे हैं जिसकी न किसी ने पहले कल्पना की होगी और निश्चित रूप से किसी ने इसकी कामना तो नहीं ही की होगी| जी हाँ कोरोना की महामारी का यह काल, पूरी मानव जाति को इसने त्रस्त करके रखा है| सब यही सोचते रहते हैं कि कब यह दौर समाप्त होगा, कब हम पहले की तरह अपनी ज़िंदगी जी पाएंगे|


हम पहले फिल्मों आदि में देखते थे कि किसी दूसरे ग्रह के प्राणियों के चेहरे कुछ अलग तरह के होते हैं, या जैसा ‘पेपा पिग’ आदि में हम देखते हैं, आज इंसानों की हालत कुछ वैसी ही हो गई है|


मैं अब गोवा में रहता हूँ (यद्यपि फिलहाल बंगलौर में हूँ)| गोवा जैसे अनेक नगर और राज्य तो ऐसे हैं जिनकी आमदनी का मुख्य स्रोत ही पर्यटन है| लेकिन फिलहाल जहां अर्थव्यवस्था पर अनेक गंभीर संकट आए हैं, वहीं पर्यटन पर तो शायद इस महामारी की मार सबसे ज्यादा पड़ी है|


ऐसे में कवि बिहारी जी की एक सतसई याद आ गई, जिसमें वह प्रेमी नायक द्वारा सिर्फ अपने नयनों से ही की जाने वाली विभिन्न अभिव्यक्तियों का बहुत सुंदर चित्रण कराते हैं –


कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन मैं करत हैं नैननु ही सब बात॥


इस सतसई के प्रसंग को याद करके ये खयाल आया कि जब प्रेमी-प्रेमिका नयनों के माध्यम से ही ये सारे संप्रेषण, ये अभिव्यक्ति करते हैं, तब वे भले ही कोई शब्द न बोलते हों, परंतु उनके होंठ, उनकी नासिका, उनके गाल आदि भी कुछ योगदान उनके इस संप्रेषण में करते हैं, जैसे गालों में गड्ढे पड़ जाना, जैसे कहते हैं सुर्ख लाल हो जाना आदि| मतलब ऐसी बॉडी लैंग्वेज़, जिसका संबद्ध उनके चेहरे से ही है| आज मुह पर मास्क लगाकर, जबकि केवल आँखें ही दिखाई देती हैं, आँखों से ही किया जाने वाला, ये संप्रेषण कुछ और मुश्किल हो जाता न बिहारी जी!


कहते हैं न- ‘बरबादियों का जश्न मनाता चला गया’| तो इस तरह की बातें सोचकर ही हम कोरोना से कह सकते हैं कि ऐसी मुसीबत हमने पहले नहीं देखी है, लेकिन हम मनुष्य, हम भारतवासी इसका सामना करने के लिए तैयार हैं| एक तरह से हमारे सक्रिय जीवन-काल से यह अवधि, शायद कुल मिलाकर 7-8 महीने की, कम हो गई है| हम आशा करते हैं कि तब तक कोरोना वेक्सीन के कारण और हमारे सम्मिलित प्रयासों के बल पर इस दुष्ट दानव का अंत हो जाएगा|


सामाजिकता की सारी गतिविधियों को, सारे आयोजनों को इस दुष्ट महामारी ने ध्वस्त करके रख दिया है| कई ऐसी घटनाएँ हुईं कि जरा सी लापरवाही बहुत महंगी पड़ गई| जैसे एक विवाह में दूल्हा कहीं से बीमारी लेकर आ गया था और वैवाहिक आयोजन के माध्यम से बहुत सारे लोगों को अपने साथ लेकर चला गया| इसलिए इस माहौल में बहुत फूँक-फूँक कर कदम रखने की ज़रूरत है| यह समय बहादुरी दिखाने का बिलकुल नहीं है| कहते हैं न कि ‘दिल की बाज़ी, जो हारा- वही जीता’ इसी तरह इस दुष्ट महामारी का मुक़ाबला धैर्य और सावधानी के साथ करना होगा| इसको चुनौती देने से काम नहीं चलेगा|

यही कामना है कि मानव समुदाय इस संकट पर शीघ्र विजय प्राप्त करे और हम सभी फिर से अपना जीवन पूर्णता के साथ जी सकें| जहां मन हो वहाँ आने-जाने का मौसम फिर से लौटकर आए|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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पुष्पों का विद्यालय – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Flower School’ का भावानुवाद-




गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


पुष्पों का विद्यालय



तूफानी बादल जब आकाश में गरजते हैं और जून माह की वर्षा बौछार धरती पर आती है|
नमी से भरी पुरवाई जब रेतीले मैदानों पर आगे बढ़ती आती है
बांस वनों में अपना मधुर वाद्य बजाने के लिए|


तब अचानक पुष्प टोलियों में प्रकट हो जाते हैं, कोई नहीं जानता कहाँ से
और घास के ऊपर वे जंगली मस्ती में नृत्य करते हैं|
माँ, मुझे वास्तव में ऐसा लगता है की पुष्प किसी भूमिगत विद्यालय में जाते हैं|


बंद दरवाजों के भीतर वे अपने पाठ पढ़ते हैं, और यदि वे चाहते हैं कि
नियत समय से पहले वे बाहर आकर खेलें, तो उनके शिक्षक उनको
किनारे पर खड़ा कर देते हैं|
जब वर्षा आती है, तब उनकी छुट्टियाँ हो जाती हैं|


जंगल में शाखाएँ आपस में उलझ जाती हैं, और पत्तियाँ सरसराती हैं
जंगली हवा के कारण, तूफानी बादल अपने विशाल हाथों से तालियाँ बजाते हैं, और
बालक पुष्प बाहर आते हैं अपने गुलाबी, पीत और श्वेत वस्त्रों में|


क्या तुम जानती हो माँ, उनका घर आकाश में वहाँ है, जहां सितारे हैं|
क्या तुमने यह नहीं देखा कि वे वहाँ जाने के लिए इतने आतुर क्यों हैं? क्या तुम
यह नहीं जानतीं कि वे इतनी जल्दी में क्यों हैं?


बेशक, मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि वे किसकी ओर अपना हाथ उठाते हैं; उनकी भी माँ है, जैसे मेरी है|



-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



The Flower School


When storm-clouds rumble in the sky and June showers come down.
The moist east wind comes marching over the heath to blow its
bagpipes among the bamboos.
Then crowds of flowers come out of a sudden, from nobody knows
where, and dance upon the grass in wild glee.
Mother, I really think the flowers go to school underground.
They do their lessons with doors shut, and if they want to
come out to play before it is time, their master makes them stand
in a corner.
When the rain come they have their holidays.
Branches clash together in the forest, and the leaves rustle
in the wild wind, the thunder-clouds clap their giant hands and the
flower children rush out in dresses of pink and yellow and white.
Do you know, mother, their home is in the sky, where the stars
are.
Haven’t you see how eager they are to get there? Don’t you
know why they are in such a hurry?
Of course, I can guess to whom they raise their arms; they
have their mother as I have my own.


-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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