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और फिर मानना पड़ता है, ख़ुदा है मुझ में

आज उर्दू शायरी के एक और सिद्धहस्त हस्ताक्षर स्वर्गीय कृष्ण बिहारी ‘नूर’ जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| नूर साहब भी अपने अलग अंदाज़ के लिए जाने जाते थे|

आइए आज इस अलग क़िस्म की ग़ज़ल का आनंद लेते हैं-



आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में|
और फिर मानना पड़ता है , ख़ुदा है मुझ में|

अब तो ले-दे के वही शख़्स बचा है मुझ में,
मुझको मुझ से जुदा करके जो छुपा है मुझ में|

मेरा ये हाल उभरती सी तमन्ना जैसे,
वो बड़ी देर से कुछ ढूंढ रहा है मुझ में|

जितने मौसम हैं सभी जैसे कहीं मिल जायें,
इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझ में|

आईना ये तो बताता है कि मैं क्या हूँ लेकिन,
आईना इस पे है ख़मोश कि क्या है मुझ में|

अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ “नूर”,
मैं कहाँ तक करूँ साबित कि वफ़ा है मुझ में|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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