घाट-घाट घूमे, निहारी सारी दुनिया!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर, छंदबद्ध हास्य कविता के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

एक प्रसिद्ध भजन है जिसे उन्होंने आधुनिक संदर्भों में अलग ढंग से प्रस्तुत किया|

लीजिए प्रस्तुत है यह कविता –

साधू, संत, फकीर, औलिया, दानवीर, भिखमंगे,
दो रोटी के लिए रात-दिन नाचें होकर नंगे|
घाट-घाट घूमे, निहारी सारी दुनिया,
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !


राजा, रंक, सेठ, सन्यासी, बूढ़े और नवासे,
सब कुर्सी के लिए फेंकते उल्टे-सीधे पासे|
द्रौपदी अकेली, जुआरी सारी दुनिया|
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !



कहीं न बुझती प्यास प्यार की, प्राण कंठ में अटके,
घर की गोरी क्लब में नाचे, पिया सड़क पर भटके|
शादीशुदा होके, कुँआरी सारी दुनिया|
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !



पंचतत्व की बीन सुरीली, मनवा एक सपेरा,
जब टेरा, पापी मनवा ने, राग स्वार्थ का टेरा|
संबंधी हैं साँप, पिटारी सारी दुनिया|
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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