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ख़ून गिरा पी गई कचहरी!

आज एक श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| दिल्ली में रहते हुए उनसे मिलने के, उनका ओजस्वी काव्य-पाठ सुनने और उनके समक्ष अपनी कुछ रचनाएँ प्रस्तुत करने के भी अवसर प्राप्त हुए थे|
जैसे कोई योद्धा युद्ध में वीर-गति को प्राप्त होता है, रंजक जी के साथ ऐसा हुआ था कि दूरदर्शन के लिए कवि गोष्ठी की रिकॉर्डिंग के दौरान ही उनको दिल का दौरा पड़ा था, जो उनके प्राण लेकर ही गया|


आजकल अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत जी की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु के संदर्भ में ही नेताओं और अपराधियों के तंत्रजाल के संबंध में काफी चर्चा हो रही है|
ऐसे ही सदियों से चले आ रहे दुष्चक्र को उद्घाटित करता है रंजक जी का यह गीत–



परदे के पीछे मत जाना मेरे भाई !
टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे, बैठे हुए कसाई ।

बड़े-बड़े अफ़सर बैठे हैं,
माल धरे तस्कर बैठे हैं,
बैठे हैं कुबेर के बेटे,
ऐश लूटते लेटे-लेटे,
नंगी कॉकटेल में नंगी, नाच रही गोराई ।


इधर बोरियों की कतार,
पतलूनों में रोज़गार है,
बड़े-बड़े गोदाम पड़े हैं,
जिन पर नमक हराम खड़े हैं,
परदे के बाहर पहरे पर, आदमक़द महँगाई ।

जिसने उधर झाँककर देखा,
उसकी खिंची पीठ पर रेखा,
काया लगने लगी गिलहरी,
ख़ून गिरा पी गई कचहरी,
ऐसा क़त्ल हुआ चौरे में, लाश न पड़ी दिखाई ।


तेरी क्या औक़ात बावले,
जो परदे की ओर झाँक ले,
ये परदा इस-उसका चंदा,
समझौतों का गोल पुलंदा,
ऐसा गोरखधंधा, जिसकी नस-नस में चतुराई ।

जो इक्के-दुक्के जाएँगे,
वापस नहीं लौट पाएँगे,
जाना है तो गोल बना ले,
हथियारों पर हाथ जमा ले,
ऐसा हल्ला बोल कि जागे, जन-जन की तरुणाई ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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5 replies on “ख़ून गिरा पी गई कचहरी!”

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