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मौत मुसाफ़िरखाना है!

एक विषय दिया गया है, #IndiSpire के मंच पर, The end is often the beginning #Life वहाँ पर प्रविष्टि सामान्यतः अंग्रेजी में दी जाती है, परंतु मुझे लगा कि इस विषय पर लिखते हुए भारतीय दर्शन की जो बातें मेरे मन में आ सकती हैं, वे सभी हिन्दी में हैं और मैं हिन्दी और अंग्रेजी के बीच में फँसकर रह जाऊंगा, इसलिए मैं वहाँ प्रविष्टि न देकर, अलग से आलेख लिख रहा हूँ|


हाँ विषय कुल मिलाकर यह है कि- अंत ही सामान्यतः एक नई शुरूआत होती है, अब यह किसी अभियान अथवा व्यवसाय के किसी पक्ष, किसी पड़ाव से लेकर हमारे जीवन तक पर लागू हो सकता है|

मुझे कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं, शायद रमानाथ अवस्थी जी की पंक्तियाँ हैं ये-


मिलना तो मन का होता है,
तन तो सिर्फ बहाना है|
जीवन के बेरोक सफर में,
मौत मुसाफ़िरखाना है|


फिर नीरज जी की पंक्तियाँ याद आती हैं-

न जन्म कुछ, न मृत्यु कुछ,
बस इतनी सी ही तो बात है|
किसी की आँख खुल गई,
किसी को नींद आ गई
|


एक विचार और आता है, अक्सर हम देखते हैं लोग अपना पुश्तैनी व्यवसाय अपनाते जाते हैं, जो पिता करते थे, वही बेटा करता है, बड़ों के अनुभव का फायदा उठाते हुए ठीक-ठाक सा काम करते हुए वे अपना जीवन बिता देते हैं| अक्सर जब कोई ढर्रे पर चलते हुए सफल नहीं हो पाता और इसे चुनौती मानते हुए नई राह चुनता है, तब यदि वह सफल होता है, तो ऐसा भी होता है कि वह चमत्कार भी कर देता है| एक बंधी हुई लीक पर चलते हुए यह चमत्कार संभव नहीं होता|


कविता के क्षेत्र में अज्ञेय जी ने इसी को राहों का अन्वेषी होना कहा था| अक्सर एक यात्रा समाप्त करने के बाद मनुष्य नई राह, नई चुनौती चुनता है, तभी वह ऐसी उपलब्धि कर पाता है|

इस प्रकार हर समय नई चुनौतियों को स्वीकार करने की तैयारी, नई पहल करना और यदि ऐसा समय आता है तो मृत्य का भी हँसते-हँसते वरण करना और नई जीवन-यात्रा के लिए तैयार रहना भी शामिल हो सकता है|

अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि वास्तव में अधिकतर अंत ही प्रारंभ होता है, वह जीवन का कोई अभियान हो अथवा स्वयं जीवन ही हो| अतः हमेशा नई पहल के लिए तैयार रहना, नई चुनौतियों को स्वीकार करना ही वास्तव में जीवंतता का प्रमाण है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 replies on “मौत मुसाफ़िरखाना है!”

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