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तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको!

आज मैं कतील शिफाई जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| इस गजल के कुछ शेर जगजीत सिंह जी ने भी गाए हैं| बड़ी सुंदर गजल है, आइए इसका आनंद लेते हैं-

 

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको,
मैं हूँ तेरा,तू नसीब अपना बना ले मुझको|

 

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी,
ये तेरी सादादिली मार न डाले मुझको|

 

मैं समंदर भी हूँ, मोती भी हूँ, ग़ोताज़न भी,
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको|

 

तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी,
ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको|

 

कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ,
जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको|

 

ख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन-दामन,
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको|

 

मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन,
मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको|

 

मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामाँ प्यारे,
तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको|

 

तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम,
तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझको|

 

वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ “क़तील”,
शर्त ये है कोई बाँहों में सम्भाले मुझको|

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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