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आवारा, छलिया, अनाड़ी, दीवाना!

हाल ही में मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी की पुण्य तिथि पर उनका एक गीत शेयर किया था| आज मन है कि स्वर्गीय राज कपूर जी के साथ उनके अंतरंग संबंध को याद करूं| राजकपूर जी के अधिकांश गाने मुकेश जी ने गाए थे| राज कपूर जी और मुकेश जी मानो दो जिस्म एक जान थे| जब मुकेश जी की मृत्यु हुई तब राज साहब ने कहा था कि मेरी तो आवाज़ ही चली गई! जिस्म रह गया है और आत्मा जा चुकी है| एक बड़ा ही सुरीला समूह था| राज साहब, मुकेश जी, शैलेंद्र-हसरत जयपुरी, शंकर जयकिशन, लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आदि|


मुकेश साहब क्योंकि राज साहब की फिल्मी यात्रा के हमसफर थे, इसीलिए यह गीत जिसमें राज साहब की कुछ भूमिकाओं का ज़िक्र किया गया है, कल्लू-क़व्वाल के बहाने से, इसे भी अभिव्यक्ति मुकेश जी ने दी है| वर्ष 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म- दूल्हा-दुल्हन के लिए, गुलशन बावरा जी का लिखा यह गीत मुकेश जी और लता मंगेशकर जी ने बड़े सुंदर ढंग से – कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में गाया था| कल्याणजी आनंदजी का भी मुकेश जी के साथ काफी अच्छा साथ रहा है|

एक बात और राज कपूर साहब ने साधारण इन्सानों की भूमिकाएँ बहुत निभाई हैं, जैसे कोई गाँव से आया है नौकरी की तलाश में और कैसे सीधेपन से वह चालाकी की तरफ बढ़ता है| यहाँ तक कि जेबकतरा भी- ‘शहजादे तलवार से खेले, मैं अश्कों से खेलूँ’|


लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-

मुझे कहते हैं कल्लू कव्वाल-कल्लू कव्वाल
कि तेरा मेरा तेरा मेरा साथ रहेगा|


मैं हूँ ठुमरी तो तू है ख़याल
तेरा मेरा साथ रहेगा|

मुझे कहते हैं कल्लू क़व्वाल|


-राजा मैं गीतों का तू सुर की रानी
तू सुर की रानी


गा के सुनाएं हम अपनी कहानी,
अपनी कहानी|

-तू मेरे गीतों की है ज़िंदगानी


-तेरे गीतों में
तेरे गीतों में है वो कमाल, ओ कल्लू कव्वाल
तेरा मेरा …


-सूरत से पहचाने, मुझको ज़माना
मुझको ज़माना|


आवारा छलिया अनाड़ी दीवाना
अनाड़ी दीवाना|


कैसा हूँ दिल का किसी ने न जाना|

-नहीं दुनिया में तेरी मिसाल ओ कल्लू कव्वाल
तेरा मेरा मेरा साथ रहेगा|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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Remembering My Teachers

Next week we would be observing ‘Teachers day’ in India on the occasion of birthday of our Ex President and great scholar Late Sarvapalli Radhakrishnan JI. On this occasion I am also remembering some incidents connected with my teachers. These incidents I have also mentioned in my earlier blog posts, when I covered the major incidents of my life.


Let me mention once again that in my initial years I lived and studied in Shahdara, and my first school was Sanatan Dharm Pathshala and later Babu Ram Government Model School, both located near my house in Bhola Nath Nagar, Shahdara.


I remember very few teachers of the second school, where I completed my studies up to higher secondary level. One was Mr. Manohar Lal, the Hindi teacher, who was a good orator, normally he conducted the morning assembly and the stage programs. He often wore a Nehru jacket and displayed a rose flower on that. I was a very shy student, good at studies but never a topper.

I remember it happened only once that I presented a poem before the whole school from the stage, it was a great experience that time, though in the later part of my service life I had great romance with the ‘mike’ and conducted big public programs.


There was one drawing teacher when I was in 9th standard I think, he often asked me to sing before the class, when he came to know that I sang film songs very well, specially those sung by my favorite singer late Mukesh Ji.


There were three English teachers whom I remember. One was a Sardar Ji, a good teacher no doubt, but that time it was the first time that I saw a Sardar Ji in teaching profession and that too teaching English. Till then I had seen Sardar jI people in different kind of professions. However it was my impression that time only.


One of our English teachers was Mr. O.P. Sharma was quite fat and he often said- ‘If I give you my pant, it would serve you as a tent’. He also told us that Dev Anand the actor was his nephew. One incident that I remember is when Mr. O.P. Sharma came to our class in arrangement, means when the concerned teacher for that period was not available. He asked us to write an essay on the topic-‘If I were a Mali (Gardener).

All the students wrote and read out their essays. He kept commenting after every one or two sentences. On my turn I was also expecting such interjections, so I myself stopped at regular intervals but he asked me to continue and finally clapped for me. I had presented the Mali in my essay like a caring parent, who takes care of his wards. His final comment on my submission was ‘You are a freelancer’. That time I didn’t know the meaning of this word also.


After a day or two Mr. Sharma came to our class and asked whether I have a copy of the essay that I had written. I told him that I had written it on a rough page and then thrown in the dustbin.


Another English teacher whom I appreciated a lot was Mr. Harish Chandra Goswami, he loved me a lot and a very sincere and kind teacher. It was perhaps due to such devoted teachers that our government school had the word ‘Model’ included in its name ‘Model Higher Secondary School’, however after I finished my studies at Babu Ram School, Mr. Goswami caught a student copying in the exams and that cruel fellow stabbed the teacher and killed him. The word ‘Model’ then disappeared from the name of our school.


There could be many incidents connected with my school life, however this was something that instantly came to my mind.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Share one unforgettable and your favorite personal moment with your teacher. #teachersday

Thanks for reading.


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मैं बेचैन हूँ- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Am Restless’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



मैं बेचैन हूँ!



मैं बेचैन हूँ, मुझमें गहन प्यास है, सुदूर स्थित वस्तुओं की|
मेरी आत्मा में तड़प है, अत्यधिक धुंधली दिखाई देती दूरी के घेरे को छूने की| हे विशाल सुदूर, अरी ओ बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि उड़ान के लिए मेरे पास पंख नहीं हैं, कि मैं हमेशा के लिए इस स्थल में बंद हूँ|

मैं इच्छुक हूँ और जागृत भी, मैं अजनबी हूँ, एक अजाने स्थान पर, तुम्हारा श्वास मुझ तक आता है, मुझे एक असंभव आशा की सूचना देते हुए|
तुम्हारी जिव्हा को मेरा हृदय, अपनी स्वयं की जिव्हा के रूप में जानता है|
अरे पहुँचने हेतु सुदूर, अरे बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि मुझे मार्ग नहीं मालूम है, कि मेरे पास कोई पंखों वाला घोड़ा नहीं है|

मैं उदासीन हूँ, मेरे हृदय में भटकाव है|
निस्तेज घड़ियों के धूपिया धुंधलके में, नीलाकाश में, आपका कैसा दर्शन आकार लेता है!
अरे सुदूर छोर, अरे बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि उस घर के दरवाजे- सभी तरफ से बंद हैं, जिसमें मैं अकेला रहता हूँ!



-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-





I Am Restless



I am restless. I am athirst for far-away things.
My soul goes out in a longing to touch the skirt of the dim distance.
O Great Beyond, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that I have no wings to fly, that I am bound in this spot evermore.


I am eager and wakeful, I am a stranger in a strange land.
Thy breath comes to me whispering an impossible hope.
Thy tongue is known to my heart as its very own.
O Far-to-seek, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that I know not the way, that I have not the winged horse.


I am listless, I am a wanderer in my heart.
In the sunny haze of the languid hours, what vast vision of thine takes shape in the blue of the sky!
O Farthest end, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that the gates are shut everywhere in the house where I dwell alone!



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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ये जो मन की सीमा-रेखा है!

पिछले लगभग एक माह की अवधि में ही मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश चंद माथुर जी का जन्म दिन (22 जुलाई) और पुण्य तिथि 27 अगस्त दोनो ही आए| 27 अगस्त,1976 को ही इस महान सुरीले गायक और फिल्मी दुनिया में इंसानियत की एक महान मिसाल, मुकेश जी का डेट्रायट, अमरीका में दर्शकों के समक्ष संगीत का कार्यक्रम देते हुए, दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया था| स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी भी मुकेश जी से बहुत प्रेम करती थीं और उनको अपना बड़ा भाई मानती थीं|


आज मुकेश जी की स्मृति में उनका गाया एक मधुर गीत शेयर कर रहा हूँ, जो योगेश जी ने लिखा था और 1974 में रिलीज़ हुई फिल्म- रजनीगंधा के लिए, सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने बड़े मोहक अंदाज़ में गाया और इसे अमोल पालेकर जी पर फिल्माया गया था| किस प्रकार एक समय ऐसा आता है, जब हमारा मन अपने बंधनों को, अपनी सीमारेखा को तोड़ने लगता है|


लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-



कई बार यूँ भी देखा है
ये जो मन की सीमारेखा है
मन तोड़ने लगता है
अनजानी प्यास के पीछे
अनजानी आस के पीछे
मन दौड़ने लगता है


राहों में, राहों में, जीवन की राहों में
जो खिले हैं फूल, फूल मुस्कुरा के
कौन सा फूल चुरा के
मैं रख लूँ मन में सज़ा के
कई बार यूँ भी…


जानूँ ना, जानूँ ना, उलझन ये जानूँ ना
सुलझाऊँ कैसे कुछ समझ ना पाऊँ
किसको मीत बनाऊँ
मैं किसकी प्रीत भुलाऊँ
कई बार यूँ भी…



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते!

आज साहिर लुधियानवी साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| साहिर जी फिल्मी दुनिया के एक ऐसे गीतकार थे जिनका नाम अदब की दुनिया में भी बड़ी इज्जत के साथ लिया जाता था| वे मुशायरों की शान हुआ कराते थे और बड़े स्वाभिमानी भी थे, उन्होंने ही फिल्म और संगीत वालों के सामने यह शर्त रखी थी कि जिस तरह संगीतकार का नाम लिखा जाता है, उसी तरह गीतकार का भी नाम लिखा जाए, नहीं तो मैं गीत नहीं लिखूंगा|


हम आज भी साहिर जी की अनेक फिल्मी और गैर-फिल्मी रचनाओं को गुनगुनाते थे| जहां ताजमहल को लेकर अनेक मुहब्बत के गीत लिखे गए हैं और कवि-शायरों ने उसे मुहब्बत की निशानी बताया है, वहीं साहिर साहब ने लिखा है-‘एक शहंशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल, हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक|

आज की यह रचना भी हमें हिम्मत न हारने और हौसला बनाए रखने की प्रेरणा देती है-



मेरे नदीम मेरे हमसफ़र उदास न हो,
कठिन सही तेरी मंजिल मगर उदास न हो|

कदम कदम पे चट्टानें खडी़ रहें लेकिन,
जो चल निकले हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते|
हवाएँ कितना भी टकराएँ आँधियाँ बनकर
मगर घटाओं के परचम कभी नहीं झुकते|
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…


हर एक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं मगर,
हर एक तलाश मुरादों के रंग लाती है|
हजारों चाँद सितारों का खून होता है,
तब एक सुबह फ़िजाओं पे मुस्कुराती है|
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…

जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते,
वो जिंदगी में नया रंग ला नहीं सकते|
जो रास्ते के अँधेरों से हार जाते हैं,
वो मंजिलों के उजाले को पा नहीं सकते|

मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मृत्यु- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता  ‘Death’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मृत्यु!

अरी मृत्यु, तुम ही तो हो मेरे जीवन की अंतिम पूर्ति,
मृत्यु, मेरी  मृत्य, आओ मेरे कान में फुसफुसाओ!

दिन प्रतिदिन मेरा ध्यान तुम पर ही लगा रहा है;
तुम्हारे लिए ही मैंने जीवन के सुखों और कष्टों को भोगा है|

जो कुछ भी मैं हूँ, जो मेरे पास है, जिसकी मैंने आशा की है, और मेरा समूचा प्रेम
हमेशा गोपनीयता की गहराई में, तुम्हारी ओर ही बढ़ता रहा है|

मुझ पर तुम्हारा एक अंतिम दृष्टिपात  
और मेरा जीवन हमेशा के लिए तुम्हारा हो जाएगा|

फूल गूँथे जा चुके हैं
और दूल्हे के लिए पुष्पमाला तैयार है|

विवाह के बाद दुल्हन अपना घर छोड़ देगी,
और रात्रि के एकांत में वह अपने स्वामी से मिलेगी|

-रवींद्रनाथ ठाकुर
 

   और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ- 

 Death

O thou the last fulfilment of life,
Death, my death, come and whisper to me!

Day after day I have kept watch for thee;
for thee have I borne the joys and pangs of life.

All that I am, that I have, that I hope and all my love
have ever flowed towards thee in depth of secrecy.

One final glance from thine eyes
and my life will be ever thine own.

The flowers have been woven
and the garland is ready for the bridegroom.

After the wedding the bride shall leave her home
and meet her lord alone in the solitude of night.



  -Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –



आज गुलाम अली जी का गाया हुआ एक गीत याद आ रहा है, जिसे आनंद बक्षी जी ने लिखा है और इसका संगीत अनु मलिक जी ने तैयार किया है।


यह गीत वैसे ही सुंदर लिखा गया है और गुलाम अली जी की गायकी ने इसको अमर बना दिया है। मूल बात जो इसमें है, वो यह कि इंसान का आचरण, उसका किरदार उसको कहीं से कहीं ले जाता है, ऊंचाइयों पर भी और बर्बादी के रास्ते पर भी! लेकिन इसमें तक़दीर का, परिस्थितियों का भी बहुत बड़ा हाथ होता है।


लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए और गुलाम अली साहब की अदायगी को याद कीजिए-


चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला
बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर की गलियों का बंजारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था
मेरी तक़दीर ने मुझको, तक़दीर का मारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


आज के लिए इतना ही, नमस्कार।



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My travel destination after defeat of COVID-19

We have been facing the conditions of the spread of this dreaded Pandemic called COVD-19 in India for almost 5 months now. It is one of the important topics we often discuss, we sometimes feel somewhat satisfied that its impact has been lesser in India compared to so many countries, considering the population of our country. But it is also a cause of concern that now that the spread is weakening in several countries, the number is still on the rise in our country, though recovery rate still gives solace to us.


I just want to discuss beyond COVID-19, the situation which does not appear to be coming soon, but surely it would come and hopefully it should not take very much time. We must keep thinking about what we can do when things normalize. What are your plans by the way for the normal times in future? For me travel is an activity which rejuvenates me, when I am not travelling, then also I keep thinking about possible travels. The destination is not much important, but the journey is.


Once we plan to move out, then yes destination is important for that trip only but actually it is more important to plan visits at regular intervals and execute them. There are many people in India who plan to visit the religious destinations. Like the important Dhams of Hindus, like Muslims also plan to go on Haj pilgrimage at least once in their life. My visits have not normally been for religious purpose and that is the reason I have not visited the Dhams, like Badrinath, Kedarnath Dham etc. and now with advancing age it does not appear possible anymore.


The places which have been attracting me more are hill stations and sea beaches. Now incidentally I live in Goa, where people from all over the world come to enjoy at the beautiful beaches. My first experience of beaches was in Mumbai and once in Digha in Orissa state. Now I can see the Miramar beach of Goa from my house balcony.


Still I would love to visit places for new beaches, anywhere in the world if I get a chance. I still remember that some beaches in Andaman, Tanzania and London I found very beautiful and each beach has its own unique attractions.


Going to hill stations is a great thing, people go for the adventure of climbing the hills, but now for me walking on the hilly terrains also is not easy, so not much chances of visiting hill stations now.


I have visited many important tourist places in India and some foreign destinations also, like Dubai, Sharjah etc. in UAE, London and nearby areas in UK and Dar es Salaam and Zanzibar etc. in Tanzania. The world is so big that it is not easy for one to visit all major tourist spots in one life, even visiting all such places in a big and culturally rich country like India is not possible. One can utilize his spare time and energy, if budget permits to add some new destinations and visit them as a tourist.
About my future visiting spots, it normally depends on possibility rather than choice for me, as for foreign destinations are concerned. The foreign destinations I visited was all because my relatives were there, and for example London I visited twice and stayed there once for one month and once for one and a half month.


However, the spot which has been attracting me for some time now is Paris and Eiffel tower, may be it happens some time, otherwise there are so many in my great India itself, which keep me calling for visit.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Once the world wins against Covid-19, which place would you love to visit first? #BelovedPlace

Thanks for reading.


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यही होता है तो आखिर यही होता क्यों हैं!

कैफी आज़मी साहब की एक गजल आज याद आ रही है| कैफी साहब हिंदुस्तान के एक प्रसिद्ध शायर रहे हैं और बहुत सी सुंदर रचनाएँ उन्होंने हमें दी हैं, फिल्मों में भी उनकी बहुत सी रचनाओं का इस्तेमाल किया गया और आज जो गज़ल मैं शेयर कर रहा हूँ उसको जगजीत सिंह साहब ने गाया है|


सचमुच जीवन में बहुत सी स्थितियाँ ऐसी होती हैं जिनको इंसान दूसरों के सामने नहीं रख पाता, आज के भागते-दौड़ते समाज में बहुत सी बार तो कोई इंसान मर जाता है, बहुत से मामलों में आत्म-हत्या कर लेता है, तब लोगों को महसूस होता है की उसके जीवन में शायद कोई गंभीर समस्या थी|


लीजिए आज इस खूबसूरत गजल का आनंद लेते हैं-


कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों हैं,
वो जो अपना था वही और किसी का क्यों हैं,
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं,
यही होता है तो आखिर यही होता क्यों हैं!

एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ लें दामन,
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन,
इतनी क़ुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों हैं!

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई,
एक लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई,
आस जो टूट गयी, फिर से बंधाता क्यों है!

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता,
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता,
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों हैं!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तेरा मेला पीछे छूटा, राही चल अकेला!

फिल्म-संबंध, जो 1969 में रिलीज़ हुई थी, उसका एक गीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| यह गीत राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत कविताएं लिखते थे, जैसे ‘आओ बच्चे तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की’ आदि-आदि| आज के इस गीत के लिए संगीत दिया है ओ पी नैयर जी का और इसे गाया है मेरे प्रिय गायक- मुकेश जी ने|


इस गीत में एक जीवन जीने का महत्वपूर्ण सिद्धान्त दर्शाया गया है, जैसा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी ने भी लिखा था, ‘जदि तोर डाक सुनी केऊ न आशे, तबे एकला चलो रे’| इस गीत में भी यही कहा गया है की हजारों मील लंबे रास्ते हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं और हमें अकेले ही इन पर चलाने का साहस करना होगा|


लीजिए इस गीत का स्मरण कराते हैं-


चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला,
तेरा मेला पीछे छूटा, राही चल अकेला|

हजारों मील लम्बे रास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते,
है कौन सा वो इंसान यहाँ पर जिसने दुःख ना झेला|
चल अकेला…

तेरा कोई साथ ना दे तो खुद से प्रीत जोड़ ले,
बिछौना धरती का कर ले अरे आकाश ओढ़ ले,
यहाँ पूरा खेल अभी जीवन का तूने कहाँ है खेला|

चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला,
तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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