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मनवा तो सावन -सावन रहा!

आज श्रेष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी का एक साहित्यिक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में महीनों के माध्यम से मौसम और मौसम के बहाने जीवन के विभिन्न पड़ावों का वर्णन बड़ी खूबसूरती से किया गया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

देह हुई फागुन तो क्या हुआ
रे मितवा
मनवा तो सावन -सावन रहा|

इतना विश्वास किया अपनों पर
चंद्रमा रखा हम ने सपनों पर,
हमको जग की चित्तरसारी में
हर चेहरा दर्पण -दर्पण रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


बस इतना ही धरम –करम भाया
अपनाया जो जीभर अपनाया,
हमको तो सदा प्रेम -मंदिर का
हर रजकण चंदन -चंदन रहा|

रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


कौन रखे याद इस कहानी को
कहाँ मिले शरण आग पानी को,
गुँथी हुई बाँहों में मुक्ति मिली
बाकी सुख बंधन -बंधन रहा|

रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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