मिट्टी को बादल में गूँथें, चाक चलाएँ!

स्वर्गीय निदा फ़ाजली साहब मेरे प्रिय शायर रहे हैं, उनकी अनेक रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज एक रचना उनकी शेयर कर रहा हूँ, जो बताती है कि जाति-धर्म के भेदभाव कितने बेमानी हैं| इस कविता में वह कहते हैं कि बच्चे बनकर आइए वही काम करें जो ऊपर वाला करता है, विभिन्न रूप और वेशभूषा के लोग बनाना और फिर उनको नए सांचे में ढाल देना|


लीजिए प्रस्तुत है, निदा फ़ाज़ली साहब की यह सुंदर रचना-

आओ
कहीं से थोड़ी सी मिट्टी भर लाएँ,
मिट्टी को बादल में गूँथें
चाक चलाएँ,
नए-नए आकार बनाएँ|

किसी के सर पे चुटिया रख दें
माथे ऊपर तिलक सजाएँ,
किसी के छोटे से चेहरे पर
मोटी सी दाढ़ी फैलाएँ|

कुछ दिन इनसे जी बहलाएँ,
और यह जब मैले हो जाएँ,


दाढ़ी चोटी तिलक सभी को,
तोड़-फोड़ के गड़-मड़ कर दें|
मिली हुई यह मिट्टी फिर से
अलग-अलग साँचों में भर दें,

– चाक चलाएँ
नए-नए आकार बनाएँ|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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