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तुम जो न सुनते, क्यों गाता मैं!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं।



मैंने कहीं पढ़ा था कि शैलेंद्र जी इप्टा से जुड़े थे और वहीं किसी नाटक के मंचन के समय पृथ्वीराज कपूर जी उनसे मिले, बताया कि उनके बेटे राज कपूर अपनी पहली फिल्म बनाने वाले हैं और उनसे फिल्म में गीत लिखने का अनुरोध किया।

शैलेंद्र उस समय अपनी विचारधारा के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उन्होंने कहा कि वे फिल्म के लिए गीत नहीं लिखेंगे। पृथ्वीराज जी ने उनसे कहा कि जब उनका मन हो तब वे आकर मिल लें, अगर वे आएंगे तो उनको बहुत अच्छा लगेगा। इत्तफाक़ से वह घड़ी बहुत जल्द आ गई और हमारी फिल्मों को शैलेंद्र जैसा महान गीतकार मिल गया।

सिर्फ इतना ही नहीं, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश, शंकर जयकिशन का राजकपूर के साथ मिलकर एक ऐसा समूह बना, जिसने हमारी फिल्मों अनेक अविस्मरणीय गीत दिए, जिनमें सिर्फ महान विचार और भावनाएं नहीं अपितु आत्मा धड़कती है। संगीतकार के तौर पर इस समूह में कल्याण जी-आनंद जी और शायद लक्ष्मीकांत प्यारे लाल भी जुड़े। कुछ ऐसा संयोग बन गया कि शैलेंद्र अथवा हसरत गीत लिखेंगे, शंकर जयकिशन उसका संगीत देंगे, मुकेश उसके पुरुष कंठ होंगे और पर्दे पर पर राज कपूर की प्रस्तुति इस सभी का संयोग बनकर वह गीत अमर बन जाएगा-


तुम जो हमारे मीत न होते
गीत ये मेरे- गीत न होते।


तुम जो न सुनते,
क्यों गाता मैं,
दर्द से घुट कर रह जाता मैं।
सूनी डगर का एक सितारा-
झिलमिल झिलमिल रूप तुम्हारा।


एक बहुत बड़ी शृंखला है ऐसे गीतों की, जिनमें बहुत गहरी बात को बड़ी सादगी से कह दिया गया है। नशे का गीत है तो उसमें भी बड़ी सरलता से फिलॉसफी कह दी गई है-


मुझको यारो माफ करना, मैं नशे में हूँ-
कल की यादें मिट चुकी हैं, दर्द भी है कम
अब जरा आराम से आ-जा रहा है दम,
कम है अब दिल का तड़पना, मैं नशे में हूँ।


है जरा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,
पर न जाने क्या कहेंगे, ये जहाँ वाले,
तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूँ।


शराबियों से ही जुड़ी एक और बात, वो रोज तौबा करते हैं और रोज भूल जाते हैं, इन बातों को इस गीत में कितनी खूबसूरती से कहा गया है-


याद आई आधी रात को, कल रात की तौबा,
दिल पूछता है झूम के, किस बात की तौबा!


जीने भी न देंगे मुझे, दुश्मन मेरी जां के,
हर बात पे कहते हैं कि- इस बात की तौबा!


बातों में वफा और वो मर मिटने की कस्में,
क्या दौर था, उस दौर के जज़्बात की तौबा।


और फिर सादगी और मानवीयता के दर्शन से भरे ये गीत-

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार-
जीना इसी का नाम है।


रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का,
जिंदा है हमीं से नाम प्यार का|


किसी के आंसुओं में मुस्कुराएंगे,
मर के भी किसी को याद आएंगे,
कहेगा फूल हर कली से बार-बार
जीना इसी का नाम है।


या फिर-


इन काली सदियों के सिर से, जब रात का आंचल ढ़लकेगा,
जब दुख के बादल छिटकेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा,
जब अंबर झूमके नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी-
वो सुबह कभी तो आएगी।

एक और-


जेबें हैं अपनी खाली, क्यों देता वर्ना गाली,
ये संतरी हमारा, ये पासबां हमारा।


चीन-ओ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,
रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा।


और अंत में-


तुम्हारे महल- चौबारे, यहीं रह जाएंगे सारे,
अकड़ किस बात की प्यारे, ये सर फिर भी झुकाना है।


सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है,
न हाथी है न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है।


ये सब मैंने कहा, कवि शैलेंद्र जी को याद करके, हालांकि मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि जिन गीतों की पंक्तियां मैंने यहाँ लिखी हैं, उनमें कौन सा गीत शैलेंद्र जी का है, कौन सा नहीं, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये सभी गीत उसी परंपरा के हैं, जिसके शैलेंद्र जी प्रतिनिधि थे। हाँ इन सभी गीतों को मुकेश जी ने अपनी सीधे दिल में उतर जाने वाली आवाज़ दी है।


मुझे नहीं मालूम कि आपको यह आलेख कैसा लगेगा, लेकिन मुझे इस सफर से गुज़रकर बहुत अच्छा लगा और आगे भी जब मौका मिलेगा, मैं इस प्रकार की बातें करता रहूंगा। हर गीत की कुछ पंक्तियां लिखने के बाद मुझे लगा है कि जो पंक्तियां मैंने यहाँ नहीं दी हैं, उनको लिखता तो और अच्छा रहता। इन अमर गीतों की कुछ पंक्तियों के बहाने मैं शैलेंद्र जी को और इन गीतों से जुड़े सभी महान सर्जकों, कलाकारों को याद करता हूँ।

नमस्कार।

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किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्सां जाना !

भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू के जो सर्वश्रेष्ठ शायर हुए हैं, उनमें से एक रहे हैं जनाब अहमद फराज़, वैसे तो श्रेष्ठ कवियों/शायरों के लिए सीमाओं का कोई महत्व नहीं होता, लेकिन यह बता दूँ कि फराज़ साहब पाकिस्तान में थे और उनमें इतना साहस था की उन्होंने वहाँ मिलिटरी शासन का विरोध किया था|
फराज़ साहब की अनेक गज़लें भारत में भी लोगों की ज़ुबान पर रहती हैं| इस ग़ज़ल के कुछ शेर भी गुलाम ली साहब ने गाये हैं| वैसे मैं भी ग़ज़ल के कुछ चुने हुए शेर ही दे रहा हूँ, जिनमें थोड़ी अधिक कठिन उर्दू है, उनको मैंने छोड़ दिया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारी सी ग़ज़ल–

अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जाना,
याद क्या तुझ को दिलाएँ तेरा पैमाँ जाना|

यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया है,
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्सां जाना|

ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है,
हमने जैसे भी बसर की तेरा एहसां जाना|


दिल ये कहता है कि शायद हो फ़सुर्दा तू भी,
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादां जाना|

अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो कर,
बे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जाना|

मुद्दतों से यही आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद,
दिल पुकारे ही चला जाता है जाना जाना|


हम भी क्या सादा थे हमने भी समझ रखा था,
ग़म-ए-दौराँ से जुदा है, ग़म-ए-जाना जाना|

हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है,
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ|

जिसको देखो वही ज़न्जीर-ब-पा लगता है,
शहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िन्दाँ जाना|

अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आये,
और से और हुआ दर्द का उन्वाँ जाना|


हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे,
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जाना|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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Moral of the story!

Yes, it has been the endeavor of many writers, film makers, directors to leave a moral behind in their stories or film scripts. We have been listening to many religious stories and scriptures etc. which tell us that in the end truth prevails and nice people win in the end.


With that in mind, our film makers give full chance to the villains and vamps, say for more than 2 hours in a film lasting for around 3 hours and in the end, they find a way to declare the hero and the heroine victorious.


This has been the aim of most of the story writers to give such a clear and loud teaching that in the end the good natured and God-fearing people win, though during most part of the movie, these are the villains and vamps who enjoy a lot. In our education system also we have a regular question- ‘What is the moral of the story?’


For last more than a month I have been watching a Serial ‘Chakravorty Samrat Ashok’. In this serial also, which is based on historical inputs, we find that all the characters from the Royal family, except Ashoka and his mother Dharma are always busy in conspiracies, and they are most powerful. Not only that they always weave stories to prove before King Bindusara that Ashoka was wrong and they were right. Though I felt that had there been recording facilities, close circuit cameras etc. during that period, most of these conspiracies could have been exposed.


Anyway, I just want to mention that till recent time it was considered necessary to write stories with some teaching, to spread moral values and to assure the readers that in the end truth prevails.


Great Hindi novelist and story writer- Munshi Prem Chand ji also wrote most of his initial stories and novels in that style. But later he felt that we should portray things the way these are happening in real. With that in mind he wrote his famous Novels- Gaban, Godaan etc. In Godaan the priests keep making the hero spend on various things to get peace in life but in the end he could not provide a cow, as Godan for ‘climbing the stairs to heaven’.


A story by Prem Chand Ji- “Poos ki Raat’ also comes to my mind in which the poor farmer keeps a watch on his fields during very cold nights of ‘Poos’ month, until he maintains the hope that he can save his crops. Prem Chand Ji also mentions in this story ‘Hope is the mother of zest’, meaning that as long we have hope to achieve something, we keep making our efforts with sincerity. In this story the farmer finally finds that whatever he may do, he would not be able to get his crops, then he leaves everything to God and his fate and goes to sleep, away from his field and the chilling cold.


So, this is the time that literature is becoming more realistic and there is not excessive morality and teaching tendency. So, after reading every story, we need not look for a moral in it, but try to be more aware, so that we are able to face all kinds of situations.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Do you look for a moral in every story? Share any story. #StoryTime


Thanks for reading.

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मेरे अपने, मेरे होने की निशानी माँगें!

आज मैं 1991 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘डैडी’ का एक बहुत भावपूर्ण गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| यह गीत लिखा है सूरज सनीम जी ने और इसके लिए संगीत दिया है राजेश रोशन जी ने| इस गीत को ज़नाब तलत अज़ीज़ जी ने बहुत भावपूर्ण तरीके से निभाया है|


इस फिल्म में अनुपम खेर जी ने एक गायक की भूमिका का निर्वाह बड़े प्रभावी ढंग से किया है, जो अपनी शराब की लत के कारण बर्बाद हो जाता है| इस गायक की लाड़ली बेटी की भूमिका पूजा भट्ट ने निभाई थी|


लीजिए प्रस्तुत है यह मार्मिक गीत –

आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे,
मेरे अपने मेरे होने की निशानी माँगें,
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे|


मैं भटकता ही रहा दर्द के वीराने में,
वक्त लिखता रहा चेहरे पे हर-एक पल का हिसाब|
मेरी शोहरत मेरी दीवानगी की नज़्र हुई,
पी गई मय की ये बोतल मेरे गीतों के किताब|


आज लौटा हूँ तो हँसने की अदा भूल गया,
ये शहर भूला मुझे, मैं भी इसे भूल गया|


मेरे अपने मेरे होने की निशानी माँगें,
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे|


मेरा फ़न फिर मुझे बाज़ार में ले आया है,
ये वो शै है कि जहाँ मेहर-ओ-वफ़ा बिकते हैं,
बाप बिकते हैं यहाँ लख्त-ए-जिगर बिकते हैं,
कोख बिकती है, दिल बिकते हैं, सर बिकते हैं|
इस बदलती हुई दुनिया का खुदा कोई नहीं
सस्ते दामो में हर रोज खुदा बिकते हैं |
बिकते हैं, बिकते हैं |


मेरे अपने मेरे होने के निशानी माँगें|
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे|

हर खरीदार को बाज़ार में बिकता पाया,
हम क्या पाएँगे किसी ने है यहाँ क्या पाया|
मेरे एहसास मेरे फूल कहीं और चलें,
बोल पूजा मेरी बच्ची कहीं और चलें,
और चलें, और चलें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कौन है यह – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Who Is This’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


कौन है यह

मैं अकेला ही निकला था, इस गुप्त भेंट के अपने मार्ग पर,
परंतु कौन है यह, जो इस शांत अंधेरे में मेरे पीछे-पीछे चला है?

मैं एक तरफ खिसक जाता हूं उसकी उपस्थिति से बचने के लिए, परंतु उससे बचने में सफल नहीं होता|

वह अपनी अकड़ भरी चाल के कारण धूल उड़ाता चलता है;
मैं जो भी शब्द बोलता हूँ, उसमें वह अपना भारी स्वर जोड़ देता है|


वह मेरा ही अपना लघु अहं है, मेरे प्रभु, उसे बिलकुल शर्म नहीं आती;
परंतु मैं शर्मिंदा हूँ, कि मैं आपके द्वार पर, उसको साथ लेकर आया|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Who Is This



I came out alone on my way to my tryst.
But who is this that follows me in the silent dark?

I move aside to avoid his presence but I escape him not.

He makes the dust rise from the earth with his swagger;
he adds his loud voice to every word that I utter.

He is my own little self, my lord, he knows no shame;
but I am ashamed to come to thy door in his company.



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ!

हिन्दी काव्य मंचों के एक अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक प्रसिद्ध गीत आज शेयर कर रहा हूँ, जिसमें कवि ऐसे भाव व्यक्त करता है कि अपने महान राष्ट्र के लिए सब कुछ समर्पित करने के बाद भी हम उसका ऋण नहीं उतार सकते|


लीजिए प्रस्तुत है राष्ट्रप्रेम की भावना से भरपूर यह गीत –



मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँ तुम्‍हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल मैं जब भी,
कर दया स्‍वीकार लेना यह समर्पण।


गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्‍त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बाँध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।


स्‍वप्‍न अर्पित, प्रश्‍न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,
गाँव मेरे, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो।


सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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पुष्प – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Flower’ का भावानुवाद-




गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


पुष्प


इस नन्हे पुष्प को शाख से चुन लो, देर न करो! कहीं ऐसा न हो
कि यह मुरझाकर धूल में गिर जाए|

संभव है कि आपके पुष्पहार में इसे स्थान न मिल पाए, परंतु अपने हाथों की पीड़ा के स्पर्श द्वारा
इसका सम्मान करो और इसे चुन लो| मुझे डर है कि मुझे जानकारी होने से पहले ही, ऐसा न हो कि दिन ढल जाए,
और पूजा में भेंट चढ़ाने का समय निकल जाए|.


भले ही इसका रंग अधिक गहरा न हो और गंध भी हल्की सी हो, परंतु अपनी सेवा में उपयोग करो इस पुष्प का
और समय निकल जाने से पहले ही, इसको शाख से चुन लो |



-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-





Flower



Pluck this little flower and take it, delay not! I fear lest it
droop and drop into the dust.

I may not find a place in thy garland, but honour it with a touch of
pain from thy hand and pluck it. I fear lest the day end before I am
aware, and the time of offering go by.


Though its colour be not deep and its smell be faint, use this flower
in thy service and pluck it while there is time.




-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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सेवा की दरकार, सेवा का कारोबार!

कुछ दिन पहले मैंने सरकारी पेंशन की परेशानियों को लेकर एक ब्लॉग पोस्ट लिखी| उस पोस्ट का उद्देश्य मात्र इतना बताना था कि हमारा सिस्टम कितना क्रूर है, वह किसी भी परेशानी की स्थिति को समस्याएँ और बढ़ाने के लिए प्रयोग में ला सकता है, उनके पास किसी समस्या का हल कभी नहीं होता!

मेरी यह पोस्ट थी इपीएस-95 पेंशन के बारे में, और वास्तव में जो लोग इस पर ही निर्भर हैं, उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय है| मुझसे मेरे पुत्र ने पूछा कि किसलिए गए थे, कितनी पेंशन मिलती है? मैंने बताया 1200 तो वह बोला छोड़ो उसे, क्या करना है! मैंने कहा नहीं, जो मिलता है उसको क्यों छोड दें! क्योंकि जब सब कुछ बच्चे ही देखते हैं, मैं तो बहुत सी बार देख ही नहीं पाता कि पेंशन आई भी है या नहीं|


हाँ तो जहां समस्या होती है, उससे बहुत से लोग परेशान होते हैं, लेकिन कुछ लोग उसमें से भी अवसर खोज लेते हैं| जैसे इस मामले में सेवा का, सहायता का अवसर| अब जैसे कोरोना-काल में जहां नई किस्म की समस्या आई है, कुछ नई आवश्यकता पैदा हुई हैं, तो इससे जहां बहुत से लोगों के व्यवसाय और नौकरियों पर संकट आया, वहीं कुछ लोगों ने ‘मास्क’, सेनीटाइजर और ‘पीपीआई किट’ बनाने का काम शुरू कर दिया| इस प्रकार सेवा से संबंधित व्यवसाय में अनेक लोगों ने रोजगार का अवसर भी खोज लिया|


इसी प्रकार, मुझे वास्तव में पहले से यह जानकारी थी कि इस क्षेत्र में भी प्राइवेट सेवाएँ उपलब्ध हैं, लेकिन मेरा ध्यान पहले सरकारी ‘सर्विस सेंटर’ पर गया, वह जहां लोग काम से बचने का बहाना खोजते ही रहते हैं|


हाँ तो ऐसी बहुत सी सेवाएँ हैं जहां प्राइवेट लोगों को अब अवसर दिया गया है और वे हमारे जीवन को काफी आसान बना रहे हैं| जैसे मुझे याद है कि पहले रेलवे स्टेशनों पर टिकट के लिए इतनी लंबी लाइन लगती थी कि मन में यह खयाल आता था, कि क्या कभी यह लाइन समाप्त होगी और क्या हम टिकट लेकर यात्रा कर पाएंगे| अब जबसे प्राइवेट लोगों को टिकट बेचने की अनुमति दी गई है और ऑनलाइन रिज़र्वेशन भी होने लगा है, तब से ज़िंदगी बहुत आसान हो गई है|


बड़े पैमाने पर देखा जाए तो ‘ओला-ऊबर’ और ‘ओयो’ जैसे एक्सपेरीमेंट भी बहुत उपयोगी रहे हैं, यद्यपि इन पर ‘लॉक डाउन’ का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है|


आज के लिए मैं इतना ही कहना चाह रहा था कि अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जहां प्राइवेट ‘सेवा केंद्र’ बनाए गए हैं, ऐसे और भी अनेक क्षेत्र उद्यमी लोगों द्वारा खोजे जा सकते हैं, जिनसे जहां लोगों को थोड़ा भुगतान करके बहुत आसानी हो जाएगी, वहीं सेवा देते हुए वे लोग भी कुछ कमाई कर पाएंगे, कितनी यह इस पर निर्भर करेगा कि कितने लोगों को और किस हद तक वे सुविधा उपलब्ध करा पाते हैं|

हाँ यह सावधानी रखा जाना आवश्यक है कि कोई अनैतिक और भ्रष्ट तरीके से यह काम न करे, जैसे रेलवे रिज़र्वेशन में कुछ दलाल करते हैं| मैं यहाँ सेवा का समर्थन कर रहा हूँ, बेईमानी या दलाली का नहीं|


हाँ तो कुल मिलाकर बात इतनी थी कि मैं पेंशन के लिए ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ नहीं भेज पाया था, क्योंकि मेरे फोन में ‘बायोमैट्रिक वेरिफिकेशन’ की सुविधा नहीं थी, मैं ऐसे प्राइवेट ‘सेवा केंद्र’ पर गया, वहाँ मेरा यह वेरिफिकेशन करते हुए, मेरा ऑनलाइन ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ भेज दिया गया| इस सेवा के लिए उनका जो शुल्क था, वह मैंने उनको दे दिया| मुझे लगता है कि इस प्रकार के रोजगार के और भी नए अवसर, उद्यमी साथी खोज सकते हैं|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

आज मैं स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, आज की पीढ़ी उनको अमिताभ बच्चन के पिता के रूप में अधिक जानती है, परंतु किसी ज़माने वे हिन्दी कवि सम्मेलनों के अत्यंत लोकप्रिय कवि हुआ करते थे| उनकी ‘मधुशाला’ ने तो लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे, लोग इसको सुनकर झूम उठते थे| उन्होंने प्रेम के, विरह के और विद्रोह के भी गीत लिखे हैं, उनकी एक कविता तो फिल्म- अग्निपथ में काफी गूंजी थी| अनेक लोकगीत शैली के गीत भी उन्होंने लिखे थे- जैसे ‘ए री महुआ के नीचे मोती झरें’|


मुझे याद है आकाशवाणी में उनके एक साक्षात्कार में किसी ने उनसे पूछ लिया था कि क्या उनकी ‘कविताओं की लोकप्रियता का कारण यह है कि उनकी भाषा बहुत सरल है’, इस पर वो बोले थे कि ‘भाषा सरल होना इतना आसान नहीं है, यदि आपका मन निर्मल नहीं होगा, तो आपकी भाषा सरल हो ही नहीं पाएगी’|


आज का उनका यह गीत, एक रूमानी गीत है, आइए इसका आनंद लेते हैं-



क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


यह अधिकार कहाँ से लाया?’
और न कुछ मैं कहने पाया –
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में –
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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Living with a purpose!

There is so much life happening around us, not only humans but animals, insects, plants. In a way every living being has a purpose in life. Only thing is that all other species have a purpose defined by nature. Humans are the thinking, dreaming and planning creatures. They can dream and define their goals according to their own thinking and move in any direction, which might be considered right or wrong by others.



When I see the ants moving in long and perfect lines, which sometimes appear endless. As we know they gather the food material for their survival in testing times. Can we imagine humans working with so much discipline? We also see the bees, collecting honey and making big structures for storing honey in them. But we humans depend on the labour of such creatures for our benefit, be those honey bees or silk worms and many more like cows etc, who provide us milk, which is primarily meant for their own calves etc.

So, we humans are the most privileged creatures on earth, mostly benefitted by the work and products created by other animals and plants etc. We need to dream big for our world and we can consider the well-being of all others on earth. The creatures I fancy very much are the dogs, though they might not be providing us anything except may be security, but the amount of love they have for their masters can’t be found in human beings mostly.

Anyway, today I am here to discuss about humans. Let’s think regarding how we are living our lives, whether we are busy in living our life or in dying! If we have some purpose in our life, if we are enjoying every moment in our life that makes us live in a better way. We all have to face good and bad situations in life. If one keeps hopes alive, and enjoys every moment with positive thoughts and hope, the life becomes a nice journey. While some keep cursing their bad luck, as per their thinking, they can’t enjoy this journey called life.

So, the main thing that matters is that we can always have ambitions but more important is that we should have positive thoughts, proper planning and an attitude of enjoying every moment of life. There are people who always focus on what they don’t have, on their shortcomings. They are always dying, not actually living. We must therefore always keep hope, focus on what we have and keep planning for a better future, while enjoying every moment of life.

This is my humble submission based on #IndiSpire prompt- Some people are busy living while others are busy dying. What would you like to tell either or both of these categories? #LiveFully


Thanks for reading.



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