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किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा !

हिन्दी काव्य मंचों की शान रहे स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी ग़ज़ल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ|


कविता अपनी बात स्वयं कहती है और नीरज जी भी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं| लीजिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल और नीरज जी के शब्दों में कहें तो ‘गीतिका’-


बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा,
वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा|

ख़रीदने को जिसे कम थी दौलत-ए-दुनिया,
किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा|


मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी,
कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा|

बड़ा न छोटा कोई फ़र्क़ बस नज़र का है,
सभी पे चलते समय एक सा कफ़न देखा|

ज़बाँ है और बयाँ और उस का मतलब और,
अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा|


लुटेरे डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे,
उन्होंने आज जो संतों का आचरण देखा|

जो सादगी है कुहन में हमारे ऐ ‘नीरज’,
किसी पे और भी क्या ऐसा बाँकपन देखा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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2 replies on “किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा !”

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