हम जहाँ हैं, वहीं से आगे बढ़ेंगे!

हिन्दी के एक प्रतिष्ठित नवगीतकार हैं श्री ओम प्रभाकर जी, जिन्होंने अनेक प्रसिद्ध रचनाएँ दी हैं| आज उनकी जो रचना मैं शेयर कर रहा हूँ, वह मानव जीवन में निरंतर चल रहे संघर्ष को अभिव्यक्त करती है|

एक संघर्ष तो व्यक्ति के जीवन में चलता है और एक पीढ़ी दर पीढ़ी भी चलता जाता है| मानव जाति का भी एक संघर्ष है, जो हर पीढ़ी को आगे बढ़ाना होता है| लीजिए इसी संदर्भ में इस रचना का आनंद लीजिए-


हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे,
देश के बंजर समय के
बाँझपन में,
याकि अपनी लालसाओं के
अंधेरे सघन वन में|


या अगर हैं
परिस्थितियों की तलहटी में,
तो वहीं से बादलों के रूप में
ऊपर उठेंगे,
हम जहाँ हैं वहीं से
आगे बढ़ेंगे|


यह हमारी नियति है
चलना पड़ेगा,
रात में दीपक
दिवस में सूर्य बन जलना पड़ेगा|

जो लड़ाई पूर्वजों ने छोड़ दी थी
हम लड़ेंगे,
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे|



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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