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इंसान कहाँ तक पहुँचे!

हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी को ‘गीतों का राजकुंवर’ भी कहा जाता है और हमारी फिल्मों को भी उन्होंने अनेक यादगार गीत दिए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ उनका यह गीत-

हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे ।
होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे ।

इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे ।

वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी, न बिरहमन, न वो शेख,
वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुँचे ।

एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबाँ,
कल को शायद मेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचे ।


चाँद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख,
देखना ये है कि इंसान कहाँ तक पहुँचे ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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2 replies on “इंसान कहाँ तक पहुँचे!”

नीरज जी तो बेमिसाल थे। उनके हर गीत, कविता शानदार रही है। मेरे ब्लॉग पर भी एक बार जरूर पधारिए।

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