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अश्रु बहाने से न कभी पाषाण पिघलता है !

हिन्दी काव्य मंचों के प्रमुख एवं लोकप्रिय कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय शिशुपाल सिंह जी ‘निर्धन’ की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|


एक संकल्प इस कविता में है कि आज हमारे जीवन में कितना ही अंधकार क्यों न हो, हम अपने लक्ष्य अवश्य प्राप्त करेंगे| बड़ा ही ओजपूर्ण संकल्प इस कविता में व्यक्त किया गया है –


रात-रात भर जब आशा का दीप मचलता है,
तम से क्या घबराना सूरज रोज़ निकलता है ।

कोई बादल कब तक
रवि-रथ को भरमाएगा?
ज्योति-कलश तो निश्चित ही
आँगन में आएगा।


द्वार बंद मत करो भोर रसवंती आएगी,
कभी न सतवंती किरणों का चलन बदलता है ।

भले हमें सम्मानजनक
संबोधन नहीं मिले,
हम ऐसे हैं सुमन
कहीं गमलों में नहीं खिले।


अपनी वाणी है उद्बोधन गीतों का उद्गम,
एक गीत से पीड़ाओं का पर्वत गलता है ।

ठीक नहीं है यहाँ
वेदना को देना वाणी,
किसी अधर पर नहीं-
कामना, कोई कल्याणी ।


चढ़ता है पूजा का जल भी ऐसे चरणों पर
जो तुलसी बनकर अपने आँगन में पलता है ।

मत दो तुम आवाज़
भीड़ के कान नहीं होते,
क्योंकि भीड़ में-
सबके सब इंसान नहीं होते ।


मोती पाने के लालच में नीचे मत उतरो,
प्रणपालक तृण तूफ़ानों के सर पर चलता है ।

रात कटेगी कहो कहानी
राजा-रानी की,
करो न चिन्ता
जीवन-पथ में, गहरे पानी की।


हँसकर तपते रहो छाँव का अर्थ समझने को,
अश्रु बहाने से न कभी पाषाण पिघलता है ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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5 replies on “अश्रु बहाने से न कभी पाषाण पिघलता है !”

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