काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी!

कल मैंने अपने एक संस्मरण में, एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से अन्य लोगों के साथ स्वर्गीय कुमार शिव जी को भी याद किया था और उनके एक-दो गीतों का उल्लेख किया था| आज उनको श्रद्धांजलि स्वरूप उनका एक पूरा गीत यहाँ दे रहा हूँ| इस गीत में उन्होंने अपनी खुद्दारी की प्रभावी अभिव्यक्ति की है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह गीत –

काले कपड़े पहने हुए
सुबह देखी
देखी हमने अपनी
सालगिरह देखी !

हमको सम्मानित होने का
चाव रहा,
यश की मंडी में पर मंदा
भाव रहा|
हमने चाहा हम भी बनें
विशिष्ट यहाँ,
किन्तु हमेशा व्यर्थ हमारा
दाँव रहा|
किया काँच को काला
सूर्यग्रहण देखा,
और धूप भी हमने
इसी तरह देखी !


हाथ नहीं जोड़े हमने
और नहीं झुके,
पाँव किसी की अगवानी में
नहीं रुके|
इसीलिए जो बैसाखियाँ
लिए निकले,
वो भी हमको मीलों पीछे
छोड़ चुके|
वो पहुँचे यश की
कच्ची मीनारों पर,
स्वाभिमान की हमने
सख़्त सतह देखी !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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