ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं!

आज फिर से दुष्यंत कुमार जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक प्रतिनिधि कवि थे लेकिन उनको सामान्य जनता के बीच विशेष ख्याति आपातकाल में लिखी गई गज़लों के कारण मिली थी, जिनको बाद में एक संकलन – ‘साये में धूप’ के रूप में प्रकाशित किया गया|
प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी के इसी संकलन से यह गजल-


नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं,
जरा-सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं|

वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है,
मेरे बयान को बंदिश निगल न जाए कहीं|

यों मुझको ख़ुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन,
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं|

चले हवा तो किवाड़ों को बंद कर लेना,
ये गरम राख़ शरारों में ढल न जाए कहीं|

तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है,
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं|

कभी मचान पे चढ़ने की आरज़ू उभरी,
कभी ये डर कि ये सीढ़ी फिसल न जाए कहीं|

ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते है,
चलो यहां से चलें, हाथ जल न जाए कहीं|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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