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नहीं भूलना है मुझे – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Let Me Not Forget’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



नहीं भूलना है मुझे!



यदि यह मेरे भाग्य में नहीं है कि मैं तुमसे इस जीवन में मिलूँ
तो फिर मुझे हमेशा यही महसूस करने दो कि मैं तुम्हें देख ही नहीं पाया था
— एक क्षण के लिए भी मत भूलने दो,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|

जैसे-जैसे मेरे दिन बीतते जाते हैं, इस दुनिया के भीड़ भरे बाज़ार में
और हर दिन कमाए गए लाभ से मेरे हाथ भरते जाते हैं,
तब हमेशा मुझे यह महसूस करने दो कि मैंने कुछ नहीं कमाया है
—मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|



जब मैं मार्ग के किनारे बैठ जाऊं, थका और हाँफता हुआ,
जब मेरा अपना बिस्तर फैल जाए, नीचे मिट्टी में,

मुझे तब भी हमेशा महसूस करने दो, कि लंबी यात्रा अभी करनी बाकी है
—मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|


जब मेरे कमरों को सजाया गया हो, और बांसुरी की धुन
और क़हक़हों की ध्वनि तेज हो,
मुझे हमेशा यह महसूस करने दो कि मैंने तुम्हें अपने घर नहीं बुलाया है,
— मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|




-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Let Me Not Forget



If it is not my portion to meet thee in this life
then let me ever feel that I have missed thy sight
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.

As my days pass in the crowded market of this world
and my hands grow full with the daily profits,
let me ever feel that I have gained nothing
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.


When I sit by the roadside, tired and panting,
when I spread my bed low in the dust,
let me ever feel that the long journey is still before me
—let me not forget a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.

When my rooms have been decked out and the flutes sound
and the laughter there is loud,
let me ever feel that I have not invited thee to my house
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours




-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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