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दर्द भी सहे हैं होकर के मशहूर!

हिन्दी के एक प्रतिष्ठित और लोकप्रिय गीतकार हैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी मन के बहुत सुकोमल भावों को बहुत बारीकी से अभिव्यक्त कराते थे और कवि सम्मेलनों में बहुत लोकप्रिय थे|

जैसा कहते हैं, जीवन का नाम ही चलना है, हम एक जगह नहीं ठहर सकते, बहुत से दायित्व, वचन बद्धताएँ हमें निरंतर पुकारती रहती हैं| लीजिए इसी संदर्भ में इस रचना का आनंद लीजिए-

रोको मत जाने दो जाना है दूर|

वैसे तो जाने को मन ही होता नहीं,
लेकिन है कौन यहाँ जो कुछ खोता नहीं
तुमसे मिलने का मन तो है मैं क्या करूँ?
बोलो तुम कैसे कब तक मैं धीरज धरूँ ।
मुझसे मत पूछो मैं कितना मज़बूर ।

रोको मत जाने दो जाना है दूर|


अनगिन चिंताओं के साथ खड़ा हूँ यहाँ
पूछता नहीं कोई जाऊँगा मैं कहाँ ?
तन की क्या बात मन बेहद सैलानी है
कर नहीं पाता मन अपनी मनमानी है ।
दर्द भी सहे हैं होकर के मशहूर|

रोको मत जाने दो जाना है दूर|


अब नहीं कुछ भी पाने को मन करता
कभी-कभी जीवन भी मुझको अखरता|
साँस का ठिकाना क्या आए न आए
यह बात कौन किसे कैसे समझाए|
होना है जो भी वह होगा ज़रूर ।

रोको मत जाने दो जाना है दूर ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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