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दिन की बुझी शिराओं में, एक और उमर आई!

एक बार फिर से मैं आज अपने एक प्रिय कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत है शाम का, बचपन में हमने गीत पढ़े थे ग्रामीण परिवेश पर शाम के, जब गोधूलि वेला में बैल रास्ते में धूल उड़ाते हुए घर लौटते हैं|

यह शहरी परिवेश में शाम का गीत है, जब लोग अपने-अपने काम से लौटते हैं| लीजिए प्रस्तुत है यह नवगीत-

दिन अधमरा देखने
कितनी भीड़ उतर आई,
मुश्किल से साँवली सड़क की
देह नज़र आई ।

कल पर काम धकेल आज की
चिन्ता मुक्त हुई|
खुली हवाओं ने सँवार दी
तबियत छुइ-मुई|


दिन की बुझी शिराओं में
एक और उमर आई ।

फूट पड़े कहकहे,
चुटकुले बिखरे घुँघराले,
पाँव, पंख हो गए
थकन की ज़ंजीरों वाले|

गंध पसीने की पथ भर
बतियाती घर आई|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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इन दिलों में कौन सा दिल है !

आज अकबर इलाहाबादी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| लफ्जों की कारीगरी जो कविता/ग़ज़ल में होती है वह इसमें बाकायदा मौजूद है|
प्रस्तुत है यह ग़ज़ल-


कहाँ ले जाऊँ दिल, दोनों जहाँ में इसकी मुश्क़िल है ।
यहाँ परियों का मज़मा है, वहाँ हूरों की महफ़िल है ।

इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं,
हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है।

ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा,
मैं कहता रह गया ज़ालिम, मेरा दिल है, मेरा दिल है ।

जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर,
अरे तू कौन है, हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है ।

हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया,
लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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स्वतन्त्रता- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Freedom’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

स्वतंत्रता!

भय से मुक्ति ही वह स्वतंत्रता है
जिसकी मैं अपनी मातृभूमि के लिए मैं मांग करता हूँ!
युगों-युगों के उस भार से मुक्ति, जो आपके शीश को झुकाता है,
आपकी कमर तोड़ता है, आपकी आँखों को भविष्य की मांग दर्शाते संकेत
देखने में असफल बना देता है;
निद्रा के बंधनों से मुक्ति, जहां आप स्वयं को रात्रि की
निश्‍चलता के बंधनों को सौंप देते हो,
उस सितारे पर अविश्वास करते हुए, जो सत्य के साहसिक पथ और
प्रारब्ध की अराजकता से मुक्ति के बारे मे बताता है,
सभी नौकाएँ कमजोर होकर दिशाहीन अनिश्चित हवाओं के हवाले हो जाती हैं,
और ऐसे हाथ में पड़ जाती हैं जो सदा मृत्यु की तरह कठोर और ठंडे रहते हैं|
कठपुतलियों की दुनिया में रहने के अपमान से मुक्ति,
जहां सभी गतिविधियां मस्तिष्कहीन तारों के माध्यम से प्रारंभ होती हैं,
और फिर जड़बुद्धि आदतों के माध्यम से दोहराई जाती हैं,
जहां आकृतियाँ धैर्य और आज्ञाकारिता के साथ,
प्रदर्शन के स्वामी की प्रतीक्षा करते हैं,
कि वह उनको हिला-डुलाकर जीवन स्वांग प्रस्तुत करे|


-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Freedom

Freedom from fear is the freedom
I claim for you my motherland!
Freedom from the burden of the ages, bending your head,
breaking your back, blinding your eyes to the beckoning
call of the future;
Freedom from the shackles of slumber wherewith
you fasten yourself in night’s stillness,
mistrusting the star that speaks of truth’s adventurous paths;
freedom from the anarchy of destiny
whole sails are weakly yielded to the blind uncertain winds,
and the helm to a hand ever rigid and cold as death.
Freedom from the insult of dwelling in a puppet’s world,
where movements are started through brainless wires,
repeated through mindless habits,
where figures wait with patience and obedience for the
master of show,
to be stirred into a mimicry of life.



-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सपने, सुरीले सपने!

आज एक बार फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर करना चाहूँगा| ये गीत राजेश खन्ना जी और अमिताभ जी के कुशल अभिनय से युक्त फिल्म- आनंद से है, जो 1971 में रिलीज़ हुई थी| इस फिल्म में मुकेश जी का गाया एक और गीत- ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ भी अमर गीतों की श्रेणी में शामिल है|


इस गीत को लिखा है गुलज़ार जी ने लिखा है और संगीत दिया है सलिल चौधरी जी ने|


लीजिए प्रस्तुत है यह लाजवाब गीत-


मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने
सपने, सुरीले सपने,
कुछ हँसते, कुछ गम के
तेरी आँखों के साये चुराए रसीली यादों ने|

छोटी बातें, छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ी
भूले नहीं, बीती हुई एक छोटी घड़ी,
जनम-जनम से आँखे बिछाईं
तेरे लिए इन राहों में,
मैंने तेरे लिए ही सात..
.

भोले-भाले, भोले-भाले दिल को बहलाते रहे
तन्हाई में, तेरे ख्यालों को सजाते रहे,
कभी-कभी तो आवाज देकर
मुझको जगाया ख़्वाबों से,
मैंने तेरे लिए ही सात…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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घाट-घाट घूमे, निहारी सारी दुनिया!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर, छंदबद्ध हास्य कविता के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

एक प्रसिद्ध भजन है जिसे उन्होंने आधुनिक संदर्भों में अलग ढंग से प्रस्तुत किया|

लीजिए प्रस्तुत है यह कविता –

साधू, संत, फकीर, औलिया, दानवीर, भिखमंगे,
दो रोटी के लिए रात-दिन नाचें होकर नंगे|
घाट-घाट घूमे, निहारी सारी दुनिया,
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !


राजा, रंक, सेठ, सन्यासी, बूढ़े और नवासे,
सब कुर्सी के लिए फेंकते उल्टे-सीधे पासे|
द्रौपदी अकेली, जुआरी सारी दुनिया|
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !



कहीं न बुझती प्यास प्यार की, प्राण कंठ में अटके,
घर की गोरी क्लब में नाचे, पिया सड़क पर भटके|
शादीशुदा होके, कुँआरी सारी दुनिया|
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !



पंचतत्व की बीन सुरीली, मनवा एक सपेरा,
जब टेरा, पापी मनवा ने, राग स्वार्थ का टेरा|
संबंधी हैं साँप, पिटारी सारी दुनिया|
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चार किताबें पढ़कर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल है-

तन्हा तन्हा दुख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गाएँगे
जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनाएँगे।


यह गज़ल पहले भी शायद मैंने शेयर की है, आज इस गज़ल का एक शेर खास तौर पर याद आ रहा था-

बच्चों के छोटे हाथों को, चांद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढकर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे।


ऐसे ही खयाल आया कि आखिर कैसे हो जाते हैं, या हो गए हैं हम चार किताबें पढ़ने के बाद, पढ़-लिख लेने के बाद!

इस पर धर्मवीर भारती जी के गीत की पंक्तियां याद आती हैं-

सूनी सड़कों पर ये आवारा पांव,
माथे पर टूटे नक्षत्रों की छांव,
कब तक, आखिर कब तक!

चिंतित पेशानी पर अस्त-व्यस्त बाल,
पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण भूचाल,
कब तक आखिर कब तक!


और फिर लगे हाथ भारत भूषण जी के गीत की पंक्तियां याद आ रही हैं, जो शायद पहले भी शेयर की होंगी, लेकिन फिर उनको शेयर करने का मन हो रहा है-

चक्की पर गेंहू लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखड़ा,
क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई।

कंधे पर चढ़ अगली पीढ़ी, ज़िद करती है गुब्बारों की,
यत्नों से कई गुना ऊंची, डाली है लाल अनारों की,
हर भोर किरन पल भर बहला, काले कंबल में सुला गई।

लेखनी मिली थी गीतव्रता, प्रार्थना-पत्र लिखते बीती,
जर्जर उदासियों के कपड़े, थक गई हंसी सींती-सींती,
खंडित भी जाना पड़ा वहाँ, ज़िंदगी जहाँ भी बुला गई।


गीतों की जन्म-कुंडली में, संभावित थी यह अनहोनी,
मोमिया मूर्ति को पैदल ही, मरुथल की दोपहरी ढोनी,
खंडित भी जाना पड़ा वहाँ, ज़िंदगी जहाँ भी बुला गई!


बड़ा होने के बाद क्या-क्या झेलना पड़ता है इंसान को, और बच्चा कहता है मुझे तो ये चाहिए बस! और परिस्थिति जो भी हो, उसको वह वस्तु अक्सर मिल जाती है!

ये भी कहा जाता है कि जो आप पूरे मन से चाहोगे, वह आपको मिल जाएगा। उस परम पिता परमात्मा के सामने हम भी तो बच्चे ही हैं, और हाँ हमारा वह परम पिता, हमारी तरह मज़बूर भी नहीं है, अगर हमको पूरे मन से ऐसा मानना मंज़ूर हो!

खैर ज्यादा बड़ी बातें नहीं करूंगा, अंत में रमेश रंजक जी की ये पंक्तियां-

फैली है दूर तक परेशानी,
तिनके सा तिरता हूँ तो क्या है,
तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं!

मैं दूंगा भाग्य की लकीरों को,
रोशनी सवेरे की,
देखूंगा कितने दिन चलती है,
दुश्मनी अंधेरे की,


मकड़ी के जाले सी पेशानी,
साथ लिए फिरता हूँ तो क्या है,
टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं!


आखिर में यही दुआ है कि उम्र बढ़ते जाने के बावज़ूद, हमारे भीतर एक बच्चे जैसी आस्था, विश्वास और थोड़ी ज़िद भी बनी रहे!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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लंदन में शॉपिंग का एक और दिन!

दो वर्षों में किए गए लंदन प्रवास के जो अनुभव मैं शेयर कर रहा था, आज उसकी अंतिम कड़ी है, अर्थात अगस्त-सितंबर में डेढ़ माह के लंदन प्रवास से संबंधित यह अंतिम आलेख है, लीजिए इसको भी झेल लीजिए|

इस वर्ष के लंदन प्रवास का आज अंतिम रविवार था। यह तो निश्चित ही है कि विज़िट करने और कराने वालों में महिलाएं भी हों तो कुछ समय तो शॉपिंग को भी देना ही पड़ता है। वैसे एक-दो बार छिटपुट शॉपिंग पहले भी हो चुकी है, एक दिन तो ‘ओ-2’ में ही लंच और उसके बाद शॉपिंग की गई थी। ‘ओ-2’ जिसे लंदन का आधुनिकतम ईवेंट-प्लेस और शॉपिंग मॉल कह सकते हैं। उसके अलावा अपने घर के पास ही ‘कैनरी व्हार्फ’ स्टेशन के पास अत्याधुनिक मॉल हैं, वे शायद कुछ महंगे तो हैं, वहाँ से भी शॉपिंग की जा चुकी थी। और भी एक-दो विशाल मॉल्स में हम गए थे, जिनमें से एक तो ‘ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट’ स्टेशन के पास था, उसका ज़िक्र भी मैंने एक ब्लॉग-पोस्ट में किया है, वहाँ भी भारतीय सामान और भोजन के भरपूर विकल्प मौज़ूद थे।

आज शॉपिंग को निपटाने के लिए ‘वेस्टफील्ड’ मॉल, एक्ल्स्लूसिव शॉपिंग अभियान को संपन्न करने के लिए चुना गया। यह मॉल ‘स्ट्रैटफोर्ड स्टेशन’ के पास है, जो ‘डीएलआर’ और ‘जुबली लाइन’, दोनो में एक तरफ का अंतिम स्टेशन है, वैसे यहाँ नेशनल रेलवे और एक और लाइन का स्टेशन भी है, इस तरह भारतीय पैमानों से इसे जंक्शन तो कह ही सकते हैं।

हाँ तो शॉपिंग में तो मेरी भूमिका शून्य रहती है, मैं यह भी पसंद करता हूँ कि मैं एक स्थान पर बैठकर बाजार को देखता रहूं। खैर रेडीमेड कपड़ों की कुछ दुकानों में मैं गया, तीन-तीन मंज़िलों में और इतने क्षेत्र में फैली दुकानें, जितने में कुछ छोटे-मोटे मॉल पूरे आ जाते हैं। मॉल की विशालता देखकर मुझे ‘दुबई मॉल’ याद आ गया, हालांकि यह उतना बड़ा तो नहीं ही होगा लेकिन भव्यता में कहीं कम नहीं था।

वैसे मैं यह भी कह दूं कि हमारे भारतवर्ष में भी आज एक से एक सुंदर ‘मॉल’ मौज़ूद हैं। हर देश अपनी संस्कृति, विरासत, शिल्पकला आदि-आदि के साथ अपने बाजारों से भी दुनिया को आकर्षित करता है और मैं समझता हूँ कि बाजार की संस्कृति को भी हमने बहुत अच्छी तरह अपनाया है, और हम इस मामले में भी दुनिया को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

हाँ तो शॉपिंग के बारे में तो मुझे ज्यादा कुछ नहीं कहना है, जो खरीदारों को खरीदना था, उन्होंने खरीद लिया, मेरी स्थिति तो वही थी चचा गालिब के शब्दों में ‘बाज़ार से गुज़रा हूँ, खरीदार नहीं हूँ।

हाँ ये जरूर है कि अगर आप बाज़ार को जानते हैं तो आपको अधिकांश प्रमुख जगहों पर भारतीय भोजन का विकल्प भी मिल जाएगा। उस मॉल के ही, ‘फूड कोर्ट’ में हमने एक दुकान देखी जिसका नाम था ‘इंडि-गो’ और वहाँ भारतीय व्यंजनों के अनेक विकल्प दिख रहे थे, जिनमें समोसा चाट, पूरी आदि-आदि अनेक डिश शामिल थीं, शायद और भी दुकानें होंगी, लेकिन हमने वहाँ खाना नहीं खाया।

हम वहाँ से लौटकर अपने घर के पास वाले स्टेशन ‘कैनरी व्हार्फ’ आए और यहाँ बगल के मॉल में, जिस दुकान पर हमने खाना खाया उसका नाम था- ‘चाय की’ (chai Ki), यहाँ पर हमने सभी भारतीय डिश ऑर्डर कीं और वे बड़ी स्वादिष्ट भी थीं, जिनमें इडली, मलाबर पराठा, पनीर टिक्का आदि शामिल थे।

इसके बाद हम शायद इस पड़ाव की अंतिम आउटिंग के बाद अपने घर लौट आए, जो कुछ फोटो खींच पाया, उनको शेयर करने का प्रयास कर रहा हूँ। एक फोटो अंत में ASDA मार्केट का दाल दिया है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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इंग्लैंड का टॉवर ऑफ लंदन!

इस वर्ष का लंदन प्रवास भी अब संपन्न होने को है। वास्तव में यह अंतिम सप्ताहांत है लंदन में इस बार के डेरे का! इस क्रम में आज हम जहाँ घूमने गए वह था- ‘ टॉवर ऑफ लंदन’ जिसे विश्व धरोहरों अर्थात ‘वर्ल्ड हेरिटेज’ की श्रेणी में शामिल किया गया है। यह ‘टॉवर ब्रिज’ की बगल में ही है, जहाँ हम कई बार गए हैं और इसके अंदर से ‘टॉवर ब्रिज’ बहुत अच्छा दिखाई देता है। आज विशेष बात यह रही कि हमने ‘टॉवर ब्रिज’ को खुलते हुए भी देखा। मैं यह बात दोहरा दूं कि इंजीनियरिंग का बेमिसाल नमूना ‘टॉवर ब्रिज’ कुछ खास समयों पर खुल जाता है, अर्थात इसके बीच के भाग के दोनो हिस्से ऊपर उठ जाते हैं, जिससे ज्यादा ऊंचाई वाले शिप वहाँ से निकल सकते हैं।

खैर आज बात ‘ टॉवर ऑफ लंदन’ की कर रहे हैं, जैसा मैंने कहा कि ‘विश्व धरोहरों’ में शामिल यह विशाल किला इतिहास के अनेक स्वर्णिम और काले अध्यायों का गवाह रहा है। वहाँ पर जो लोग गाइड के रूप में बड़ा ही रोचक वर्णन इस ऐतिहासिक धरोहर का करते हैं, वे भी पूर्व-सैनिक होते हैं और उनसे इसके बारे में बहुत महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। यहाँ कितने ही राजा, रानियां सत्तारूढ़ रहे, कितने ही लोगों को यहाँ मृत्युदंड दिया गया आदि-आदि। वैसे इसका निर्माण सन 1078 में लॉर्ड विलियम ने कराया था।

हाँ पर सत्तारूढ़ रही रानियों, सम्राटों आदि के आकर्षक मुकुट, उनमें जड़े हीरे आदि, जिनमें भारत का कोहिनूर हीरा भी शामिल है, ये सब यहाँ प्रदर्शित सामग्री में शामिल थे, जिनको देखकर आंखें चकाचौंध होकर रह गईं। जहाँ अनेक ताज हीरों से जड़े और स्वर्ण-मंडित पोशाकें वहाँ सजी हैं वहीं खाने-पीने के बर्तन, विशाल थालियां, शराब के टब, यहाँ तक कि विशाल नमकदानियां आदि भी, सब सोने की बनी हुईं। दिक्कत ये है कि वहाँ उस भाग में फोटो खींचने की अनुमति नहीं है, बस जो आपने देखा है वह आपको ही मालूम है, कितना आप बता पाएंगे, यह आपकी क्षमता पर निर्भर है, लेकिन इतना कह सकते हैं कि बड़े से बड़ा पूंजीपति भी इतनी संपदा इकट्ठी नहीं कर सकता, और सोने के इतने भारी बर्तनों को उठाता कौन होगा! और हाँ शाही तलवारें भी तो रत्नजडित हैं।

इन महलों में जहाँ अपार ऐश्वर्य की झलक है, वहीं अत्याचार के धब्बे भी बहुत गहरे हैं, अनेक लोग, जिनमें सैनिक, पादरी और यहाँ तक कि राजकुमार और राजकुमारी भी शामिल रहे हैं, उनको यहाँ मृत्युदंड दिया गया और उनमें से अनेक के बारे में यह भी स्पष्ट नहीं है कि उनको क्यों मारा गया।

जो भी हो यह किला ब्रिटिश रॉयल्टी के गौरवशाली और अन्यथा वाली श्रेणी में आने वाले इतिहास की एक अच्छी-खासी झलक देता है। यहाँ मृत्युदंड को कार्यान्वित करने वाले एक जल्लाद के बारे में गाइड महोदय बता रहे थे कि वह ‘पार्ट टाइम एग्जीक्यूटर’ और फुल-टाइम शराबी था, शायद ऐसा काम करने वाले लोगों के लिए यह जरूरी भी हो जाता है।

वहाँ एक व्यक्ति कुछ अलग ही किस्म का वाद्य बजा रहा था, जो देखने में इकतारे जैसा था लेकिन वह उसको बजाने के लिए गोलाई में लीवर जैसा घुमा रहा था और उसकी आवाज बहुत ही मधुर आ रही थी। यह कलाकार भी काफी लोगों को आकर्षित कर रहा था। वैसे तो वहाँ दीवारों पर बनाए गए बंदर आदि भी लोगों को आकर्षित कर रहे थे।

यहाँ के रहस्यों में सात विशालकाय काले कौवे ‘रैवेन’ भी शामिल हैं, जिनके बारे में कभी कहा गया कि वे काम में बाधा डालते हैं, लेकिन फिर ये बताया गया कि जब तक वे रहेंगे तब तक ही ये परिसर और राजसत्ता भी सलामत रहेंगे। वैसे तो उनको मांस, चूहे आदि खिलाए जाते हैं, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि उनको इंसान की उंगलियां खाना बहुत अच्छा लगता है।

यह भी कहा जाता है कि यहाँ अतृप्त आत्माएं काफी घूमती रहती हैं, अब उनसे मिलने के लिए तो कभी रात में चोरी-छिपे यहाँ का दौरा करना होगा। वैसे हमने वहाँ शाही महल और शाही पलंग का भी नज़ारा लिया। यह एक ऐसा परिसर है जहाँ महल और कारागार दोनो थे, जहाँ ऐश्वर्य और नर्क की यातना दोनो ही भरपूर रही हैं।

इसके कुछ प्रमुख भाग हैं- क्राउन ज्वेल्स- जहाँ पूरी धन-संपदा प्रदर्शित है, व्हाइट टॉवर, ब्लडी टॉवर, ट्रेटर्स गेट, चैपल रॉयल आदि-आदि।

कहा तो बहुत कुछ जा सकता है, लेकिन अभी इतना ही कहूंगा कि आप लंदन आते हैं तो आपको यह ‘विश्व धरोहर’ का दर्जा प्राप्त परिसर भी अवश्य देखना चाहिए।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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क्लासिक बोट फेस्टिवल, लंदन!

लंदन प्रवास के इस वर्ष के अनुभवों के अंतर्गत आज मैं बात करूंगा ‘क्लासिक बोट-फेस्टिवल’ की, जिसे हम आज देखने गए और मैं आज इसी का अनुभव शेयर कर रहा हूँ।


सभी प्रमुख पर्यटन केंद्रों पर यह भी परंपरा होती है कि वे समय-समय पर ऐसे विभिन्न मेले, उत्सव आदि आयोजित करते रहते हैं जिससे पर्यटकों के उत्साह में कुछ अतिरिक्त उछाल आता है। मैं गोवा में ऐसे आयोजनों के बारे में तो जानता ही रहा हूँ। अभी लंदन में हूँ तो यहाँ आजकल ‘ऑटम फेस्टिवल’ भी आयोजित हो रहे हैं।


इसी क्रम में आज हम ‘सेंट केथरिन पायर’ पर गए, यहाँ 6 से 8 सितंबर तक ‘क्लासिक बोट फेस्टिवल-2019, का आयोजन किया गया है, जिसका आज अंतिम दिन था। यह स्थान टॉवर ब्रिज के बगल में है। एक बात और लंदन नगर क्योंकि थेम्स नदी के दोनों तरफ बसा है, और यहाँ नगर में अनेक नहरें इस मुख्य नदी से निकाली गई हैं। यहाँ पर अनेक आयोजन भी नदी और बोटिंग से जुड़े होते हैं।


अक्सर यहाँ इस प्रकार के आयोजन होते रहते हैं, एक तो विशाल शिप ‘कटी सार’ ग्रीनविच पर प्रदर्शनी के रूप में खड़ा हुआ है, जिसको देखने के लिए भारी संख्या में लोग आते हैं। इसके अलावा यहाँ अक्सर रंग-बिरंगी पालयुक्त नावें, ‘याच फेस्टिवल’ के आयोजन के रूप में निकलती रहती हैं। इसी प्रकार समय-समय पर बोटिंग के, कंपिटीशन, फेस्टिवल आदि भी आयोजित होते रहते हैं।

इसी क्रम में यह आयोजन विशेष महत्व का था, जिस प्रकार पुरानी विंटेज कारों की प्रदर्शनी बहुत से स्थानों पर होती रहती है, इसी प्रकार यह ‘क्लासिक बोट्स’ की प्रदर्शनी थी, जिसमें ऐसी पुराने समय की नावें लगाई गई थीं जिनकी ऐतिहासिक भूमिका रही है। कोई समय था जब नदियों और समुद्र में इन नावों का आधिपत्य रहता था, आज ये नावें अपने उन्नत इतिहास के बारे में बताने के लिए ‘सेंट केथरिन डॉक्स’ के सीमित क्षेत्र में सजी हुई खड़ी थीं, दर्शक इनके भीतर जाकर इनके प्रत्येक भाग को देख सकते थे।


जैसा कि होता है, इस बोट फेस्टिवल के एक अंग के रूप में अनेक आयोजन और गतिविधियां रखी गई थीं, जिनमें एक बैंड द्वारा गीत-संगीत की प्रस्तुति भी विशेष रूप से मोहने वाली थी, बाकी खाने-पीने के स्टॉल तो ऐसे में होते ही हैं।


इस प्रदर्शनी में एक अत्यंत सुंदर और सोने की नक्काशी से सजी नाव महारानी की भी थी, जिसे केवल बाहर से देखा जा सकता था। बाकी सभी ऐतिहासिक महत्व वाली नावों के भीतर जाकर हमने उनको देखा।


इस आकर्षक प्रदर्शनी का आनंद लेने के बाद हम वहाँ से ही नगर भ्रमण कराने वाले क्रूज़ में बैठकर ग्रीनविच तक गए और यहाँ भी नदी तट पर बने भवनों आदि के बारे में कमेंट्री के माध्यम से रोचक जानकारी प्राप्त की। यहीं हमें यह भी बताया गया कि नदी किनारे जहाँ नाव, क्रूज़ आदि रुकते हैं ऐसे अधिकांश स्थानों को ‘व्हार्फ’ कहा जाता है, उसका अर्थ है ‘वेयरहाउस एट रिवर फ्रंट’।


इस प्रकार ग्रीनविच पर विख्यात शिप ‘कटी सार’ को एक बार फिर से देखने के बाद हम वहाँ से ट्रेन पकड़कर अपने घर की ओर रवाना हो गए।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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एक बार फिर ओ-2 !

जैसा आप जानते हैं, इन दिनों मैं अगस्त-सितंबर 2019 में किए गए हमारे दूसरे लंदन प्रवास के अनुभव शेयर कर रहा हूँ| अब यह क्रम भी शीघ्र समाप्त होने वाला है और जल्दी ही मुझे अपने नियमित कार्यक्रम को फिर से अपनाना होगा| प्रस्तुत है आज का प्रसंग|

आज की हमारी मंज़िल थी- ओ-2, यह आप समझ लीजिए कि मार्केट-कम-ईवेंट ऑर्गेनाइज़ेशन प्लेस है। लंदन ओलंपिक्स के दौरान इसे बनाया गया था। हमारे घर से यहाँ आने के लिए थेम्स नदी के नीचे से ट्यूब रेल द्वारा एक अगले स्टेशन पर जाना होता है। इसको आप ऐसा समझ लीजिए कि एक ही छत के नीचे पूरा कनॉट-प्लेस है, बहुत सुंदर सज्जा के साथ, एक छत के नीचे ऐसे जैसे गुड़गांव में ‘किंगडम ऑफ ड्रीम्स’ है। हाँ छत को यहाँ आकाश का रूप नहीं दिया गया है।

यहाँ जैसे मुख्य बाज़ारों में होता है आपको सब कुछ मिल जाएगा, ब्रांडेड सामान, फैंसी सामान, मुझे तो वैसे खरीदारी का अनुभव नहीं है लेकिन यहाँ से मेरे बेटा-बहू ने हमारे लिए काफी कुछ खरीदा। यहाँ सिनमा हॉल तो हैं ही, ईवेंट भी होते रहते हैं, जैसे आज ही सुनिधि चौहान का कार्यक्रम शाम को हुआ होगा, हम तो खैर दिन में गए थे।

यहाँ खाने-पीने का भी पूरा एक बाज़ार है और हाँ उसमें दो-तीन दुकानें तो भारतीय भोजन भी प्रदान करती हैं। एक जिसमें हम गए, ‘जिमी’ज़ वर्ल्ड ग्रिल एंड बार’, बहुत शानदार रेस्टोरेंट था, ‘बार्बे क्यू नेशन’ की तरह, बफे सिस्टम वाला और यहाँ बहुत स्वादिष्ट भारतीय पकवानों की विशाल रेंज उपलब्ध थी, इतनी कि मैं वास्तव में ज्यादा खा गया, और फिर मीठे का तो मुझे विशेष शौक है, उसने भी भोजन की मात्रा बढ़ा दी। स्टॉफ में काफी लोग भारतीय और एशियाई थे।

विशेष रूप से रेस्टोरेंट में भारतीय झंडा भी लगा था और सजावट बहुत आकर्षक थी। मेरा बेटा बता रहा था कि काफी दिन से उसका यहाँ आने का विचार था, जो आज क्रियान्वित हो गया। जैसा मैंने बताया सुनिधि चौहान का भी आज वहाँ प्रोग्राम था।

खाने के बाद हम खरीदारी के लिए ऊपर गए और इस मार्केट-प्लेस का यह हिस्सा इस वर्ष ही चालू किया गया है, मार्केट को स्टूडियो की तरह सजाया गया है और यहाँ सफाई तो रहती ही है।

वापसी में ओ-2 मार्केट के बाहर ही ‘ऑटम फेस्टिवल’ के अंतर्गत स्टॉल लगे थे, उनको देखा। यहाँ की गर्मी तो हमारे लिए हल्की सर्दी जैसी होती है, ऑटम उससे कुछ ज्यादा और फिर सर्दी तो आखिर सर्दी ही है!


वैसे तो मैं ओ-2 मार्केट प्लेस में कई बार गया हूँ लेकिन आज का यहाँ का खाना और खरीदारी कुछ ज्यादा ही मजेदार थीं। जैसा इसका नाम है ‘ओ-2’ यह वास्तव जीवन में ऑक्सीजन की तरह है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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