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थेम्स नदी और लंदन !

अभी तो मैं नई-पुरानी पोस्ट की बात भी नहीं करूंगा, क्योंकि मन है कि कुछ दिन तक लंदन प्रवास की अपनी यादें ताज़ा करूं| पहले मैं शेयर कर रहा हूँ जून-जुलाई 2018 के प्रवास के कुछ अनुभव और उसके बाद अगस्त-सितंबर 2019 पर आऊँगा|


लंदन में वीक-एंड का दूसरा दिन रविवार, जब हम एक बार फिर से घूमने के लिए निकले, बस और ट्रेन से प्रारंभिक यात्रा करने के बाद हम पहुंचे ‘ग्रीनविच’ जो कि मेरिडियन लाइन पर स्थित है। मेरिडियन लाइन की रीडिंग के आधार पर ही जीएमटी (ग्रीनविच मीन टाइम) निर्धारित किया जाता है, दुनिया में हर स्थान की कोणीय स्थिति, इस स्थान से वह कितने कोण पर स्थित है, शायद ऐसे निर्धारित की जाती है। वैज्ञानिक किस्म के दिमाग वालों के लिए इसमें शायद और बहुत सी बातें जानने के लिए हों, मेरे लिए इतना ही बहुत है।


इसके पास ही क्वीन का महल और रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी भी है, जहाँ बहुत सी खगोलीय गणनाएं की जाती हैं। वैसे लंदन में क्वीन के महल बहुत से हैं यह भी पुराना है, यहाँ की प्रॉपर्टी का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी रॉयल परिवार के पास है।


इसके पास ही वह स्थान है, जहाँ से इस मौसम में, प्रत्येक रविवार की शाम को एक क्रूज़ के द्वारा थेम्स नदी की लगभग 2 घंटे की यात्रा कराई जाती है तथा इसमें दिखाया और बताया जाता है कि थेम्स नदी के किनारों पर कौन से महत्वपूर्ण स्थान हैं।

वैसे देखा जाए तो पुराने ज़माने में, सभी महत्वपूर्ण नगर प्रमुख नदियों के किनारे ही बसाए गए थे, जैसे हमारे यहाँ- गंगा, यमुना, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र आदि-आदि नदियों के किनारे पर। लंदन में तो लगता है कि थेम्स नदी नगर के बीचों-बीच होकर गुज़रती है और इसके ऊपर अनेक पुल हैं, जो नगर के दोनों तरफ के हिस्सों को जोड़ते हैं। एक पुल के सिर्फ स्तंभ खड़े हुए थे, बताया गया कि पुल गिर गया था, सो उसके स्तंभों को लगे रहने दिया गया। यह जानकर तसल्ली हुई कि लंदन में भी पुल गिर जाते हैं। बाकी पुल तो बहुत सारे हैं, जिनमें प्रसिद्ध लंदन ब्रिज भी है और भी ब्रिज अलग-अलग कारणों से प्रसिद्ध हैं।

शिप से लौटते समय अनेक इमारतें और स्ट्रक्चर, नए-पुराने दिखाए गए, इनमें ‘लंदन आई’ भी है, जो एक विशाल आकाश-झूला है, लगातार चलता रहता है लेकिन देखने में लगता है कि वह स्थिर है, उसका एक चक्कर लगभग आधे घंटे में पूरा होता है। इसके अलावा अनेक कैथेड्रल, और मूल्यवान प्रॉपर्टी दिखाई गईं।


एक बात जिसने मेरा ध्यान ज्यादा आकर्षित किया, नदी के जिस किनारे पर पुराने महल आदि अधिक थे, उस तरफ अनेक कैदखाने भी थे, जहाँ बताया गया कि कैदियों को फांसी भी दी जाती थी। नदी के दूसरे किनारे पर विलियम शेक्सपियर और चार्ल्स डिकेंस से जुड़े अनेक स्थान थे, जिनमें थिएटर और वे स्थान भी थे जिनको लेकर डिकेंस ने अपने उपन्यास आदि लिखे थे।


कुल मिलाकर जीवन नदी के दो निरंतर समानांतर चलते किनारे, जिनमें से एक पर राज-काज, सुख-सामान और अपराध और दूसरी तरफ सृजन, अभिव्यक्ति आदि। ये विभाजन मैंने ऐसे ही कर दिया, जरूरी नहीं है कि ऐसा कोई विभाजन हो, ये साथ-साथ भी चल सकते हैं।


नदी किनारे पर स्थित भवनों, स्थानों आदि के नाम लेने में तो बहुत टाइम लग जाएगा, मैंने उनको याद भी नहीं किया, वह बताने का मेरा उद्देश्य भी नहीं है, पर इनमें से कुछ हैं- टॉवर ऑफ लंदन, लंदन एक्वेरियम, हाउसेज़ ऑफ पार्लिआमेंट, बटर-सी पार्क, रॉयल बोटेनिक गार्डन्स और ब्रिज तो कम से कम 15-20 हैं।


अंत में डॉ. कुंवर बेचैन जी के एक गीत की दो पंक्तियां, ऐसे ही याद आ रही हैं-


नदी बोली समुंदर से मैं तेरे पास आई हूँ,
मुझे भी गा मेरे साजन, मैं तेरी ही रुबाई हूँ!


आज के लिए इतना ही!



नमस्कार।
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सफर पुराना, मंज़िल पुरानी!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

वैसे मुझे लगता है कि अभी कुछ दिन तक मैं बहुत से पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर करूंगा और इस बहाने लंदन की यादें ताज़ा करूंगा| हमारे फैमिली ग्रुप का नाम ही रहा है- ‘लंदन, गोवा, बंगलौर’, क्योंकि एक-एक बेटा इन तीनों जगह रहते रहे हैं| हम दो बार लंदन भी रह आए हैं, एक बार- एक माह के लिए और एक बार डेढ़ माह के लिए| लेकिन अब फैमिली ग्रुप का नाम भी बदल गया है, क्योंकि लंदन वाला बेटा अब कनाडा चला गया है| अब लंदन फिर से जाकर रहने की संभावना तो नहीं है| कोई नहीं यादों की पुरानी गठरी तो खोल ही सकते हैं|


जैसा मैंने पहले बताया था, हम एक माह के लिए लंदन आए हुए हैं, यहाँ थेम्स नदी के किनारे पर अपने बेटे-बहू के घर में रह रहे हैं, घर की एक तरफ जिधर थेम्स नदी बहती है, उधर कांच की ही दीवार, दरवाजा है, दिन भर नावें और छोटे-मोटे शिप दिखाई देते रहते हैं। नदी के दूसरे किनारे पर ओ-2 कॉन्टिनेंटल और ईवेंट प्लेस है, जो पिछ्ले ओलंपिक के समय विकसित किया गया था, कल वहाँ भी जाना हुआ।


हाँ तो वीक एंड होने के नाते, आज हम पति-पत्नी, अपने बेटे और बहू के साथ बाहर घूमने निकले। शुरुआत हुई यहाँ की लोकल बस से ट्यूब रेल स्टेशन ‘कैनेरी व्हार्फ’ और वहाँ से ट्यूब पकड़कर ग्रीन पार्क तक जाकर! वहाँ एक बर्थडे में भाग लेना था ना!


जी हाँ, ग्रीन पार्क ट्यूब स्टेशन है यहाँ लंदन में और उसके पास ही है बकिंघम पैलेस! कल क्वीन विक्टोरिया का जन्म दिन था, और हम क्योंकि कुछ देर में पहुंचे, तो हमें दूर से ही देखना पड़ा। बॉलकनी से रॉयल फैमिली के लोग, जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे, जहाँ हम थे, वहाँ से उनकी शक्लें साफ दिखाई नहीं दे रही थीं। हाँ जब हम पहुंचे तब तोपों की सलामी दी जा रही थी।


शाही परिवार रहता तो कहीं और है लेकिन ऐसे आयोजन के लिए बकिंघम पैलेस आता है। बहुत भीड़ थी, ठीक से देख भी नहीं पाए, इससे साफ तो अपना सलमान ही बॉलकनी से हाथ हिलाते हुए दिख जाता है, भले ही वो जेल से छूटकर आने पर हो। खैर फिर हमारे सामने ही रॉयल फैमिली के लोग वहाँ से वापस भी लौटकर भी चले गए और सेरेमॉनियल बैन्ड और घोड़े वगैरा भी।
महल से लौटकर फिर हमने ट्यूब पकड़ी, हाँ एक बात और, अपनी दिल्ली की मैट्रो से एक फर्क है यहाँ की ट्यूब में, प्लेटफॉर्म का किनारा पूरा कवर रहता है,और जैसे दीवार बनी हो, सिर्फ ट्यूब के डिब्बे के दरवाजे के सामने का हिस्सा खुलता है, जैसा हमने पहले दुबई में भी देखा था।


हाँ तो ट्यूब पकड़कर हम ओ-2 एरिया में गए, जो हमारे घर से ही, नदी के पार दिखता है, लेकिन ट्यूब हमें टनेल के माध्यम से, नदी के नीचे होकर वहाँ ले जाती है। ओ-2 एरिया गुड़गांव के ‘किंगडम ऑफ ड्रीम्स’ जैसा भव्य है, बस अंदर फाल्स सीलिंग को आकाश का रूप नहीं दिया है।


जिसे साधारण भाषा में रोप-वे भी कह सकते हैं, यहाँ उसका अनुभव भव्य था, पूरे लंदन का नज़ारा बहुत ऊंचाई से उसमें दिखता है, और उसको कहते हैं- एमिरेट्स एयरलाइंस। इस दिव्य यात्रा के बाद, आज के सफर को विराम दिया, घर पहुंचकर।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार।

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किसी से हाय दिल को लगा के!

आज फिर से अपने प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मेरा मानना है की मुकेश जी का गाया लगभग हर गीत अमर है| अपनी आवाज का दर्द जब वे गीत में पिरो देते थे, तब चमत्कार ही हो जाता था|


आज का यह गीत फिल्म- बारात से है, गीत के बोल लिखे हैं मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने और इस गीत का संगीत तैयार किया था, चित्रगुप्त जी ने, यह गीत वैसे अजित जी पर फिल्माया गया था|

लीजिए प्रस्तुत है यह नायाब गीत-

मुफ्त हुए बदनाम
किसी से हाय दिल को लगा के,
जीना हुआ इल्जाम
किसी से हाय दिल को लगा के|
मुफ्त हुए बदनाम|


गए अरमान ले के
लुटे लुटे आते हैं,
लोग जहां में कैसे
दिल को लगाते हैं|
दिल को लगाते हैं,
अपना बनाते हैं,
हम तो फिर नाकाम,
किसी से हाय दिल को लगा के,
मुफ्त हुए बदनाम|


समझे थे साथ देगा,
किसी का सुहाना ग़म
उठी जो नज़र तो देखा
तनहा खड़े हैं हम,
तनहा खड़े हैं हम,
दिन भी रहा है कम|

रस्ते में हो गयी शाम,
किसी से हाय दिल को लगा के,
मुफ्त हुए बदनाम|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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जहां मन में नहीं है कोई भय- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Where The Mind Is Without Fear’ का भावानुवाद-
गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


जहां मन में नहीं है कोई भय!


जहां मन भयमुक्त है, और मस्तक ऊंचा है गर्व से,
जहां ज्ञान मुक्त है,
जहां दुनिया छोटे-छोटे टुकड़ों में नहीं बंट गई है,
दुनियादारी की संकीर्ण दीवारों से,
जहां शब्द उभरकर आते हैं, सच्चाई की गहराई से,
जहां अथक परिश्रम फैलाता है अपनी बाँहें, परिपूर्णता की ओर,
जहां तर्क की निर्मल धारा, ने नहीं खो दिया है अपना रास्ता
मृत आदतों के सुनसान रेगिस्तान में,
जहां मस्तिष्क को सदा आप मार्ग दिखाते हो मेरे प्रभु,
निरंतर विस्तारित होते, चिंतन और क्रियाशीलता में,
स्वतंत्रता के उस स्वर्ग में, मेरे प्रभु, मेरे राष्ट्र को जागृत होने दो|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Where The Mind Is Without Fear

Where the mind is without fear and the head is held high
Where knowledge is free
Where the world has not been broken up into fragments
By narrow domestic walls
Where words come out from the depth of truth
Where tireless striving stretches its arms towards perfection
Where the clear stream of reason has not lost its way
Into the dreary desert sand of dead habit
Where the mind is led forward by thee
Into ever-widening thought and action
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तब पता यह चला, मूलधन खो गया!

आज एक बार फिर से आज मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर, स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय त्यागी जी जुझारूपन की कविता के लिए जाने जाते थे और एक अलग तरह की छाप उनकी कविताओं की पड़ती थी|

लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर गीत कविता –

तन बचाने चले थे कि मन खो गया,
एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया|

घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही,
और सब कुछ है वातावरण खो गया|

यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया,
गाँव को जो दिया था वचन खो गया|

जो हज़ारों चमन से महकदार था,
क्या किसी से कहें वह सुमन खो गया|


दोस्ती का सभी ब्याज़ जब खा चुके,
तब पता यह चला, मूलधन खो गया|

यह जमीं तो कभी भी हमारी न थी,
यह हमारा तुम्हारा गगन खो गया|

हमने पढ़कर जिसे प्यार सीखा कभी,
एक गलती से वह व्याकरण खो गया|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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गीतांजलि-1 रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है।

आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Gitanjali-1’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

गीतांजलि-1




तुमने मुझे अनंत बना दिया है, मेरे प्रभु, ऐसी है तुम्हारी प्रसन्नता| यह कमजोर सा पात्र, मेरा शरीर, आप इसे बार-बार भरते हो, बार-बार खाली करते हो, और फिर-फिर भर देते हो, ताज़ा जीवन से|

यह छोटी सी बांस की बांसुरी, तुम इसे साथ लेकर घूमे हो, पहाड़ों पर और घाटियों में, और इसके भीतर फूंकी हैं, ऐसी धुनें जो सदा नूतन और शाश्वत हैं|


तुम्हारे हाथों का अमर स्पर्श पाकर, मेरा छोटा सा हृदय आनंद की सारी सीमाएं भूल जाता है, और अनेक अनकही बातें कह डालता है|

तुम्हारे अनंत उपहार मेरे पास, मेरे इन छोटे-छोटे हाथों में ही आते हैं| युग बीत गए हैं, और अब भी उंडेलते जा रहे हो तुम अपनी करुणा, और अभी भी यहाँ जगह है, और भरने के लिए
|

-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Gitanjali – 1


Thou hast made me endless, such is thy pleasure. This frail vessel thou emptiest again and again, and fillest it ever with fresh life.

This little flute of a reed thou hast carried over hills and dales, and hast breathed through it melodies eternally new.

At the immortal touch of thy hands my little heart loses its limits in joy and gives birth to utterance ineffable.

Thy infinite gifts come to me only on these very small hands of mine. Ages pass, and still thou pourest, and still there is room to fill.




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अनोखा इतिहास ज्ञान!

एक बार फिर से आज मैं हिन्दी हास्य कविता के दुर्लभ हस्ताक्षर, स्वर्गीय ओम प्रकाश आदित्य जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह एक लंबी हास्य कविता है जो उन्होंने एक ऐसे छात्र के बहाने से लिखी है, जो इतिहास की परीक्षा देने जाता है लेकिन उसे कुछ भी नहीं आता है|

लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर हास्य कविता –

इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिंता से हृदय धड़कता था,
थे बुरे शकुन घर से चलते ही, दाँया हाथ फड़कता था|

मैंने सवाल जो याद किए, वे केवल आधे याद हुए,
उनमें से भी कुछ स्कूल तल, आते-आते बर्बाद हुए|

तुम बीस मिनट हो लेट द्वार पर चपरासी ने बतलाया,
मैं मेल-ट्रेन की तरह दौड़ता कमरे के भीतर आया|


पर्चा हाथों में पकड़ लिया, आँखें मूंदीं टुक झूम गया,
पढ़ते ही छाया अंधकार, चक्कर आया सिर घूम गया|

उसमें आए थे वे सवाल जिनमें मैं गोल रहा करता,
पूछे थे वे ही पाठ जिन्हें पढ़ डाँवाडोल रहा करता|

यह सौ नंबर का पर्चा है, मुझको दो की भी आस नहीं,
चाहे सारी दुनिय पलटे पर मैं हो सकता पास नहीं|


ओ! प्रश्न-पत्र लिखने वाले, क्या मुँह लेकर उत्तर दें हम,
तू लिख दे तेरी जो मर्ज़ी, ये पर्चा है या एटम-बम|

तूने पूछे वे ही सवाल, जो-जो थे मैंने रटे नहीं,
जिन हाथों ने ये प्रश्न लिखे, वे हाथ तुम्हारे कटे नहीं|

फिर आँख मूंदकर बैठ गया, बोला भगवान दया कर दे,
मेरे दिमाग़ में इन प्रश्नों के उत्तर ठूँस-ठूँस भर दे|

मेरा भविष्य है ख़तरे में, मैं भूल रहा हूँ आँय-बाँय,
तुम करते हो भगवान सदा, संकट में भक्तों की सहाय|


जब ग्राह ने गज को पकड़ लिया तुमने ही उसे बचाया था,
जब द्रुपद-सुता की लाज लुटी, तुमने ही चीर बढ़ाया था|

द्रौपदी समझ करके मुझको, मेरा भी चीर बढ़ाओ तुम,
मैं विष खाकर मर जाऊंगा, वर्ना जल्दी आ जाओ तुम|

आकाश चीरकर अंबर से, आई गहरी आवाज़ एक,
रे मूढ़ व्यर्थ क्यों रोता है, तू आँख खोलकर इधर देख|

गीता कहती है कर्म करो, चिंता मत फल की किया करो,
मन में आए जो बात उसी को, पर्चे पर लिख दिया करो|


मेरे अंतर के पाट खुले, पर्चे पर क़लम चली चंचल,
ज्यों किसी खेत की छाती पर, चलता हो हलवाहे का हल|

मैंने लिक्खा पानीपत का दूसरा युध्द भर सावन में,
जापान-जर्मनी बीच हुआ, अट्ठारह सौ सत्तावन में|

लिख दिया महात्मा बुध्द महात्मा गांधी जी के चेले थे,
गांधी जी के संग बचपन में आँख-मिचौली खेले थे|

राणा प्रताप ने गौरी को, केवल दस बार हराया था,
अकबर ने हिंद महासागर, अमरीका से मंगवाया था|


महमूद गजनवी उठते ही, दो घंटे रोज नाचता था,
औरंगजेब रंग में आकर औरों की जेब काटता था|

इस तरह अनेकों भावों से, फूटे भीतर के फव्वारे,
जो-जो सवाल थे याद नहीं, वे ही पर्चे पर लिख मारे|

हो गया परीक्षक पागल सा, मेरी कॉपी को देख-देख,
बोला- इन सारे छात्रों में, बस होनहार है यही एक|

औरों के पर्चे फेंक दिए, मेरे सब उत्तर छाँट लिए,
जीरो नंबर देकर बाकी के सारे नंबर काट लिए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है!

आज प्रस्तुत कर रहा हूँ ज़नाब शहजाद अहमद जी की एक खूबसूरत ग़ज़ल, इस गजल के कुछ शेर गुलाम अली साहब ने भी गाए हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर ग़ज़ल –

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है,
एक नज़र मेरी तरफ भी, तेरा जाता क्या है|

मेरी रुसवाई में तू भी है बराबर का शरीक़,
मेरे किस्से मेरे यारों को सुनाता क्या है|

पास रहकर भी न पहचान सका तू मुझको,
दूर से देखकर अब हाथ हिलाता क्या है|

सफ़र-ए-शौक में क्यूँ कांपते हैं पाँव तेरे,
आँख रखता है तो फिर आँख चुराता क्या है|


उम्र भर अपने गरीबां से उलझने वाले,
तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है|

मर गए प्यास के मारे तो उठा अब्र-ए-करम,
बुझ गयी बज़्म तो अब शम्मा ज़लाता क्या है|

मैं तेरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता,
देखकर मुझको तेरे ज़ेहन में आता क्या है|

तुझमें जो बल है तो दुनिया को बहाकर लेजा,
चाय की प्याली में तूफ़ान उठाता क्या है|


तेरी आवाज़ का जादू न चलेगा उन पर,
जागने वालो को ‘शहजाद’ जगाता क्या है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा !

हिन्दी काव्य मंचों की शान रहे स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी ग़ज़ल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ|


कविता अपनी बात स्वयं कहती है और नीरज जी भी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं| लीजिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल और नीरज जी के शब्दों में कहें तो ‘गीतिका’-


बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा,
वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा|

ख़रीदने को जिसे कम थी दौलत-ए-दुनिया,
किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा|


मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी,
कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा|

बड़ा न छोटा कोई फ़र्क़ बस नज़र का है,
सभी पे चलते समय एक सा कफ़न देखा|

ज़बाँ है और बयाँ और उस का मतलब और,
अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा|


लुटेरे डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे,
उन्होंने आज जो संतों का आचरण देखा|

जो सादगी है कुहन में हमारे ऐ ‘नीरज’,
किसी पे और भी क्या ऐसा बाँकपन देखा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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न मैं होता तो क्या होता!

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है ये पोस्ट-

एक पुराने संदर्भ से प्रेरणा लेते हुए आज का आलेख लिख रहा हूँ। लेकिन मैं उन प्रसंगों का ही उल्लेख कर रहा हूँ जिनसे मेरे जीवन, मेरे करियर को सकारात्मक दिशा मिली है। ऐसे प्रसंग नहीं हैं जिनके बारे में मैं नकारात्मक रूप में लिख सकूं।

मैंने अपने शुरू के ब्लॉग्स में अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं, प्रसंगों, प्रभावित करने वाले और कुछ बाधक बनने वाले व्यक्तियों का क्रमबद्ध तरीके से उल्लेख किया, आज संक्षेप में कुछ घटनाओं का उल्लेख करूंगा, जो जीवन को दिशा देने वाली सिद्ध हुईं।


मेरा जन्म हुआ था दिल्ली के दरिया गंज में, लेकिन जब तक मैंने पढ़ाई शुरू की तब तक हम शाहदरा जा चुके थे, जहाँ रहते हुए मैंने पढ़ाई की और जब मैं बीएससी फाइनल में आया था तब मेरे पिता, जो एक विक्रय प्रतिनिधि के रूप में दौरों पर जाते रहते थे, वे एक बार गए तो फिर वापस नहीं आए। मैं यह कह सकता हूँ कि काश यह न हुआ होता, तब शायद ज़िंदगी ज्यादा आसान हो सकती थी, लेकिन पिताजी का काम ठीक से चल नहीं रहा था और वे सन्यास लेने की सोच रहे थे काफी समय से, शायद उनकी ज़िंदगी ज्यादा आराम से बीती हो उसके बाद! वैसे शायद यदि वे न गए होते तो मैं कुछ और हुआ होता!


खैर पिता के जाने के बाद मैंने, पढ़ाई छोड़कर, पहले चार वर्षों में प्रायवेट नौकरियां कीं, जिनमें वेतन रु. 100/- से लेकर शायद 250 तक पहुंचा। उसके बाद केंद्रीय सचिवालय में क्लर्क के रूप में सेवा की लगभग 6 वर्ष तक। विस्तृत विवरण मैं अपने शुरू के ब्लॉग्स में दे चुका हूँ।


जब क्लर्क था, तब की एक घटना, जिसका उल्लेख मैं पहले भी कर चुका हूँ। मैं एलडीसी था और उससे ऊपर का स्तर होता है यूडीसी, जिसमें एक बुज़ुर्ग साथी कार्यरत थे। खूब ओवरटाइम करते थे, अधिक कमाई करने के लिए, जिससे घर का खर्च चल सके! एक बार ओवरटाइम करके लौटते हुए वे साइकिल से गिर गए, बेहोश हो गए, अस्पताल में जब उनको होश आया, तब उनका यही सवाल था-‘ मेरा ओवरटाइम चल रहा है न!’


यह प्रसंग मैंने इसलिए सुनाया कि उस नौकरी में रहते हुए मैं शायद इस गति को प्राप्त होने के ही सपने देख सकता था, शायद उससे ऊपर के स्तर ‘सहायक’ तक पहुंच पाता, रिटायर होने तक!


इस दौरान मैंने बीच में छूटी पढ़ाई को आगे बढ़ाते हुए प्रायवेटली बी.ए. कर लिया था और स्टॉफ सेलेक्शन कमीशन की परीक्षा पास करके मैं ‘हिंदी अनुवादक’ के पद हेतु चुन लिया गया था, जो उस समय के हिसाब से अच्छी उड़ान थी और मेरी पोस्टिंग आकाशवाणी, जयपुर में हो गई। आकाशवाणी में रहते हुए मैंने हिंदी में एम.ए. भी कर लिया।


एक ही और घटना का उल्लेख करना चाहूंगा, आकाशवाणी की नौकरी करते हुए मैंने केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो का प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसमें मैं प्रथम आया और मुझे मैडल मिला। उसके बाद हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, घाटशिला, झारखंड में मैंने सहायक हिंदी अधिकारी के पद हेतु आवेदन किया। केद्रीय मंत्री रहीं सुश्री राम दुलारी सिन्हा जी के स्टॉफ के एक सज्जन भी वहाँ इंटरव्यू देने आए थे और वे मान रहे थे कि चयन तो उनका ही होना है। उनका चयन नहीं हुआ और मेरा हो गया। बाद में उनकी शिकायत आई जिसे दो केंद्रीय मंत्रियों ने अग्रेषित किया था।


ये सारे प्रसंग अपनी जगह, लेकिन मैं जिसके सपने शुरू में एल.डी.सी से सहायक तक बनने के थे, वह अंततः एनटीपीसी से मिडिल मैंनेजमेंट स्तर तक पहुंचकर रिटायर हुआ, कैसे कहूं कि काश ये न हुआ होता या वो न हुआ होता!

डुबोया मुझको होने ने,
न मैं होता तो क्या होता!

चचा गालिब का ये शेर तो ऐसे ही याद आ गया जी, कोई अर्थ तलाश मत कीजिए।
नमस्कार!
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