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Golden Bloggerz Award

I have been nominated for Golden Bloggerz Award by my fellow blogger Priya Ji, who writes very interesting and thought provoking blog posts, by the name ‘Priya’s Learning Centre’. She is a nice human being, a true friend and a creative blogger. Her blog posts are quite useful and inspiring. (https://priyaslearningcentre.com)


What is the Golden Bloggerz Award?


The Golden Bloggerz Award was created by Chris Kosto to motivate and reward all the amazing bloggers who work hard every day to serve their audiences and deserve some recognition.


The Rules


1. Place the award logo on your blog.
2. Mention the rules.
3. Mention the award creator and link to their blog.
4. Thank whoever nominated you and link to their blog.
5. Tell your audience three things about you.
6. Answer your nominator’s questions.
7. Nominate 10 people who deserve this award.
8. Ask the nominees 5 questions of your choice.
9. Let the nominees know of their nomination by commenting on their social media or blog.
10. Share links to 2-3 of your best/favorite posts.

Three Things About Me:


1. I always try to remain a good human being.
2. I wish I could be a good contributor for the society and people remember me with love after I leave.
3. I Love music, Raj Kapur films, old film music, ghazals and especially old songs, the golden voice of Mukesh above all.


My answers to questions by Priya Ji : Questions-


Q1. What’s your focus in life right now?

Ans. To live happily in this grave environment of Pandemic and see that it doesn’t do much harm to my nears and dears.

Q2. What kept you going during the lockdown ?

Ans. I am a person retired 10 yrs. back so in a way under lock down since long, we watched some long serials of the past in full Like one regarding Mahadev and several telefilms. Spent lot of time on internet.

Q3. What do you appreciate about your life ?

Ans. It has been smooth, no great achievements, got love and appreciation from so many people, since I was conducting programs for big audience. Enjoyed life as it has been.

Q.4. What was your first blog post about ?

Ans. I wrote many of my initial blog posts regarding the journey of my life from the beginning, study time, joining various services, my poetic efforts and how life kept teaching me in various ways.

Q5. Do you think the current education system fully prepares children for the needs of 21st century?

Ans. I am not at all a teacher nor a preacher. I think there is always scope for improvement and the governments takes various steps for improvement based on the advice of the experts in the field, from time to time.

Nomination-

Now is the step I always skip. I never find it easy to choose a few fellow bloggers for nomination. I feel that all my friends deserve the nomination. I nominate all bloggers, who follow my blog posts to take this as nomination from my side.

My Questions-

Yes, I would like to repeat some question that I have seen here by my previous nominators, and those who take up this challenge of carrying it forward can answer these questions-


Q1: What is it about life that you would share from your experience to keep others motivated and going ?


Q2: What inspires you to write blog posts?


Q3: What do you appreciate about your life?


Q4: Do you believe in your inner strength to be the change you want to see?


Q5. What were your initial blog posts about?



Favorite Posts from My Blog:

Not easy for me to choose my favorite blog post and find it out, I think the initial blog posts regarding the journey of my life were the best, but I just picked 3 posts for sharing.

https://samaysakshi.in/blog/2021/02/19
https://samaysakshi.in/blog/2021/04/10/
https://samaysakshi.in/blog/2020/12/20


I once again thank Priya Ji for nominating me for this prestigious award and hope my fellow bloggers would take this nomination from side and carry forward the baton.

Thanks for reading and welcome to take it forward.

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दीपक जलता रहा रात भर!

आज हिन्दी काव्य मंचों के एक अत्यंत लोकप्रिय गीतकार रहे स्वर्गीय गोपाल सिंह ‘नेपाली’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी प्रेम और ओज दोनों प्रकार के गीतों के लिए जाने जाते थे|

लीजिए प्रस्तुत है नेपाली जी यह गीत-

तन का दिया, प्राण की बाती,
दीपक जलता रहा रात-भर ।

दु:ख की घनी बनी अँधियारी,
सुख के टिमटिम दूर सितारे,
उठती रही पीर की बदली,
मन के पंछी उड़-उड़ हारे ।

बची रही प्रिय की आँखों से,
मेरी कुटिया एक किनारे,
मिलता रहा स्नेह रस थोड़ा,
दीपक जलता रहा रात-भर ।

दुनिया देखी भी अनदेखी,
नगर न जाना, डगर न जानी;
रंग देखा, रूप न देखा,
केवल बोली ही पहचानी,

कोई भी तो साथ नहीं था,
साथी था ऑंखों का पानी,
सूनी डगर सितारे टिमटिम,
पंथी चलता रहा रात-भर ।

अगणित तारों के प्रकाश में,
मैं अपने पथ पर चलता था,
मैंने देखा, गगन-गली में,
चाँद-सितारों को छलता था ।

आँधी में, तूफ़ानों में भी,
प्राण-दीप मेरा जलता था,
कोई छली खेल में मेरी,
दिशा बदलता रहा रात-भर ।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                            ********






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कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं!

दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यिक कवि थे और आपात्काल के दौरान जब उन्होंने एक के बाद एक विद्रोह के स्वरों को गुंजाने वाली ग़ज़लें लिखीं, तब वे जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए| मुझे याद है उस समय कमलेश्वर जी साहित्यिक पत्रिका – ‘सारिका’ में निरंतर ये ग़ज़लें प्रकाशित करते थे और बाद में इनको ‘साये में धूप’ नामक संकलन में सम्मिलित किया गया|


लीजिए प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी की यह ग़ज़ल-

पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं,
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं|

इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो,
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं|

बूँद टपकी थी मगर वो बूँदो—बारिश और है,
ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं|

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है,
पत्थरों में चीख़ हर्गिज़ कारगर होगी नहीं|


आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिये जायेंगे पर,
आपकी ताज़ीम में कोई कसर होगी नहीं|

सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की अस्लियत,
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मन का बुझा दीपक नहीं जलता!

ऐसे बहुत से लोग होते हैं जिनको अतीत में रहना बहुत अच्छा लगता है और अक्सर वे वर्तमान का सामना करने से बचने के लिए भी अतीत में डेरा डाल लेते हैं, क्योंकि वहाँ वे अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं|

मेरे साथ ऐसा तो नहीं है, परंतु चाहे वह कविता की बात हो या फिल्मों की, मुझे अतीत की कृतियों से जुड़ने में बहुत आसानी लगती है| आज जो सृजन हो रहा है, उसके बारे में भविष्य में लोग बात करेंगे, या शायद आज भी करते होंगे, जैसे साहिर जी ने कहा है- ‘कल और आएंगे, नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले, मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले!

खैर अब ज्यादा लंबा न खींचते हुए मैं कह सकता हूँ, कि मैं ‘अपने ज़माने के एक कवि’ की कविता शेयर कर रहा हूँ, जो मंचों पर धूम मचाते थे, ये थे स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी| उनके एक गीत की पंक्तियाँ मुझे अक्सर याद आती हैं- ‘एक पुराने दुख ने पूछा, क्या तुम अभी वहीं रहते हो, उत्तर दिया चले मत आना, मैंने वो घर बदल लिया है’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी की यह रचना-

न दे पाओ अगर तुम साथ,मेरी राह मत रोको
बिना श्रम के कभी विश्राम का पौधा नहीं फलता,
यहाँ तुम प्यार की बातें न छेड़ो,मन बहकता है
न कोई भी सुमन देखो,यहाँ सब दिन महकता है|
यहाँ पर तृप्ति ने कब किस अधर की प्यास चूमी है
उमर लेकर मुझे अब तक हजारों घाट घूमी है|
भले ही साथ मत रहना,थकन की बात मत कहना
न दो वरदान चलने का,गलत संकेत मत देना,
कभी पतझार के मारे कुसुम खिल भी निकलते हैं
मगर संकेत के मारे पथिक को घर नहीं मिलता|
बिना श्रम के कभी विश्राम का पौधा नहीं फलता
|
न दे पाओ अगर तुम साथ...

मुझे है चाव चलने का डगर फिर मात क्या देगी
गगन के बादलों की छाँव मेरा साथ क्या देगी,
अधिक ठहरो जहां,स्वागत वहां सच्चा नहीं होता
बहुत रुकना पराये गाँव मे अच्छा नहीं होता|
भले गति-दान मत देना,नई हर ठान मत देना
जो मन छोटा करे मेरा,मुझे वो गान मत देना|
बुझे दीपक समय पर फिर कभी जल भी निकलते हैं
मगर मन का बुझा दीपक कभी आगे नहीं जलता|
बिना श्रम के कभी विश्राम का पौधा नहीं फलता|
न दे पाओ अगर तुम साथ…


जनम के वक्ष पर ऐसी लगी कोई चोट गहरी है
लगन की अब सफलता के चरण पर आँख ठहरी है,
यहाँ भटकी हुई हर ज़िन्दगी ही दाब खाती है
क्षमा केवल यहाँ अपराध के सिक्के कमाती है|
चुभन से मेल है मेरा,डगर के शूल मत बीनो
हवन तो खेल है मेरा,हटो विश्वास मत छीनो|
चरण हारे हुए तो फिर कभी चल भी निकलते हैं
मगर हारा हुआ साथी कभी आगे नहीं चलता|
बिना श्रम के कभी विश्राम का पौधा नहीं फलता|
न दे पाओ अगर तुम साथ…

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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पेलोलिम- गोवा की एक खूबसूरत ‘बीच’!

गोवा में रहते हुए कई वर्ष बीत चले, जब लोग यहाँ बाहर से घूमने के लिए आते हैं, तब उनका लक्ष्य होता है कि सीमित समय में जितना हो सकता है, उतना गोवा देख लें| मुख्य आकर्षण तो यहाँ के समुद्र-तट, यहाँ की खूबसूरत ‘बीच’ ही हैं, कुछ पुराने चर्च, फोर्ट आदि हैं, जहां फिल्मों की शूटिंग भी होती रहती है|

जैसा मैंने पहले भी बताया है, मेरे घर के सामने ही ‘मीरामार बीच’ का इलाका है, बॉल्कनी से ही ‘बीच’ दिखाई देती है और वहाँ जाने के लिए बस सड़क पार करनी होती है, बाईं तरफ बढ़ जाओ तो ‘दोना पावला व्यू पाइंट’, जिसे ‘लवर्स पाइंट’ भी बोलते हैं और दाहिनी तरफ जाने पर ‘मीरामार बीच’| मेरी शाम की सैर ‘बीच’ के साथ-साथ ही होती है| बहुत अच्छा लगता है जब लोगों को अपनी फोटो में शाम के डूबते सूरज को ‘ट्रिक’ से अपनी मुट्ठी में कैद करने अथवा हथेली पर रखने का उपक्रम करते देखता हूँ, और फोन पर उत्साह से यह बताते हुए सुनता हूँ, ‘मैं अभी मीरामार बीच पर हूँ’|

खैर क्योंकि अब गोवा में ही हूँ, इसलिए कोई जल्दी नहीं रहती सभी जगहों को देखने का टार्गेट पूरा करने की| क्योंकि पणजी में ही हूँ, तो यहाँ का चर्च, बाज़ार, कला अकादमी आदि तो देखते ही रहते हैं| आधा गोवा तो हमने परिवार के साथ बाहर ‘डिनर’ करने के क्रम में देख लिया है| बच्चों को इस बात की जानकारी रहती है कि आजकल कहाँ अच्छा खाना और सर्विस मिलती है|

अब मैं आज के इस आलेख के मुख्य विषय पर आता हूँ| जैसे मीरामर, केलेंगुट, वाघा आदि बहुत सी बीच तो हम गाड़ी में घूमते हुए पहले ही देख आए हैं| पिछले माह हम उत्तरी गोवा में ‘आरंबोल’ बीच गए थे, जो बहुत खूबसूरत बीच मानी जाती है, वहाँ हमने दो दिन का प्रवास किया था और वह बहुत अच्छा अनुभव रहा था|

इस बार हमारा प्रोग्राम बना दक्षिणी गोवा में ‘पेलोलिम’ बीच जाने का, जिसके बारे में मेरे बेटे ने बताया कि यह गोवा की सबसे खूबसूरत ‘बीच’ है| मैं यह भी बता दूँ कि हम गोवा में पिछले 3-4 वर्ष से हैं लेकिन मेरे बेटे यहाँ आने से पहले ही गोवा को खंगाल चुके थे|

हाँ तो, ‘पेलोलिम’ बीच के बगल में ही रुकने के लिए ‘आर्ट रिज़ॉर्ट’ है जिसमें बहुत खूबसूरत तरीके से समुद्र के किनारे ही ‘कॉटेज’ बनाए गए हैं और पेंटिंग्स का डिस्प्ले आदि, सभी कुछ अत्यंत सुरुचिपूर्ण है|

इन स्थानों की प्राकृतिक सुंदरता तो देखने और अनुभव करने के लिए ही होती हैं, मैं इनका वर्णन क्या कर पाऊँगा, लोगों ने यहाँ समुद्र में बैठक करने का खूब आनंद लिया और बोटिंग के लिए आसपास के कुछ स्थलों को भी देखा, जिनमें ‘बटरफ्लाई बीच’, ‘हनीमून बीच’ आदि शामिल हैं| एक अनुभव जो अब तक नहीं हो पाया था, वह है बोटिंग के दौरान ‘डॉल्फ़िंस’ को देखने का, इससे पहले कई स्थानों पर हम गए थे, परंतु नहीं देख पाए थे, यहाँ उनको भी देख लिया, यद्यपि उनके शरीर का कुछ भाग ही पानी से बाहर निकलते हुए देखा, परंतु अनेक बार देखा| ऐसा लगता है कि ‘डॉल्फ़िंस’ के कुछ परिवार उस क्षेत्र में थे|



कुल मिलाकर ‘पेलोलिम’ बीच पर दो दिन का यह प्रवास बहुत अच्छा अनुभव रहा और गोवा ‘विजिट’ पर आने वाले साथी इसको भी अपने गंतव्य स्थलों में शामिल कर सकते हैं और चाहें तो कुछ दिन यहाँ बिता सकते हैं|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अणु-अणु का कंपन जान चली!

मैंने छायावाद युग के कीर्तिस्तंभ रहे महाकवियों पंत, प्रसाद और निराला जी की एक-एक रचना शेयर करते हुए उस युग की एक झलक दिखाने का प्रयास किया था| बाद में मुझे खयाल आया कि महादेवी जी को शामिल किए बिना तो छायावाद युग की एक झलक देना भी संभव नहीं है| फिर जैसे मैंने निराला जी की उदारता और फक्कड़पन का उल्लेख किया था, उनको इस फक्कड़पन के बावजूद संभाले रखने में भी महादेवी जी का बहुत बड़ा हाथ है| उनके बीच जैसा स्नेह था, वैसा आज के कवियों के बीच कम ही देखने को मिलता है|
महादेवी जी की आज की इस रचना में उन्होंने जीवन के सभी पक्षों के आस्वादन के अनुभव का बहुत सुंदर वर्णन किया है –



अलि, मैं कण-कण को जान चली
सबका क्रन्दन पहचान चली|

जो दृग में हीरक-जल भरते
जो चितवन इन्द्रधनुष करते,
टूटे सपनों के मनकों से
जो सूखे अधरों पर झरते|


जिस मुक्ताहल में मेघ भरे
जो तारों के तृण में उतरे,
मैं नभ के रज के रस-विष के
आँसू के सब रंग जान चली।

जिसका मीठा-तीखा दंशन,
अंगों मे भरता सुख-सिहरन,
जो पग में चुभकर, कर देता
जर्जर मानस, चिर आहत मन;


जो मृदु फूलों के स्पंदन से
जो पैना एकाकीपन से,
मैं उपवन निर्जन पथ के हर
कंटक का मृदु मत जान चली।

गति का दे चिर वरदान चली।
जो जल में विद्युत-प्यास भरा
जो आतप में जल-जल निखरा,
जो झरते फूलो पर देता
निज चंदन-सी ममता बिखरा;


जो आँसू में धुल-धुल उजला;
जो निष्ठुर चरणों का कुचला,
मैं मरु उर्वर में कसक भरे
अणु-अणु का कंपन जान चली,
प्रति पग को कर लयवान चली।

नभ मेरा सपना स्वर्ण रजत
जग संगी अपना चिर विस्मित
यह शूल-फूल कर चिर नूतन
पथ, मेरी साधों से निर्मित,


इन आँखों के रस से गीली
रज भी है दिल से गर्वीली
मैं सुख से चंचल दुख-बोझिल
क्षण-क्षण का जीवन जान चली!
मिटने को कर निर्माण चली!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जब हम दोनो ज़ुदा हुए


आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|


आज फिर से अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

हम दोनो जब ज़ुदा हुए
खामोशी और आंसुओं के बीच,
टूटे हुए दिल के साथ,
बरसों तक दूर रहने के लिए,
तुम्हारे गाल पीले और ठंडे हो गए थे,
तुम्हारा चुंबन भी बहुत ठंडा हो गया था,
बेशक वह घड़ी जाहिर कर रही थी
इसके लिए अफसोस।


सुबह की ओस
मेरी भौंह पर जम गई-
मुझे लगा जैसे उस भवितव्य की चेतावनी दे रही हो
जो मुझे अब महसूस हो रहा है।
तुम्हारी कसमें सभी टूट चुकी हैं,
और प्रकाश की तरह तुम्हारी ख्याति है,
मैं सुनता हूँ लोगों को तुम्हारा नाम पुकारते,
और उसकी शर्म में डूब जाता हूँ।


वे मेरे सामने तुम्हारा नाम लेते हैं,
जिसकी गूंज मुझे झकझोर जाती है,
मुझे कंपकंपी सी आ जाती है-
तुम इतनी प्यारी क्यों थीं?
वे नहीं जानते हमारे संबंध के बारे में,
तुमको इतनी अच्छी तरह कौन जानता था-
मैं बहुत लंबे समय तक तुम्हारे लिए पछताता रहूंगा,
इतनी गहराई से कि मैं कह नहीं सकता।


हम गुप्त रूप से मिले-
और खामोशी में हम दुखी होते हैं,
कि तुम्हारा दिल भूल जाए,
तुम्हारी आत्मा धोखा न दे दे,
अगर मैं तुम्हें फिर से मिलूं
बहुत बरसों। के बाद,
तो किस तरह मैं तुम्हारा स्वागत करूंगा?-
खामोशी और आंसुओं के साथ।


– लॉर्ड बॉयरन

और अब मूल अंग्रेजी कविता-

When We Two Parted

When we two parted
In silence and tears,
Half broken-hearted,
To sever for years,
Pale grew thy cheek and cold,
Colder thy kiss;
Truly that hour foretold
Sorrow to this.


The dew of the morning
Sank chill on my brow—
It felt like the warning
Of what I feel now.
Thy vows are all broken,
And light is thy fame:
I hear thy name spoken,
And share in its shame.


They name thee before me,
A knell to mine ear;
A shudder comes o’er me—
Why wert thou so dear?
They know not I knew thee,
Who knew thee too well:—
Long, long shall I rue thee
Too deeply to tell.


In secret we met—
In silence I grieve
That thy heart could forget,
Thy spirit deceive.
If I should meet thee
After long years,
How should I greet thee?—
With silence and tears.


– Lord Byron


नमस्कार।
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गीत ऋषि- देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’

आज के समय में काव्य-लेखन को साधना का नाम देने का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता| आज अधिकांश लोग लिखना शुरू करते हैं तो उनके सामने एक लक्ष्य होता है, वह मंच हो या किसी अन्य प्रकार से प्रकाशन-प्रसारण आदि के माध्यम से कमाई और ख्याति अर्जित करना|

इन परिस्थितियों में स्वर्गीय देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ जी जैसे लोग आज की दुनिया में लगभग नहीं के बराबर हैं| मेरे साहित्यिक मित्र श्री योगेंद्र दत्त शर्मा के, फेसबुक में लिखे गए आलेख के माध्यम से ज्ञात हुआ कि श्री देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ जी नहीं रहे, जीवन है तो मृत्यु भी इससे जुड़ी एक सच्चाई है, परंतु यह समाचार सुनकर कुछ पुरानी यादें उमड़ आईं, इस बहाने से आज मैं कविता और विशेष रूप से नवगीत को समर्पित इस महान व्यक्तित्व का स्मरण करना चाहूँगा, जिन्होंने आज भी काव्य-लेखन को एक साधना का रूप दिया हुआ था|

एक बात और बताना चाहूँगा, मेरा विवाह भी इंद्र जी ने अपनी रिश्तेदारी में करा दिया था और इस प्रकार हम रिश्तेदार भी थे, परंतु इंद्र जी का रिश्तों की औपचारिकता में बिल्कुल विश्वास नहीं था, वे बोलते थे- ‘रिश्ता तोड़कर रिश्ता जोड़िए’|

मैं यहाँ संदर्भ के लिए बताना चाहूँगा कि मेरे बचपन से लेकर कुछ प्रारंभिक नौकरियां करने तक का समय, दिल्ली-शाहदरा में बीता जहां ‘इंद्र’ जी श्याम लाल कालेज में पढ़ाते थे| वहीं कवि गोष्ठियों में उनसे मिलने का सिलसिला प्रारंभ हुआ, मेरे वरिष्ठ कवि मित्र- श्री धनंजय सिंह के माध्यम से ही मेरा अधिकांश कवियों से मिलना हुआ और इंद्र जी से मुलाक़ात भी उनके माध्यम से ही हुई|


एकांत साधना क्या होती है, इसका उदाहरण मुझे इंद्र जी के जीवन में ही देखने को मिला| मैं भी उस समय थोड़ा बहुत गीत आदि लिख लेता था, और उसके लिए मुझे इंद्र जी जैसे अत्यंत वरिष्ठ कवि से जो प्रशंसा मिलती थी, उसको सुनकर मैं वास्तव में शर्मिंदा महसूस करता था| मैं काफी कम बोलता हूँ, इस पर इंद्र जी कहते थे ‘क्या तुमने कसम खाई है कि, जब बोलोगे गीत ही बोलोगे’!


खैर दिल्ली मैंने बहुत पहले 1980 में छोड़ दी थी, अतः लंबे समय से मैं इंद्र जी से संपर्क में नहीं था| इतना अवश्य कहना चाहता हूँ कि इंद्र जी की धर्मपत्नी का बहुत पहले स्वर्गवास हो चुका था और उनके बेटे भी उनके पास नहीं रहते थे, एक पुत्री थी जो उस समय जवान होने को थी लेकिन मानसिक रूप से अविकसित थी, बच्चों जैसी हरकतें करती थी, बाद में क्या स्थिति हुई पता नहीं, उस बच्ची के कारण वे कहीं जा भी नहीं पाते थे, ऐसे में वह क्या लगन थी जो उनसे निरंतर गीत लिखवाती जाती थी!


दिल्ली छोड़ने के बाद की एक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा, मैं उस समय हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की खेतड़ी इकाई में काम करता था| मैंने चाहा कि इंद्र जी जैसे श्रेष्ठ रचनाकारों को भी कविता के मंच पर आना चाहिए| मैंने उनसे निवेदन किया तो उनकी शर्त वही थी, जिसे मैं जानता था, उन्होंने कहा कि मैं कोई मानदेय नहीं लूँगा| वे मानते थे कि कविता तो उनकी मानस-पुत्री है और बेटी की कमाई नहीं खानी चाहिए| खैर वे आयोजन में आए और हमने उनका सम्मान करने का सौभाग्य प्राप्त किया| यह संभवतः 1987 की बात है|


इंद्र जी के अनेक काव्य संकलन प्रकाशित हुए हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने नवगीत, ग़ज़ल और दोहे- सभी क्षेत्रों में अपना उत्कृष्ट योगदान किया है|


बातें तो बहुत सारी हो सकती हैं, उस एकांत साधना करने वाले नवगीत विधा के शिखर पुरुष के संबंध में, परंतु मैं यहाँ उनका एक गीत शेयर करके उनको अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहूँगा-


फूलों के बिस्तर पर
नींद क्यों नहीं आती,
चलो, कहीं सूली पर, सेज हम बिछाएँ ।

दूर-दूर तक कोई
नदी नहीं दिखती है ।
हिरणों की आँखों में
रेत प्यास लिखती है ।
घाटी में हँसते हैं,
बुत ही बुत पत्थर के,
चलो, कहीं सूने में, ख़ुद से बतियाएँ ।


आग हुई धुआँ-धुआँ
अँधियारा गहराया ।
पेड़ों पर पसर गया
गाढ़ा काला साया ।
आगे है मोड़ों पर
बियाबान सन्नाटा
चलो, कहीं पिछली पगडण्डी गुहराएँ ।


तुम से जो मुमकिन था
अभिनय वह ख़ूब किया ।
वह देखो सूर्यध्वज
जुगनू ने थाम लिया ।
मंच पर उभरने को
एक भीड़ आतुर है,
चलो, कहीं पर्दे के पीछे छिप जाएँ ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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Faith, Belief and Motivation!

We humans are one of the millions of species that exist in the universe. We keep thinking about our life, aims and how to achieve our goals, how to succeed in life. Do we ever think whether other living beings also have some goals, dreams or aspirations in life and whether they are on the right path to achieve them!



Among the many things, items and devices man has created or invented, I think robots fit in the space, that we human beings occupy amongst the creations of God. Though I have not come across any complete Robot yet, only seen them in movies etc. In some stories we witnessed that the robot didn’t perform as per its programming. I wonder God almighty might also be thinking after seeing our performance that this person is not performing as per the original programming!


Anyway, it is a fact that we are the special creatures in the universe, God almighty loves us and created us to do some special things in the world and make our planet a better place to live, while achieving our personal goals also.


Every individual has his own individual goals and also a role in making this world worth living in some way or the other. We all work for each other in some way or the other and in this way achieve the goals set for ourselves and help the society to perform better.


In any case everybody first thinks about his or her own well being and that of the individual family. Human life is such a complicated thing that nobody else can guide us in every field. There is no set formula that everybody can follow in his or her life to achieve success.


The only thing is that we learn from the examples of other people. Like some scientist who failed 100 times, he said now I know that these 100 ways are not to be used for achieving this goal. A political leader who lost elections at every level, finally became the President of America.
So, the basic thing is that we must keep trying, keep our hopes alive, be prepared to accept challenges, study our own conditions and requirements and make own progression plan.

While doing all that we can learn from the lives of other people, not necessarily from the rich and powerful people, but also from other ordinary people, from their success and failures.


Yes, in this process, the motivational and self-help books might prove helpful to some extent, since these normally are based on real life examples and personal experiences of many people. The vital part of it, that I too believe is that faith makes the biggest contribution in our success. If we ourselves accept defeat, then nobody can make us succeed and like we have read so many times, ‘One becomes the way he or she believes’. Our belief and faith make the biggest contribution in our success. What else do we have to supplement our efforts in achieving our goals.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Is life as simple and promising as our motivational and self-help books think? #FacileOptimism


Thanks for reading.

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