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बीती विभावरी जाग री!

दो दिन पहले ही मैंने छायावाद युग के एक स्तंभ रहे स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक रचना शेयर की थी| आज इसी युग के एक और महाकवि जयशंकर प्रसाद जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी को उनके महाकाव्य- ‘कामायनी’ के लिए विशेष रूप से जाना जाता है|


आज की इस रचना में सुबह होने का वर्णन उन्होंने किस तरीके से किया है, इसका आनंद लीजिए-



बीती विभावरी जाग री!

अंबर पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा नागरी!

खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर ला‌ई-
मधु मुकुल नवल रस गागरी|

अधरों में राग अमंद पिए,
अलकों में मलयज बंद किए,
तू अब तक सो‌ई है आली,
आँखों में भरे विहाग री!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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