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अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़!

स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी बातचीत के लहजे में कविता लिखने के लिए प्रसिद्ध थे| उनके एक संकलन का नाम था ‘बुनी हुई रस्सी’, जिसका आशय है की वे कविता में रस्सी जैसी बुनावट की अपेक्षा रकहते थे| अपने मुंबई जाने के अनुभव को लेकर उन्होंने एक रचना लिखी थी- ‘जी हाँ हुज़ूर, मैं गीत बेचता हूँ’ और संकलन का नाम भी ‘गीत फ़रोश’ रखा था|


आज की रचना में भवानी दादा ने बहुत सहज अंदाज़ में भाईचारे का संदेश दिया है-

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,
हाट से लौटे, ठाठ से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे ।

बात बात में बात ठन गई,
बांह उठी और मूछ तन गई,
इसने उसकी गर्दन भींची
उसने इसकी दाढ़ी खींची ।

अब वह जीता, अब यह जीता
दोनों का बन चला फजीता;
लोग तमाशाई जो ठहरे —
सबके खिले हुए थे चेहरे !


मगर एक कोई था फक्कड़,
मन का राजम कर्रा-कक्कड़;
बढ़ा भीड़ को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड़ कर ।

अक्कड़ मक्कड़ धूल में धक्कड़
दोनों मूरख दोनों अक्कड़,
गर्जन गूंजी, रुकना पड़ा,
सही बात पर झुकना पड़ा !

उसने कहा, सही वाणी में
डूबो चुल्लू-भर पानी में;
ताकत लड़ने में मत खोओ
चलो भाई-चारे को बोओ !

खाली सब मैदान पड़ा है
आफत का शैतान खड़ा है
ताकत ऐसे ही मत खोओ;
चलो भाई-चारे को बोओ !


सुनी मूर्खों ने जब बानी,
दोनों जैसे पानी-पानी;
लड़ना छोड़ा अलग हट गए,
लोग शर्म से गले, छंट गए ।

सबको नाहक लड़ना अखरा,
ताकत भूल गई सब नखरा;
गले मिले तब अक्कड़ मक्कड़
ख़त्म हो गया धूल में धक्कड़ !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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4 replies on “अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़!”

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