Categories
Uncategorized

गीतांजलि-1 रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है।

आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Gitanjali-1’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

गीतांजलि-1




तुमने मुझे अनंत बना दिया है, मेरे प्रभु, ऐसी है तुम्हारी प्रसन्नता| यह कमजोर सा पात्र, मेरा शरीर, आप इसे बार-बार भरते हो, बार-बार खाली करते हो, और फिर-फिर भर देते हो, ताज़ा जीवन से|

यह छोटी सी बांस की बांसुरी, तुम इसे साथ लेकर घूमे हो, पहाड़ों पर और घाटियों में, और इसके भीतर फूंकी हैं, ऐसी धुनें जो सदा नूतन और शाश्वत हैं|


तुम्हारे हाथों का अमर स्पर्श पाकर, मेरा छोटा सा हृदय आनंद की सारी सीमाएं भूल जाता है, और अनेक अनकही बातें कह डालता है|

तुम्हारे अनंत उपहार मेरे पास, मेरे इन छोटे-छोटे हाथों में ही आते हैं| युग बीत गए हैं, और अब भी उंडेलते जा रहे हो तुम अपनी करुणा, और अभी भी यहाँ जगह है, और भरने के लिए
|

-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Gitanjali – 1


Thou hast made me endless, such is thy pleasure. This frail vessel thou emptiest again and again, and fillest it ever with fresh life.

This little flute of a reed thou hast carried over hills and dales, and hast breathed through it melodies eternally new.

At the immortal touch of thy hands my little heart loses its limits in joy and gives birth to utterance ineffable.

Thy infinite gifts come to me only on these very small hands of mine. Ages pass, and still thou pourest, and still there is room to fill.




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


******

Leave a Reply