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Independence that is – Swaadhintaa!

We are celebrating the 74th Independence of our great nation. The country which has great culture and has been considered the ‘Vishva Guru’. Those who have faith in our rich traditions and culture rejoice by heart on this auspicious day.


As a nation we never thought of grabbing the territories of other nations and always taught others also the lesson of peace and togetherness. We wish the best for everybody and believe in ‘Sarve Bhavantu Sukhina, Sarve Santu Niramaya’ May all be happy and healthy, let all be gentle people and may nobody be in grief.

Anyway, on the occasion of Independence day, let us think about what is independence. As an independent nation, we as a big nationwide family have to plan for progress so that everybody gets opportunities to attain the heights in life as per his or her capacities and intelligence. Let there be enough opportunities so that everybody can attain his or her goals in life. We all depend on each other and we must help others in achieving their goals.


What is independence by the way? Be it as a nation or as an individual. Anybody who have just to obey the orders of others, is often oppressed but he or she doesn’t have to think much. Just follow the command and live the way his master allows him to!


As an independent nation or person, we have to make our plans, implement them and be responsible for the consequences. We are free to live the way we want to live, act as we wish but, a nice example is that our freedom to spread our arms is to the extent that our hands do not come in the way of anybody else or not hit somebody in any way!


An independent society is like an orchid, or a garden where all the trees grow as per their capacity and inner strength and make the garden beautiful. There is a communist school of thought, where they say that the trees may be cut at the top to make them equal. However there are weaker sections who need support to come forward.


The democratic philosophy believes in providing everybody opportunities to grow as per their strength and intelligence and contribute towards the well-being of the society. We also believe in the philosophy- ‘From each according to his capacities and to each according to his needs.’


Yes we are an independent nation and we are on the way to liberate our masses from poverty, illiteracy, superstition etc. etc., but we have to continue on this journey. Sometimes we feel that we have moved forward but then some hurdles come in so many forms like- earthquake, floods, pandemic etc. and we are thrown backwards. We have to continue working towards our goals and bring happiness and self-dependence to those who are left behind in the race.


It is a never-ending journey, because we may always have to face new challenges and reconsider our goals. But as a progressive nation we are on the right path and our people are becoming more and more vigilant. I am sure that as a great nation we would find a more and more, respectable place in the world community.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Are we really independent? Has India been liberated from poverty, illiteracy, superstition, bigotry…? How long is our journey to Independence yet? #Independence


Thanks for reading.

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कोशिश करने वालों की हार नहीं होती!

कुछ रचना पंक्तियाँ ऐसी लिखी जाती हैं कि वे मुहावरा बन जाती हैं| जैसे डॉ बशीर बद्र जी का एक शेर था- ‘उजाले अपनी यादों के, हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए|’ ऐसी ही एक पंक्ति आज की कविता की है, जिसको अक्सर लोग कहावत की तरह दोहराते हैं| वैसे इसके रचनाकार ऐसे हैं, जिनकी कविताएं हम बचपन में पढ़ा करते थे, राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत कविताएं- ‘वंदना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो’ आदि|


लीजिए आज प्रस्तुत है हमारे स्वाधीनता संग्राम के समय सक्रिय -स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की यह प्रेरक कविता, जिसकी एक पंक्ति को आज भी प्रेरणा देने के लिए दोहराया जाता है-



लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है,
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है,
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है,
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में,
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो,
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम,
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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नहीं भूलना है मुझे – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Let Me Not Forget’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



नहीं भूलना है मुझे!



यदि यह मेरे भाग्य में नहीं है कि मैं तुमसे इस जीवन में मिलूँ
तो फिर मुझे हमेशा यही महसूस करने दो कि मैं तुम्हें देख ही नहीं पाया था
— एक क्षण के लिए भी मत भूलने दो,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|

जैसे-जैसे मेरे दिन बीतते जाते हैं, इस दुनिया के भीड़ भरे बाज़ार में
और हर दिन कमाए गए लाभ से मेरे हाथ भरते जाते हैं,
तब हमेशा मुझे यह महसूस करने दो कि मैंने कुछ नहीं कमाया है
—मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|



जब मैं मार्ग के किनारे बैठ जाऊं, थका और हाँफता हुआ,
जब मेरा अपना बिस्तर फैल जाए, नीचे मिट्टी में,

मुझे तब भी हमेशा महसूस करने दो, कि लंबी यात्रा अभी करनी बाकी है
—मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|


जब मेरे कमरों को सजाया गया हो, और बांसुरी की धुन
और क़हक़हों की ध्वनि तेज हो,
मुझे हमेशा यह महसूस करने दो कि मैंने तुम्हें अपने घर नहीं बुलाया है,
— मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|




-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Let Me Not Forget



If it is not my portion to meet thee in this life
then let me ever feel that I have missed thy sight
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.

As my days pass in the crowded market of this world
and my hands grow full with the daily profits,
let me ever feel that I have gained nothing
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.


When I sit by the roadside, tired and panting,
when I spread my bed low in the dust,
let me ever feel that the long journey is still before me
—let me not forget a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.

When my rooms have been decked out and the flutes sound
and the laughter there is loud,
let me ever feel that I have not invited thee to my house
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours




-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अलविदा राहत इंदौरी जी!

विख्यात उर्दू शायर और फिल्मी गीतकार राहत इंदौरी जी नहीं रहे| जैसा कि राहत जी ने खुद ही अपने संदेश द्वारा अपने प्रशंसकों को सूचित किया था, वे कोरोना पॉज़िटिव पाए जाने के बाद इंदौर के अरविंदो अस्पताल में भर्ती हुए थे और शायद 24 घंटे से कम अवधि में ही दिल का दौरा पड़ जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गई| 1जनवरी 1950 को जन्मे राहत जी 70 वर्ष के थे| कोरोना के साथ ये विशेष खतरा रहता है कि यदि व्यक्ति की उम्र अधिक है अथवा उसको कोई गंभीर रोग है, जैसे – मधुमेह, हृदय रोग आदि तो कोरोना की स्थिति में उसकी आंतरिक सुरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाने के कारण मृत्यु का खतरा अधिक हो जाता है|


किसी का अंदाज़-ए-बयां अक्सर उसकी पहचान बनता है और रचनात्मकता के क्षेत्र में तो यही मुख्य बात होती है| किसी ने कहा था कि अगर आप कविता में लिखते हैं कि ‘मैं भूखा हूँ’ तो यह बात तो कोई वास्तव में भूखा व्यक्ति ज्यादा प्रभावी ढंग से कह सकता है| आपकी रचना की खूबसूरती तो इसमें है कि आप ‘भूख’ शब्द का प्रयोग किए बिना उसका एहसास करा दें|


राहत जी का अंदाज़ वास्तव में निराला था, जैसे कविता के बारे में यह भी कहा जाता है ‘दिव्य अर्थ का प्रतिपादन’! राहत जी को मुशायरे लूटने वाला शायर कहा जाता था| उनके मंच पर आते ही श्रोता मानते थे कि अब मज़ा आने वाला है| उनकी याद में आज मैं उनके कुछ छिटपुट शेर प्रस्तुत करते हुए उनको अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहूँगा-


रोज तारों की नुमाइश में खलल पड़ता है,
चाँद पागल है, अंधेरे में निकाल पड़ता है|
****
बनके इक हादसा किरदार में आ जाएगा,
जो हुआ ही नहीं अखबार में आ जाएगा|
*****
ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन
ये पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है|
***
दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूँ|
***
मैं देर रात गए जब भी घर पहुँचता हूँ
वो देखती है बहुत छान के, फटक के मुझे|
***
मैं बस्ती में आख़िर किस से बात करूँ,
मेरे जैसा कोई पागल भेजो न|
***
नींद से मेरा त’अल्लुक़ ही नहीं बरसों से,
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं|

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ, रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं|
***
उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर-मंतर सब,
चाक़ू-वाक़ू, छुरियाँ-वुरियाँ, ख़ंजर-वंजर सब|
***
दोस्ती जब किसी से की जाये|
दुश्मनों की भी राय ली जाये|


ये कुछ शेर राहत जी के, उनकी याद में शेयर कर रहा हूँ, वैसे तो उनके शेर और गज़लें शामिल करने के लिए बहुत से ग्रंथ भी कम पड़ जाएंगे| इन शब्दों के साथ में इस जनता के लाडले शायर को अपनी श्रद्धांजलि देता हूँ|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मौसम नहीं, मन चाहिए !

एक बार फिर से आज हिन्दी काव्य मंचों पर गीत परंपरा के एक लोकप्रिय स्वर रहे, स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| इस गीत में यही संदेश दिया गया है कि अगर हमारे हौसले बुलंद हों, अगर हमारे मन में पक्का संकल्प हो तो हम कुछ भी कर सकते हैं, किसी भी चुनौती का मुक़ाबला कर सकते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक लोकप्रिय गीत-

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

थककर बैठो नहीं प्रतीक्षा कर रहा कोई कहीं,
हारे नहीं जब हौसले
तब कम हुये सब फासले,
दूरी कहीं कोई नहीं, केवल समर्पण चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

हर दर्द झूठा लग रहा, सहकर मजा आता नहीं,
आँसू वही आँखें वही
कुछ है ग़लत कुछ है सही,
जिसमें नया कुछ दिख सके, वह एक दर्पण चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

राहें पुरानी पड़ गईं, आख़िर मुसाफ़िर क्या करे !
सम्भोग से सन्यास तक
आवास से आकाश तक,
भटके हुये इन्सान को, कुछ और जीवन चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

कोई न हो जब साथ तो, एकान्त को आवाज़ दें !
इस पार क्या उस पार क्या !
पतवार क्या मँझधार क्या !!
हर प्यास को जो दे डुबा वह एक सावन चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

कैसे जियें कैसे मरें यह तो पुरानी बात है !
जो कर सकें आओ करें
बदनामियों से क्यों डरें,
जिसमें नियम-संयम न हो, वह प्यार का क्षण चाहिए!

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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नफरत की बैटरी!

ब्लॉग लेखन के लिए मैंने तो मुख्यतः कविता, गीत, गजल आदि का सृजनात्मक क्षेत्र चुना है और मैं समझता हूँ कि इस क्षेत्र में ही अभिव्यक्ति के लिए इतना कुछ मिल जाता है कि कुछ और ढूँढने की जरूरत ही नहीं है| हाँ एक जागरूक नागरिक होने के नाते, जब किसी सामयिक राजनैतिक विषय पर अपनी राय रखने का मन होता है तो उसमें भी मैं हिचकता नहीं हूँ|


वैसे राजनैतिक विषय पर लिखने वालों में आजकल ऐसे लोग ज्यादा सक्रिय हैं जिन्हें ‘अवार्ड वापसी गैंग’, ‘खान मार्केट गैंग’ या ‘लुटियन्स मीडिया’ नाम से भी जाना जाता है|


इन महानुभावों के बारे में बात करने से पहले एक छोटा सा प्रसंग याद आ रहा है| कहा जाता है कि एक बार कुछ विद्वान सज्जनों को यह मालूम हुआ कि ऐसी हवा चलने वाली है कि वो जिसको भी लगेगी, वह पागल हो जाएगा| उन विद्वानों ने यह फैसला किया कि हम एक कमरे में बंद हो जाएंगे, और वह हवा समाप्त हो जाने के बाद हम बाकी लोगों को समझा देंगे कि आप लोगों पर पागल करने वाली हवा का असर है और धीरे-धीरे उनको ठीक कर लेंगे| लेकिन असल में हुआ यह कि जो लोग खुली हवा में रहे, उन्होंने इन विद्वान लोगों को ही पागल घोषित कर दिया!

अपने यहाँ के इन विद्वानों की भी यही स्थिति है| उनको ऐसा भी लगता है कि देश के लिए क्या ठीक है, यह सिर्फ उनको ही मालूम है और देश की जनता उनके विचार में बेवकूफ है, जो जानती ही नहीं कि क्या ठीक है और क्या गलत!


अपने यहाँ के इन विद्वानों की भी यही स्थिति है| जैसे उदाहरण के लिए आदरणीय रवीश जी, विनोद दुआ जी, राजदीप सरदेसाई आदि-आदि विद्वानों को देखें, इन के पास लिखने अथवा बोलने का क्रॉफ्ट बढ़िया है| किसी जमाने में मैं रवीश जी, विनोद दुआ जी आदि का फैन भी रहा हूँ, लेकिन समय के साथ-साथ इनका दिमाग ज्यादा से ज्यादा बंद होता गया| स्थिति ऐसी होती गई कि जो सकारात्मक उपलब्धियां हिंदुस्तान में और विदेश में भी लोगों को दिखाई देती हैं, वे उनको दिखाई नहीं दे पातीं, चिड़िया की आँख की तरह उनको सिर्फ बुराई ही दिखाई देती है और वही उनका धर्म बन गया लगता है|


मुझे कुछ ऐसा ही लगता है, जैसे खिलाड़ी नेट-प्रेक्टिस करते हैं, फिट रहने के लिए एक्सरसाइज़ करते हैं, ये लेखक-पत्रकार बंधु अपने लेखन को धार देने के लिए कहें या जीवित बनाए रखने के लिए भी, नफरत का अभ्यास करते हैं| जैसे हम मानते हैं कि किसी जमाने में तुलसीदास जी जैसे कवियों के लिए उनकी आस्था ही उनकी बड़ी शक्ति थी| कवियों के लिए उनके दिल में भरा प्रेम उनके सृजन की शक्ति होता है, आज के इन स्वनामधन्य लेखकों के लिए नफरत ही शक्ति है, ऊर्जा का स्रोत है जो उनको चार्ज करता है|


आज इस बहाने मुझे अपनी एक कविता याद आ गई, जिसे पहले भी मैंने शेयर किया होगा, आज फिर शेयर कर लेता हूँ| ये कविता अपने कविता लेखन के शुरू के दिनों में लिखी थी, जब मैंने देखा कि मेरे साथी जो अभी कविता लिखना शुरू ही कर रहे हैं, वे स्थापित कवियों की रचनाओं के बारे में कभी-कभी काफी अभद्र और अगंभीर टिप्पणियाँ कर देते थे|


लीजिए प्रस्तुत है मेरी यह पुरानी कविता-


शब्दों के पिरामिड सजाओगे
पढ़कर तुम बासी अखबार,
पर इससे होगा क्या यार|


घिसी हुई रूढ़ स्थापनाओं को,
मंत्रों सी जब-तब दोहराओगे,
कविता की बात खुद चलाकर तुम,
कविता की राजनीति गाओगे|


उगलोगे जितना पढ़ डाला है,
ले भी लेते जरा डकार,
यूं होना भी क्या है यार|

गंधों के मकबरे गिनाना फिर,
एक गंध अपनी तो बो लो तुम,
प्रवचन की मुद्रा फिर धारणा,
पहले सचमुच कुछ जी तो लो तुम|


अंतर के स्पंदन में ढूंढोगे
केवल रस-छंद अलंकार|
पर इससे होगा क्या यार|

प्रतिभा है तुममें माना मैंने
हर दिन कविता को वर लोगे तुम,
अड़ जाओगे जिस भी झूठ पर
उसको सच साबित कर लोगे तुम|


मंचों से रात-दिन उंडेलोगे
उथले मस्तिष्क के विकार|
पर इससे होगा क्या यार|

(श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’)




आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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एवार्ड हेतु नॉमिनेशन के बहाने!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –



कभी कभी कुछ अलग लिखने का मन करता है, आज इसके लिए मुझे बहाना भी मिल गया क्योंकि ब्लॉग लेखन संबंधी एक एवार्ड के लिए मेरा नॉमिनेशन हो गया।

मैंने, सेवानिवृत्ति से पूर्व, 22 वर्ष तक सार्वजनिक क्षेत्र की एक महानवरत्न कंपनी में काम किया, बहुत सी बार अपने ब्लॉग्स में कंपनी का नाम लिखा है, आज नहीं लिखूंगा। इस कंपनी में रहते हुए मैंने अनेक आयोजन किए, जिनमें राष्ट्रीय स्तर के कवि-कलाकार शामिल हुए।

बहुत से आयोजनों में बहुत सारे लोगों को पुरस्कार मिले, कंपनी को भी बहुत से एवार्ड मिले, जिनको स्वीकार करने के संबंध में, बहुत से विनम्रतापूर्वक पुरस्कार स्वीकार करने संबंधी व्याख्यान भी मैंने लिखे, पुरस्कार पाने वाले लोगों की प्रशंसा भी की। लेकिन एक हसरत मन में रह गई कि कभी मैं भी पुरस्कार प्राप्त करूं। ऐसा कभी नहीं हुआ यद्यपि कंपनी के बड़े से बड़े अधिकारियों और राजनैतिक अतिथियों ने भी मेरे कुशल कार्यक्रम संचालन की प्रशंसा की।

मैं कंपनी में राजभाषा कार्यान्वयन के क्षेत्र में कार्य कर रहा था। जब कंपनी में राजभाषा संबंधी गतिविधियों के संबंध में एक पुरस्कार प्रारंभ किया गया, तब गलती से पहला पुरस्कार हमारी परियोजना को मिल गया, क्योंकि उसके मानकों में पत्राचार के आंकडों के अलावा अन्य गतिविधियों, जैसे पत्रिका प्रकाशन, कवि सम्मेलन के आयोजन आदि के संबंध में भी काफी अंक थे।

जब यह गलती हो गई, उसके बाद हमारे केंद्रीय कार्यालय में बैठे राजभाषा के धुरंधर ने मानकों में ऐसा सुधार किया कि अब पुरस्कार केवल और केवल पत्राचार संबंधी झूठी रिपोर्ट के आधार पर ही प्राप्त किया जा सकता था और मैंने इस बारे में सोचना ही छोड़ दिया था।


वैसे पुरानी कहावत है कि सूरज निकलता है तो देर-सवेर सभी उसको स्वीकार करते हैं, सम्मान देते हैं। मुझे लगता है कि आज के समय यह आपकी विज्ञापन क्षमता, प्रेज़ेंटेशन आदि ही हैं, जो आपको मान्यता और सम्मान दिलाते हैं।

असल में एक ब्लॉगर साथी ने- एक एवार्ड के लिए मेरा नॉमिनेशन किया तो सुखद आश्चर्य हुआ, क्योंकि मुझे लगता है कि कुछ लोग इनको प्राप्त करने के लिए नहीं बने होते और कुछ लोग लगातार एवार्ड प्राप्त करने के लिए अभिशप्त होते हैं।

मैं पुनः, मुझे एवार्ड हेतु नॉमिनेट करने वाले मित्र के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ, जो अपने ब्लॉग्स में योग के बारे में बहुत अच्छी जानकारी देते हैं और सुंदर कविताएं भी लिखते हैं। (क्योंकि यह पुराना प्रसंग है इसलिए अब उनका नाम नहीं दे रहा हूँ|)


मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का ये गाना याद आ गया, क्योंकि इसमें भी ईनाम का ज़िक्र है, ईनाम, पुरस्कार, एवार्ड ! गीत फिल्म-देवर का है, आनंद बख्शी जी ने लिखा है और संगीतकार हैं- रोशन जी, बर्दाश्त कर लीजिए-


बहारों ने मेरा चमन लूटकर
खिज़ां को ये इल्ज़ाम क्यों दे दिया|
किसीने चलो दुश्मनी की मगर
इसे दोस्ती नाम क्यों दे दिया|


मैं समझा नहीं ऐ मेरे हमनशीं
सज़ा ये मिली है मुझे किस लिये,
के साक़ी ने लब से मेरे छीन कर
किसी और को जाम क्यों दे दिया|


मुझे क्या पता था कभी इश्क़ में
रक़ीबों को कासिद बनाते नहीं|
खता हो गई मुझसे कासिद मेरे
तेरे हाथ पैगाम क्यों दे दिया|


इलाही यहाँ तेरे इन्साफ़ के
बहुत मैंने चर्चे सुने हैं मगर
सज़ा की जगह एक खतावार को
भला तूने ईनाम क्यों दे दिया
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।




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ये मुझसे तगड़े हैं- रमेश रंजक

हिन्दी के चर्चित नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ, इस गीत में रंजक जी ने कितनी खूबसूरती से यह अभिव्यक्त किया है कि दुख घर से जाने का नाम ही नहीं ले रहे हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-



जिस दिन से आए
उस दिन से
घर में यहीं पड़े हैं,
दुख कितने लंगड़े हैं ?

पैसे,
ऐसे अलमारी से,
फूल चुरा ले जायें बच्चे
जैसे फुलवारी से|

दंड नहीं दे पाता
यद्यपि-
रँगे हाथ पकड़े हैं ।

नाम नहीं लेते जाने का,
घर की लिपी-पुती बैठक से
काम ले रहे तहख़ाने का,
धक्के मार निकालूँ कैसे ?

ये मुझसे तगड़े हैं ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कृष्णकली – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Krishnakali’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



कृष्णकली



गाँव में सब उसे साँवली लड़की कहते हैं,
परंतु मेरे लिए वह कृष्णकली का पुष्प है,
एक मेघाच्छादित दिन में, खेत में
मैंने देखीं, साँवली लड़की की गहरी, हिरनी जैसी आँखें|
उसका सिर ढका नहीं था,
उसके खुले केश उसकी पीठ पर झूल रहे थे|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

दो काली गायें रँभा रही थीं,
क्योंकि घने बादलों के कारण अंधेरा हो गया था|
इसीलिए चिंतित, त्वरित कदमों से,
साँवली लड़की अपनी झौंपड़ी से निकली|
उसने आकाश की ओर आँखें तरेर कर देखा,
एक क्षण उसने बादलों की गड़गड़ाहट को सुना|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

पुरवा के एक झौंके ने
चावलों के खेत को लहरा दिया|
मैं मेड़ के पास खड़ा था,
अकेला खेत में|
उसने मेरी तरफ देखा या नहीं
यह हम दोनों को ही मालूम है|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

ऐसे ही होता है जब जेठ के महीने में
उत्तर-पूर्व में काजल जैसे काले बादल छा जाते हैं;
कोमल गहन छाया
तमाल कुंजों पर पसर जाती है, आषाढ़ माह में;
और अचानक आनंद से हृदय भर जाता है,
श्रावण माह की रात में|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

मेरे लिए तो वह कृष्णकली का पुष्प है,
बाकी लोग उसे जिस भी नाम से पुकारते हों|
मयनापारा के गाँव में,
मैंने देखीं उस साँवली लड़की की हिरनी जैसी आँखें|
उसका सिर नहीं ढका था,
और उसके पास शर्मिंदा महसूस करने का समय ही नहीं था|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|





-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Krishnakali


In the village they call her the dark girl
but to me she is the flower Krishnakali
On a cloudy day in a field
I saw the dark girl’s dark gazelle-eyes.
She had no covering on her head,
her loose hair had fallen on her back.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelleeyes.

Two black cows were lowing,
as it grew dark under the heavy clouds.
So with anxious, hurried steps,
the dark girl came from her hut.
Raising her eyebrows toward the sky,
she listened a moment to the clouds’ rumble.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

A gust of the east wind
rippled the rice plants.
I was standing by a ridge,
alone in the field.
Whether or not she looked at me
Is known only to us two.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

This how the Kohldark cloud
rises in the northeast in Jaistha;
the soft dark shadow
descends on the Tamal grove in Asharh;
and sudden delight floods the heart
in the night of Sravan.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

To me she is the flower Krishnakali,
whatever she may be called by others.
In a field in Maynapara village
I saw the dark girl’s dark gazelle-eyes.
She did not cover her head,
not having the time to feel embarrassed.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.




-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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दुःख की छाया, सुख की रेखा!

हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’, जो अपनी बेबाकी और फक्कड़पन के लिए जाने जाते थे| उनकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ, जिनका मैं अक्सर स्मरण करता हूँ, वे हैं-


आब-ओ-दाना रहे, रहे न रहे,
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे|


आज मैं उनका एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें वे लिखते हैं की कवि गीत क्यों लिखता है| भावुक लोगों की पीड़ाएँ अलग तरह की होती हैं और कवियों की संपत्ति उनकी भावुकता ही तो है|


लीजिए प्रस्तुत है यह ‘रंग’ जी का यह गीत-


कवि क्यों गीत लिखा करता है?
कवि ने गीतों में क्या देखा,
दुःख की छाया, सुख की रेखा;
वरदानों की झोली ले,
वह क्यों अभिशाप लिया करता है?

याद उसे क्यों गाकर रोना,
ज्ञात उसे क्यों पाकर खोना;
मस्ती में अमृत ठुकरा कर,
क्यों विष जान पिया करता है?


जग कवि के गीतों में डूबा,
कवि जग आघातों से ऊबा;
ढाल लगाकर गीतों की वह,
जग आघात सहा करता है।

जब जग कवि में संशय पाता,
तब वह अंतस चीर दिखाता;
फिर वह गीत सूत्र से अपने,
उर के घाव सिया करता है।

गीतों में कुछ दुख चुक जाता,
वेग वेदना का रुक जाता;
वरना वह पीड़ा के तम से,
दिन की रात किया करता है।


माना मन के मीत न कवि के;
किन्तु निरर्थक गीत न कवि के;
गीतों को वह मीत बनाकर,
युग-युग तलक जिया करता है।
कवि क्यों गीत लिखा करता है?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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