चाँद निकला तो सो गईं आँखें!

नक़्श लायलपुरी साहब एक प्रमुख साहित्यकार और फिल्मी गीतकार रहे हैं, उनके अनेक गीत हम आज भी गुनगुनाते हैं, जैसे ‘मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा’, ‘कई सदियों से कई जन्मों से’ आदि-आदि|

आज उनकी एक सुंदर सी ग़ज़ल मैं शेयर कर रहा हूँ, जिसमें विभिन्न परिस्थितियों और मनः स्थितियों में आँखों की स्थिति को व्यक्त किया गया है-

तुझको सोचा तो खो गईं आँखें,
दिल का आईना हो गईं आँखें|

ख़त का पढ़ना भी हो गया मुश्किल,
सारा काग़ज़ भिगो गईं आँखें|

कितना गहरा है इश्क़ का दरिया,
उसकी तह में डुबो गईं आँखें|

कोई जुगनू नहीं तसव्वुर का,
कितनी वीरान हो गईं आँखें|

दो दिलों को नज़र के धागे से,
इक लड़ी में पिरो गईं आँखें|


रात कितनी उदास बैठी है,
चाँद निकला तो सो गईं आँखें|

‘नक़्श’ आबाद क्या हुए सपने,
और बरबाद हो गईं आँखें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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