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कभी घर में सूरज उगा देर से – निदा फ़ाज़ली

एक बार फिर मैं अपने एक अति प्रिय शायर स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| निदा साहब बड़ी शिद्दत से भावों को महसूस करते थे और बड़ी कारीगरी से उन भावों को शेरों के माध्यम से व्यक्त करते थे|


लीजिए आज स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली इस रचना का आनंद लीजिए-


कहीं छत थी, दीवारो-दर थे कहीं,
मिला मुझको घर का पता देर से|
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे,
मगर जो दिया वो दिया देर से|

हुआ न कोई काम मामूल से,
गुजारे शबों-रोज़ कुछ इस तरह|
कभी चाँद चमका ग़लत वक़्त पर,
कभी घर में सूरज उगा देर से|


कभी रुक गये राह में बेसबब,
कभी वक़्त से पहले घिर आयी शब|
हुए बंद दरवाज़े खुल-खुल के सब,
जहाँ भी गया मैं, गया देर से|

ये सब इत्तिफ़ाक़ात का खेल है,
यही है जुदाई, यही मेल है|
मैं मुड़-मुड़ के देखा किया दूर तक,
बनी वो ख़मोशी, सदा देर से |


सजा दिन भी रौशन, हुई रात भी,
भरे जाम लगराई बरसात भी|
रहे साथ कुछ ऐसे हालात भी,
जो होना था जल्दी हुआ देर से|

भटकती रही यूँ ही हर बंदगी,
मिली न कहीं से कोई रौशनी|
छुपा था कहीं भीड़ में आदमी,
हुआ मुझमें रौशन ख़ुदा देर से|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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2 replies on “कभी घर में सूरज उगा देर से – निदा फ़ाज़ली”

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