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किस तरह कुल की बड़ाई काम दे!

आज मैं एक ऐसे कवि की रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिनको खड़ी बोली का प्रारंभिक महाकाव्य रचयिता माना जाता है| आज के रचनाकार हैं, स्वर्गीय अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी, जिन्होंने, खड़ी बोली में कविता के प्रारंभिक काल में अपना अमूल्य योगदान किया था| हरिऔध जी का जन्म 1865 मेँ हुआ था और भारत के स्वाधीन होने से पहले ही मार्च 1947 मेँ उनका देहांत हो गया था|

लीजिए प्रस्तुत है हरिऔध जी की यह रचना-

हैं जन्म लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता
रात में उन पर चमकता चाँद भी,
एक ही सी चाँदनी है डालता।

मेह उन पर है बरसता एक सा,
एक सी उन पर हवाएँ हैं बही
पर सदा ही यह दिखाता है हमें,
ढंग उनके एक से होते नहीं।


छेदकर काँटा किसी की उंगलियाँ,
फाड़ देता है किसी का वर वसन
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर,
भँवर का है भेद देता श्याम तन।

फूल लेकर तितलियों को गोद में
भँवर को अपना अनूठा रस पिला,
निज सुगन्धों और निराले ढंग से
है सदा देता कली का जी खिला।


है खटकता एक सबकी आँख में
दूसरा है सोहता सुर शीश पर,
किस तरह कुल की बड़ाई काम दे
जो किसी में हो बड़प्पन की कसर।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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2 replies on “किस तरह कुल की बड़ाई काम दे!”

मैं हरिऔध जी का प्रशंसक हूं। स्कूल के दिनों से उनके द्रुतविलंबित और मंदाक्रांता छंदों का प्रेमी रहा हूं। उनकी एक रचना मुझे आज भी याद है-
दिवस का अवसान समीप था
गगन था कुछ लोहित हो चला
तरु शिखा पर थी अब राजती
कमलिनी-कुल-वल्लभ की प्रभा
बहुत बहुत धन्यवाद आपको।

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