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नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

एक बार फिर मैं जनकवि नागार्जुन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय नागार्जुन जी विद्रोह और क्रान्ति की कविताओं के लिए जाने जाते थे, परंतु यह अलग तरह की कविता है, जिसमें एक रौबीले दिखने वाले बस चालक की ममता, अपनी पुत्री के प्रति उसके प्रेम को प्रतिबिंबित किया गया है, बस में उसके सामने लटकी रंग-बिरंगी चूड़ियों के माध्यम से|


लीजिए प्रस्तुत है नागार्जुन जी की यह अलग किस्म की कविता-


प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!


सामने गियर से ऊपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…


झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा


आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने|

मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?


और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा,
और मैंने एक नज़र उसे देखा|
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में|
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर|


और मैंने झुककर कहा –
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वरना किसे नहीं भाँएगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार

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जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा!

आज मैं एक बार फिर से अपने प्रिय शायरों में से एक रहे, स्वर्गीय निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ| निदा साहब अपनी काव्य शैली के अनूठेपन के लिए विख्यात थे, उसके अनेक शेर बरबस होठों पर आ जाते हैं, जैसे – ‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’ अथवा ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए’ और ‘मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’ आदि-आदि|


आज की यह गज़ल भी उनकी काव्य शैली की अलग पहचान प्रस्तुत करती है –



उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा,
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा |

इतना सच बोल कि होंठों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा|

प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली,
जिसको पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा|

मेरे बारे में कोई राय तो होगी उसकी,
उसने मुझको भी कभी तोड़ के देखा होगा|


एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक,
जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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और जीने के लिए हैं दिन बहुत सारे!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

आज सोचा कि ज़िंदगी के बारे में बात करके, ज़िंदगी को उपकृत कर दें।
शुरू में डॉ. कुंवर बेचैन जी की पंक्तियां याद आ रही हैं, डॉ. बेचैन मेरे लिए गुरू तुल्य रहे हैं और उनकी गीत पंक्तियां अक्सर याद आ जाती हैं-


ज़िंदगी का अर्थ मरना हो गया है,
और जीने के लिए हैं दिन बहुत सारे।


जब सोचते हैं कि बहुत दिनों के लिए जीना है तो क्या किया जाए, तब यह याद आता है-


जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम,
ये रस्ता कट जाएगा मितरा, ये बादल छंट जाएगा मितरा।


लेकिन फिर कोई यह कहता मिल जाता है-


ये करें और वो करें, ऐसा करें, वैसा करें।
ज़िंदगी दो दिन की है, दो दिन में हम क्या-क्या करें।

अब वैसे तो ये कवि-शायर लोग कन्फ्यूज़ करते ही रहते हैं, पर ज़िंदगी के बारे में इन्होंने कुछ ज्यादा ही कन्फ्यूज़ किया है-


ज़िंदगी कैसी है पहेली ये हाय
कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाए।


और जब ज़िंदगी में परेशानियां ज्यादा होती हैं, तब फैज़ अहमद फैज़ कहते हैं-


ज़िंदगी क्या किसी मुफलिस की क़बा है जिसमें,
हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं।

और कहीं कोई मोहब्बत का मारा, ये कहता हुआ भी मिल जाता है-


हम तुझ से मोहब्बत करके सनम, हंसते भी रहे, रोते भी रहे,
हंस हंस के सहे उल्फत में सितम, मरते भी रहे, जीते भी रहे।


जब जीवन में कोई पवित्र उद्देश्य मिल जाता है, तब ये खयाल ही नहीं आता कि ज़िंदगी छोटी है या बड़ी, तब इंसान इस तरह की बात करता है-


हम जिएंगे और मरेंगे ऐ वतन तेरे लिए,
दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए।


एक बात और, स्वामी विवेकानंद और इस तरह के कुछ महापुरुष जब कम समय में बहुत बड़ी उपलब्धियां कर लेते हैं और कम उम्र में ही उनको जीवन-त्याग करना पड़ जाता है, उनके लिए सोम ठाकुर जी ने बड़ी सुंदर पंक्तियां लिखी हैं-


कोई दीवाना जब होंठों तक अमृत घट ले आया,
काल बली बोला मैंने, तुझ से बहुतेरे देखे हैं।


और आज के लिए आखिरी बात, ये फानी बदायुनी जी का शेर-


एक मुअम्मा है, समझने का न समझाने का,
ज़िंदगी काहे को है, ख्वाब है दीवाने का।


मेरे खयाल में ज़िंदगी के नाम पर, आज के लिए इतना कंफ्यूज़न ही काफी है।
नमस्कार।


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Poetry, writing,Blogging!

Today once again I am discussing a subject, which I might have discussed a few times earlier also. Yes, it’s regarding the writing and then blogging activity. Basically it is regarding expressing myself, be it through writing or speaking in any medium.


I remember listening to some orator who told that a person who has something worthwhile to say, does hesitate, if speaking before public he would initially face many problems, while any street vendor would cry without any hesitation, since he does not need approval from anybody, he just has to sell things!


Anyway, every individual expresses himself in his or her unique way. There are some who would keep speaking on every subject, even without any subject, but can’t remain calm. But let me tell you that speaking doesn’t always mean expressing something meaningful.


I am talking today regarding my journey in expressing myself. So, in my younger days in Delhi, I started working and writing poetry at the same time. While I went to Chandni Chowk and then to Jhandewalan for my initial services, where the monthly earning was Rs. 100 to 250 in total, during initial over 3-4 years of service with Pitambar Book Depot, then with Delhi Press, where Sarita, Caravan, Mukta etc. magazines are published and finally I joined Govt. service in Ministry of Industry, New Delhi, where I worked for 9 years.


So, while I went to these places from my residence in Shahdara, in east Delhi, on the way I often went to Delhi Public Library, opposite Delhi Junction, where budding poets and orators met weekly on Saturday and Monday evenings respectively. I was more regular in the poetry meetings, in which many famous poets had been coming during the years, before and after me. It was during 8-9 years of my attending these poetic symposia in Delhi that I wrote most of my poems. Actually, that was the time when the movement of Navgeet (Sonnet) was active in Hindi, and people wrote lyrics (Geet) with new format and content, I also contributed a little bit to that.


Anyhow in 1980 I left Delhi and with that the activity of poetry writing also slowly disappeared, accept for some time in Jaipur, then I lived in far away places of India, at project sites, cut off from all such activities.


However I slowly found a new and very effective way of expressing myself. I conducted cultural programs for the residents of our townships, where thousands of our company employees, many contract employees and their families lived. The programs included Kavi Sammelans and also programs by famous singers, which included Jagjit Singh Ji, Mahendra Kapur Ji, Nitin Mukesh Ji etc. etc. Such programs gave me a great opportunity to express myself.


Anyhow, after my retirement in 2010 there were no such connections, no scope of attending poetic symposia or being part of cultural activities. Slowly I came to learn that blogging is a great way to keep expressing my own views and creativity and being in touch with people who believe in expressing themselves in any field.


In this way I have been blogging for last 3-4 years and hope this activity would keep me engaged for longer than I hope.


• This is my humble submission on #IndiSpire prompt- When did you first realize that you can or must write? What was the subject of your first creative written work? #NewWriter

Thanks for reading.


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सुदूर काल – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Distant Time’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



सुदूर काल


मुझे नहीं मालूम कि किस सुदूर काल से
तुम आ रहे हो पास, मुझसे मिलने के लिए|
तुम्हारा सूरज और सितारे, कभी तुमको हमेशा के लिए मेरी दृष्टि से छिपा नहीं पाएंगे|

बहुत सी सुबहों को और शामों को, तुम्हारे कदमों की आहट सुनी गई है
तुम्हारा संदेशवाहक मेरे हृदय में पहुंचा है तथा मुझसे गुप्त मंत्रणा की है|


पता नहीं क्यों आज मेरा जीवन अतिरिक्त रूप से गतिशील है,
और मेरा हृदय आनंद से कंपायमान हो रहा है|

क्या मेरे लिए यहाँ अपना काम समेटने का समय आ गया है,
और मैं वायुमंडल में तुम्हारी मधुर उपस्थिति की सुगंध महसूस कर रहा हूँ|



-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-





Distant Time




I know not from what distant time
thou art ever coming nearer to meet me.
Thy sun and stars can never keep thee hidden from me for aye.

In many a morning and eve thy footsteps have been heard
and thy messenger has come within my heart and called me in secret.

I know not only why today my life is all astir,
and a feeling of tremulous joy is passing through my heart.


It is as if the time were come to wind up my work,
and I feel in the air a faint smell of thy sweet presence.




-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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पेंशन की टेंशन -2

मैं सामान्यतः अपने ब्लॉग का प्रयोग इस तरह की पोस्ट लिखने के लिए नहीं करता, लेकिन शायद पहले भी मैंने एक बार ऐसा आलेख लिखा है, आज फिर से इस विषय पर लिख रहा हूँ|


हाँ तो ये पोस्ट है पेंशन के बारे में! मैं बता दूँ कि मैं एक सार्वजनिक उद्यम में काम करता था और रायबरेली, उत्तर प्रदेश से 1 मई 2010 को रिटायर हुआ| मेरा एकाउंट स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, ऊंचाहार, रायबरेली में था, जिसमें अब तक मेरी सरकारी पेंशन, ईपीएस-95 के अंतर्गत, ऊंट के मुंह में जीरे जैसी, लगभग 1200 रु आती है| मैं ये भी बता दूँ कि रिटायरमेंट के बाद मैं 5-6 साल गुड़गांव में रहा, और अब पिछले 3-4 साल से पणजी, गोवा में रहता हूँ|


ये पेंशन आती है- भविष्य निधि कार्यालय, लखनऊ से| पहले मैं और लोगों की तरह प्रतिवर्ष ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ स्टेट बैंक के माध्यम से भेजता था और उसको भी कम से कम एक बार तो लखनऊ का यह पेंशन कार्यालय नकार ही देता था|


हमारे प्रधान मंत्री जी ने पेंशन धारकों के इस दर्द को समझा और यह व्यवस्था की, कि हम अपने मोबाइल में उमंग एप्लिकेशन डाउनलोड करके उसके माध्यम से लाइफ सर्टिफिकेट भेज सकते हैं| माननीय प्रधानमंत्री जी की सोच बहुत अच्छी है लेकिन ये जो सिस्टम है ना, ये बड़ा जालिम है| मैं बहुत लंबी कहानी नहीं सुनाऊँगा, बस इतना ही बताऊंगा कि इस ‘ऐप’ के माध्यम से मैंने इस वर्ष 3 बार ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ भेजा| (इत्तफाक से मुझे, लॉक डाउन के दौरान, 6-7 महीने बंगलौर में भी रहना पड़ा), तीसरी बार जब मैं ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ भेज रहा था तब सिस्टम द्वारा पूछा गया कि मैं ‘इस सेवा से संतुष्ट हूँ, या नहीं’! इसके उत्तर मैं मैंने लिखा कि ‘तीसरी बार यह सर्टिफिकेट भेज रहा हूँ, अगर सफल हो गया तब मानूँगा’|


इसके बाद अभी संदेश मिला कि ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ न भेजने के कारण पेंशन बंद हो गई है| आप अपना लाइफ सर्टिफिकेट भेजिए| इसके बाद अभी भेजने की कोशिश की तो संदेश आया कि ‘बायोमैट्रिक सर्टिफिकेशन’ के साथ इसको भेजा जाए| मुझे नहीं मालूम कि कितने पेंशन धारकों के पास ऐसे मोबाइल सेट होंगे, जिनमें ‘बायोमैट्रिक सर्टिफिकेशन’ की व्यवस्था होगी| वैसे एक व्यवस्था जिसका लाभ मैंने पहले उठाया है, वह है कि स्थानीय ‘भविष्य निधि कार्यालय’ सर्विस सेंटर के रूप में काम करते हैं, अतः मैं वहाँ ही चला जाता हूँ| फिर मैं पणजी, गोवा के भविष्य निधि कार्यालय गया, तो मुझे बताया गया कि ‘बायोमैट्रिक’ वाला काम कोरोना के कारण बंद है, हाँ उन्होंने मुफ्त में मुझे बहुत सी सलाह दे डालीं, क्योंकि इस मामले में तो हमारे लोग एक्सपर्ट हैं|


यह भी बता दूँ कि मैंने इस बीच यह भी प्रयास किया था कि बैंक का अपना एकाउंट ट्रांसफर करा लूँ, और उसके बाद पेंशन भी ट्रांसफर करा लूँगा| गुड़गांव में रहते हुए इसके लिए वहाँ की ब्रांच के माध्यम से आवेदन भेजा था, परंतु पता ही नहीं चला कि वो आवेदन कहाँ गया|


दिक्कत यही है न कि पेंशन कार्यालय भी सरकारी है और बैंक भी सरकारी| फिर काम में गति आएगी तो कैसे|


अब हर बात प्रधान मंत्री जी तक ही तो पहुंचनी जरूरी नहीं है, संभव है कि इस सिस्टम में ही कुछ उच्च अधिकारी ऐसे हों, जो इस सिस्टम को प्रभावी बनाने में रुचि रखते हों, तो संभव है कुछ बेहतर हो जाए और लाखों पेंशन धारकों को सुविधा हो जाए| रही बात पेंशन की राशि को किसी हद तक सम्मान जनक बनाए जाए की, तो वह तो होना ही चाहिए|


बस यही सोचकर लिख रहा हूँ, क्योंकि आवाज उठाते रहना चाहिए, क्या मालूम कब वह सही कानों तक पहुँच जाए|


आज के लिए इतना ही|
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अब कहाँ हैं चाणक्य!

शीर्षक पढ़कर आप पता नहीं क्या सोचेंगे! यह भी संभव कि इसको आप आज के किसी राजनैतिक व्यक्तित्व से भी जोड़कर देखने लगें| चाणक्य तो बहुत पहले हुए थे, मौर्यवंश के जमाने में, जिन्होंने सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य को गद्दी पर बैठाया, उसके बाद बिन्दुसार हुए और चाणक्य की पारखी निगाहों ने अशोक को भविष्य में सिंहासन संभालने के लिए चुना और इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक वातावरण तैयार किया|


आपको ऐसा लग सकता है कि मेरा इतिहास संबंधी ज्ञान ठीकठाक है, तो मैं बता दूँ कि ऐसा बिल्कुल नहीं है| दरअसल मैं आजकल ‘वूट’ (VOOT) पर सीरियल ‘चक्रवर्ती सम्राट अशोक’ देख रहा हूँ, जिसमें चाणक्य की भूमिका अभिनेता- मनोज जोशी ने निभाई है, यह सीरियल बहुत पहले टेलीकास्ट हो चुका है, लेकिन हम इसको आजकल देख रहे हैं| वास्तव में कुछ कार्यक्रमों में हम इतने ज्यादा इनवॉल्व हो जाते हैं कि क्या कहें|


इस सीरियल में भी लगभग उतने ही खलनायक और खलनायिकाएँ हैं, जितने सामान्यतः आजकल के सीरियल्स में होते हैं, और फिर बड़ी बात यह है कि यहाँ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खलनायक और खलनायिकाएँ शामिल हैं, भारतीय तो हैं ही, यूनानी और खुरासानी भी हैं|

यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित सीरियल है, जिसमें मौर्यवंश के शासन काल का कुछ हिस्सा दिखाया गया है, और अभी तक जितना हमने देखा है, उसमें अशोक अभी बालक है, जिसे चाणक्य उसके शासक पिता बिन्दुसार के पास ले आए हैं, अनेक बाधाओं के बाद, अशोक और उसकी माता ‘धर्मा’ को राजवंश में उनका उचित स्थान दिला दिया गया है, और जबकि चाणक्य अशोक को भावी शासक बनने के लिए तैयार करने में लगे थे, चाणक्य जिनका सपना था कि अखंड भारत का गौरव और सम्मान, सम्राट अशोक के माध्यम से और बढ़े, उस स्वप्न दृष्टा चाणक्य को देशी-विदेशी खलनायक/खलनायिकाएं मिलकर मार डालते हैं, यहाँ तक पहुंचे हैं हम!


ये दुष्टात्माएँ भारत गौरव का स्वप्न देखने वाले, युगदृष्टा- चाणक्य की हत्या करते हैं, वे चाणक्य जिनका अर्थशास्त्र और राजनीति संबंधी दर्शन आज भी पढ़ा जाता है, वे भी इन लोगों के छल का शिकार हो जाते हैं!


हत्या के इस षडयंत्र में शामिल होते हैं- यूनानी राजमाता- हेलेना, जो अपने पुत्र जस्टिन को सिंहासन पर नहीं बैठा पाई थी, चाणक्य के कारण ही, और एक बार अपना षडयंत्र असफल हो जाने के बाद, अपने स्थान पर अपने पुत्र जस्टिन की कुर्बानी दे देती है| वह षडयंत्र था पूरे मौर्यवंश को लाक्षागृह में जलाकर मार डालने का| जिसमें ईरानी और खुरासानी दोनों शामिल थे|


खैर मैं कहानी के बारे में बहुत ज्यादा चर्चा नहीं करूंगा, लेकिन ऐसा ही लगता है कि जैसे राजमहल में हर कोई षडयंत्रकारी है| खुरासानी सेनानायक – मीर खुरासन, जिसकी पुत्री राजा बिंदुसार की एक रानी है, लेकिन वह चोरी छिपे प्रेम करती है ईरानी राजमाता के पुत्र- जस्टिन से और वास्तव में उसने जस्टिन के ही बेटे को जन्म दिया है, जो सिर्फ वह जानती है और जस्टिन की मृत्यु के बाद वो ये बात राजमाता को बता देती है और इस प्रकार षडयंत्र में ईरानी और खुरासानी एक साथ हो जाते हैं, (वास्तव में) जस्टिन के पुत्र श्यामक को गद्दी पर बैठाने के लिए राजमाता प्रयासरत है|


उधर बड़ी रानी-चारुमित्रा अपने पुत्र सुशीम को गद्दी पर बैठाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है, और सुशीम को भी अनैतिक साधनों का सहारा लेने में कोई संकोच नहीं होता| चारुमित्रा ‘काले जादू’ का सहारा लेकर अशोक और उसकी माँ को अपने मार्ग से हटाना चाहती है| उधर महा अमात्य- खल्लघट को यह कुंठा है कि चाणक्य के रहते उसको अधिक महत्व नहीं मिल पाता है|


इस प्रकार जितने भी खलनायक हैं, उन सबको लगता है कि चाणक्य के रहते उनके मंसूबे पूरे नहीं हो पाएंगे, और अंततः वे किसी बहाने से चाणक्य को एकांत स्थान पर बुलाते हैं और मिलकर उसकी हत्या कर देते हैं| इस हत्या में शामिल होते हैं- राजमाता-हेलेना, महा अमात्य- खल्लघट, रानी- चारुमित्रा, उनका महत्वाकांक्षी परंतु नाकारा पुत्र- सुशीम और यहाँ तक कि वे बालक- श्यामक को भी इस जघन्य अपराध में शामिल कर लेते हैं| इस प्रकार मुझे लगता है कि यह इस ऐतिहासिक धारावाहिक का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जबकि षडयंत्रकारियों के मार्ग में चट्टान बनाकर खड़े हुए चाणक्य की मृत्यु हो जाती है|


अब यही देखना है कि चाणक्य ने बालक अशोक पर जो मेहनत की है और जो आशाएँ उससे रखी हैं, वे भविष्य में कहाँ तक पूरी होती हैं| मेरा आशय सीरियल को लेकर है, वैसे तो इतिहास में यह सब बहुत पहले हो चुका है| सीरियल में भी बहुत पहले दिखाया जा चुका है, लेकिन हम तो अब देख रहे हैं न जी!


कुल मिलाकर मुझे यह भी लगा कि आज हम जितनी नैतिकता आदि की बात करते हैं, उस समय राजघरानों में इसका सर्वथा अभाव था| लगता है कि सारे षडयंत्रकारी राजमहल में ही बसे हुए थे|


आज मन हुआ कि चक्रवर्ती सम्राट अशोक सीरियल के इस पड़ाव पर चर्चा कर ली जाए|


आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|


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मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा !

एक बार फिर से मैं, हिन्दी काव्य मंचों और फिल्मी दुनिया, दोनों क्षेत्रों में अपनी रचनाधर्मिता की अमिट छाप छोड़ने वाले स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी गजल, जिसे वे ‘गीतिका’ कहते थे प्रस्तुत कर रहा हूँ| नीरज जी जहां कवि सम्मेलनों में बहुत लोकप्रिय थे, वहीं उन्होंने हमारी फिल्मों में भी अनेक साहित्यिक गरिमा से युक्त गीत लिखे|


आज की यह गजल भी उनकी एक अलग पहचान प्रस्तुत करती है –

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ।
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।

तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में,
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्म-ए-तर में रहा ।


वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की,
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा ।

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,
उसे न कुछ भी मिला, जो अगर-मगर में रहा ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अश्रु बहाने से न कभी पाषाण पिघलता है !

हिन्दी काव्य मंचों के प्रमुख एवं लोकप्रिय कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय शिशुपाल सिंह जी ‘निर्धन’ की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|


एक संकल्प इस कविता में है कि आज हमारे जीवन में कितना ही अंधकार क्यों न हो, हम अपने लक्ष्य अवश्य प्राप्त करेंगे| बड़ा ही ओजपूर्ण संकल्प इस कविता में व्यक्त किया गया है –


रात-रात भर जब आशा का दीप मचलता है,
तम से क्या घबराना सूरज रोज़ निकलता है ।

कोई बादल कब तक
रवि-रथ को भरमाएगा?
ज्योति-कलश तो निश्चित ही
आँगन में आएगा।


द्वार बंद मत करो भोर रसवंती आएगी,
कभी न सतवंती किरणों का चलन बदलता है ।

भले हमें सम्मानजनक
संबोधन नहीं मिले,
हम ऐसे हैं सुमन
कहीं गमलों में नहीं खिले।


अपनी वाणी है उद्बोधन गीतों का उद्गम,
एक गीत से पीड़ाओं का पर्वत गलता है ।

ठीक नहीं है यहाँ
वेदना को देना वाणी,
किसी अधर पर नहीं-
कामना, कोई कल्याणी ।


चढ़ता है पूजा का जल भी ऐसे चरणों पर
जो तुलसी बनकर अपने आँगन में पलता है ।

मत दो तुम आवाज़
भीड़ के कान नहीं होते,
क्योंकि भीड़ में-
सबके सब इंसान नहीं होते ।


मोती पाने के लालच में नीचे मत उतरो,
प्रणपालक तृण तूफ़ानों के सर पर चलता है ।

रात कटेगी कहो कहानी
राजा-रानी की,
करो न चिन्ता
जीवन-पथ में, गहरे पानी की।


हँसकर तपते रहो छाँव का अर्थ समझने को,
अश्रु बहाने से न कभी पाषाण पिघलता है ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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ये हुआ पेपर लीक!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

दिल्ली में सीबीएसई के कुछ पेपर लीक होने की घटना बहुत खेदजनक है और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। यह प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। वर्तमान व्यवस्था के रहते इसमें सुधार की संभावना नजर नहीं आ रही है।


आइए विचार करें कि इस प्रकार की घटनाएं आखिर क्यों बढ़ रही हैं। युवाओं के आतंकवादी बनने, गुंडों के गैंग में शामिल होने, एटीएम से फ्रॉड करके पैसा निकालने या अगर यह कुशलता हासिल न हो एटीएम मशीन को ही उठा ले जाने की दुस्साहसिक घटनाओं को भी मैं इस एक ही प्रवृत्ति के अंतर्गत देखता हूँ।


कुल मिलाकर देखा जाए तो ऐसी व्यवस्था है कि लोग शिक्षा प्राप्त करें, कोई कुशलता विकसित करें और उसके बाद किसी समुचित नौकरी के लिए लाइन में लगें क्योंकि ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जो अपने लिए स्वयं कोई रोज़गार सृजित कर सकें।


यह प्रक्रिया बहुत धीमी लगती है और आज के समय में ऐसे युवा भी बड़ी संख्या में मिल जाते हैं जो संपन्नता के पालने में पल रहे हैं और हर जगह अपनी इस संपन्नता का प्रदर्शन करते हैं। वे रेस्तरां हों, क्लब हों, पब हों या कोई अन्य स्थान हो जहाँ ऐसे लोगों के संपर्क में वे लोग भी आते हैं जो जीवन के धीमी गति वाले ट्रैक पर चल रहे हैं।


ऐसी स्थिति में बहुत से लोग हैं जिनको कोई भरमा लेता है या स्वयं ही उनके दिमाग में ऐसा कोई शैतानी आइडिया आ जाता है। आज के समय में यह भी सच्चाई है कि विश्व गुरू भारत, संस्कारों के मामले में कहीं नहीं ठहरता है। आज हमारा देश बुराइयों में दुनिया का नेतृत्व करने की हालत में है।


ऐसे लोग हर जगह मिल जाएंगे जो आसानी से बड़ी कमाई करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। ऐसे में वे चाहे आतंकवादी बनें, गुंडा बने या किसी भी प्रकार का फ्रॉड करें।


ऐसे मामलों को बढ़ावा देने में हमारी सुस्त और नाकारा न्याय व्यवस्था का भी बहुत बड़ा हाथ है। अगर ऐसा काम करके पकड़े जाने पर शीघ्र और कठोरतम दंड मिले तो उससे बहुत से संभावित अपराधियों का हौसला पस्त हो सकता है। लेकिन लगता यही है कि कुछ भी करके इस देश में आप बच सकते हैं।


ऐसे में साहिर लुधियानवी जी की ये पंक्तियां याद आती हैं , जो फिल्म- ‘फिर सुबह होगी’ के लिए मुकेश जी ने गाई हैं और राज कपूर जी पर फिल्माई गई हैं –
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम
आज कल वो इस तरफ देखता है कम ..
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम|


आजकल किसी को वो टोकता नहीं
चाहे कुछ भी कीजिये रोकता नहीं
हो रही है लूटमार घट रहें हैं गम|
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम||


किसको भेजे वो यहाँ खाक छानने
इस तमाम भीड़ का हाल जानने
आदमी हैं अनगिनत देवता हैं कम|
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम||


जो भी कुछ है ठीक है ज़िक्र क्यों करे
हम ही सब जहान की फ़िक्र क्यों करें
जब तुम्हे ही गम नहीं तो क्यों हमें हो गम|
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम|
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आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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