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अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे!

आज सोचता हूँ कि गुलाम अली जी की गाई एक और ग़ज़ल शेयर करूं| इस ग़ज़ल के लेखक हैं ज़नाब परवेज़ जालंधरी साहब|


इस ग़ज़ल में मानो एक चुनौती है, या कहें कि जो अपने आपको कुर्बान करने को तैयार हो, वही ‘तुमसे’ इश्क़ कर पाएगा, कहा गया है न, ‘शीश उतारे भुईं धरे, सो पैठे घर माहीं’| चुनौती तो बड़ी ज़बरदस्त है ना!


लीजिए प्रस्तुत है यह खूबसूरत ग़ज़ल-

जिनके होंठों पे हँसी पाँव में छाले होंगे
हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे|

मय बरसती है फ़ज़ाओं पे नशा तारीं है,
मेरे साक़ी ने कहीं जाम उछाले होंगे|

उनसे मफ़हूम-ए-ग़म-ए-ज़ीस्त अदा हो शायद,
अश्क़ जो दामन-ए-मिजग़ाँ ने सम्भाले होंगे|

शम्मा ले आये हैं हम जल्वागह-ए-जानाँ से,
अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे|

हम बड़े नाज़ से आये थे तेरी महफ़िल में,
क्या ख़बर थी लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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