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मेरा बदन हो गया पत्थर का!

स्वर्गीय रमेश रंजक जी मेरे प्रिय कवि रहे हैं, उनका स्नेह भी मिला मुझे और एक विशेषता थी उनमें कि यदि अच्छी रचना उनके शत्रु की भी हो तो उसकी तारीफ़ अवश्य करते थे| कम शब्दों में कैसे बड़ी बात कही जाए, यह उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है|

आज मैं रंजक जी का यह नवगीत शेयर कर रहा हूँ-



मेरा बदन हो गया पत्थर का|

‘सोनजुही-से’ हाथ तुम्हारे
लकड़ी के हो गये,
हारे दिन फीके हो गये,
नक्शा बदल गया सारे घर का|

भिड़ने लगे जोर से दरवाज़े,
छत, आँगन, दालान
सभी लगते आधे-आधे,
ख़ारीपन भर गया समुन्दर का|

सिमट गयी हैं कछुए-सी बातें,
दिन में दो दिन हुए
रात में चार-चार रातें,
तेवर बदला अक्षर-अक्षर का|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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