न मैं होता तो क्या होता!

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है ये पोस्ट-

एक पुराने संदर्भ से प्रेरणा लेते हुए आज का आलेख लिख रहा हूँ। लेकिन मैं उन प्रसंगों का ही उल्लेख कर रहा हूँ जिनसे मेरे जीवन, मेरे करियर को सकारात्मक दिशा मिली है। ऐसे प्रसंग नहीं हैं जिनके बारे में मैं नकारात्मक रूप में लिख सकूं।

मैंने अपने शुरू के ब्लॉग्स में अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं, प्रसंगों, प्रभावित करने वाले और कुछ बाधक बनने वाले व्यक्तियों का क्रमबद्ध तरीके से उल्लेख किया, आज संक्षेप में कुछ घटनाओं का उल्लेख करूंगा, जो जीवन को दिशा देने वाली सिद्ध हुईं।


मेरा जन्म हुआ था दिल्ली के दरिया गंज में, लेकिन जब तक मैंने पढ़ाई शुरू की तब तक हम शाहदरा जा चुके थे, जहाँ रहते हुए मैंने पढ़ाई की और जब मैं बीएससी फाइनल में आया था तब मेरे पिता, जो एक विक्रय प्रतिनिधि के रूप में दौरों पर जाते रहते थे, वे एक बार गए तो फिर वापस नहीं आए। मैं यह कह सकता हूँ कि काश यह न हुआ होता, तब शायद ज़िंदगी ज्यादा आसान हो सकती थी, लेकिन पिताजी का काम ठीक से चल नहीं रहा था और वे सन्यास लेने की सोच रहे थे काफी समय से, शायद उनकी ज़िंदगी ज्यादा आराम से बीती हो उसके बाद! वैसे शायद यदि वे न गए होते तो मैं कुछ और हुआ होता!


खैर पिता के जाने के बाद मैंने, पढ़ाई छोड़कर, पहले चार वर्षों में प्रायवेट नौकरियां कीं, जिनमें वेतन रु. 100/- से लेकर शायद 250 तक पहुंचा। उसके बाद केंद्रीय सचिवालय में क्लर्क के रूप में सेवा की लगभग 6 वर्ष तक। विस्तृत विवरण मैं अपने शुरू के ब्लॉग्स में दे चुका हूँ।


जब क्लर्क था, तब की एक घटना, जिसका उल्लेख मैं पहले भी कर चुका हूँ। मैं एलडीसी था और उससे ऊपर का स्तर होता है यूडीसी, जिसमें एक बुज़ुर्ग साथी कार्यरत थे। खूब ओवरटाइम करते थे, अधिक कमाई करने के लिए, जिससे घर का खर्च चल सके! एक बार ओवरटाइम करके लौटते हुए वे साइकिल से गिर गए, बेहोश हो गए, अस्पताल में जब उनको होश आया, तब उनका यही सवाल था-‘ मेरा ओवरटाइम चल रहा है न!’


यह प्रसंग मैंने इसलिए सुनाया कि उस नौकरी में रहते हुए मैं शायद इस गति को प्राप्त होने के ही सपने देख सकता था, शायद उससे ऊपर के स्तर ‘सहायक’ तक पहुंच पाता, रिटायर होने तक!


इस दौरान मैंने बीच में छूटी पढ़ाई को आगे बढ़ाते हुए प्रायवेटली बी.ए. कर लिया था और स्टॉफ सेलेक्शन कमीशन की परीक्षा पास करके मैं ‘हिंदी अनुवादक’ के पद हेतु चुन लिया गया था, जो उस समय के हिसाब से अच्छी उड़ान थी और मेरी पोस्टिंग आकाशवाणी, जयपुर में हो गई। आकाशवाणी में रहते हुए मैंने हिंदी में एम.ए. भी कर लिया।


एक ही और घटना का उल्लेख करना चाहूंगा, आकाशवाणी की नौकरी करते हुए मैंने केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो का प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसमें मैं प्रथम आया और मुझे मैडल मिला। उसके बाद हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, घाटशिला, झारखंड में मैंने सहायक हिंदी अधिकारी के पद हेतु आवेदन किया। केद्रीय मंत्री रहीं सुश्री राम दुलारी सिन्हा जी के स्टॉफ के एक सज्जन भी वहाँ इंटरव्यू देने आए थे और वे मान रहे थे कि चयन तो उनका ही होना है। उनका चयन नहीं हुआ और मेरा हो गया। बाद में उनकी शिकायत आई जिसे दो केंद्रीय मंत्रियों ने अग्रेषित किया था।


ये सारे प्रसंग अपनी जगह, लेकिन मैं जिसके सपने शुरू में एल.डी.सी से सहायक तक बनने के थे, वह अंततः एनटीपीसी से मिडिल मैंनेजमेंट स्तर तक पहुंचकर रिटायर हुआ, कैसे कहूं कि काश ये न हुआ होता या वो न हुआ होता!

डुबोया मुझको होने ने,
न मैं होता तो क्या होता!

चचा गालिब का ये शेर तो ऐसे ही याद आ गया जी, कोई अर्थ तलाश मत कीजिए।
नमस्कार!
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4 Comments

  1. एक प्रेरणास्पद कहानी है आपकी। नियति ही हमारा पथ निर्धारित करती है, पर सफलता तो जुझारूपन और लगन से ही आती है, जो आपने सिद्ध किया है।

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