गीत ऋषि- देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’

आज के समय में काव्य-लेखन को साधना का नाम देने का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता| आज अधिकांश लोग लिखना शुरू करते हैं तो उनके सामने एक लक्ष्य होता है, वह मंच हो या किसी अन्य प्रकार से प्रकाशन-प्रसारण आदि के माध्यम से कमाई और ख्याति अर्जित करना|

इन परिस्थितियों में स्वर्गीय देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ जी जैसे लोग आज की दुनिया में लगभग नहीं के बराबर हैं| मेरे साहित्यिक मित्र श्री योगेंद्र दत्त शर्मा के, फेसबुक में लिखे गए आलेख के माध्यम से ज्ञात हुआ कि श्री देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ जी नहीं रहे, जीवन है तो मृत्यु भी इससे जुड़ी एक सच्चाई है, परंतु यह समाचार सुनकर कुछ पुरानी यादें उमड़ आईं, इस बहाने से आज मैं कविता और विशेष रूप से नवगीत को समर्पित इस महान व्यक्तित्व का स्मरण करना चाहूँगा, जिन्होंने आज भी काव्य-लेखन को एक साधना का रूप दिया हुआ था|

एक बात और बताना चाहूँगा, मेरा विवाह भी इंद्र जी ने अपनी रिश्तेदारी में करा दिया था और इस प्रकार हम रिश्तेदार भी थे, परंतु इंद्र जी का रिश्तों की औपचारिकता में बिल्कुल विश्वास नहीं था, वे बोलते थे- ‘रिश्ता तोड़कर रिश्ता जोड़िए’|

मैं यहाँ संदर्भ के लिए बताना चाहूँगा कि मेरे बचपन से लेकर कुछ प्रारंभिक नौकरियां करने तक का समय, दिल्ली-शाहदरा में बीता जहां ‘इंद्र’ जी श्याम लाल कालेज में पढ़ाते थे| वहीं कवि गोष्ठियों में उनसे मिलने का सिलसिला प्रारंभ हुआ, मेरे वरिष्ठ कवि मित्र- श्री धनंजय सिंह के माध्यम से ही मेरा अधिकांश कवियों से मिलना हुआ और इंद्र जी से मुलाक़ात भी उनके माध्यम से ही हुई|


एकांत साधना क्या होती है, इसका उदाहरण मुझे इंद्र जी के जीवन में ही देखने को मिला| मैं भी उस समय थोड़ा बहुत गीत आदि लिख लेता था, और उसके लिए मुझे इंद्र जी जैसे अत्यंत वरिष्ठ कवि से जो प्रशंसा मिलती थी, उसको सुनकर मैं वास्तव में शर्मिंदा महसूस करता था| मैं काफी कम बोलता हूँ, इस पर इंद्र जी कहते थे ‘क्या तुमने कसम खाई है कि, जब बोलोगे गीत ही बोलोगे’!


खैर दिल्ली मैंने बहुत पहले 1980 में छोड़ दी थी, अतः लंबे समय से मैं इंद्र जी से संपर्क में नहीं था| इतना अवश्य कहना चाहता हूँ कि इंद्र जी की धर्मपत्नी का बहुत पहले स्वर्गवास हो चुका था और उनके बेटे भी उनके पास नहीं रहते थे, एक पुत्री थी जो उस समय जवान होने को थी लेकिन मानसिक रूप से अविकसित थी, बच्चों जैसी हरकतें करती थी, बाद में क्या स्थिति हुई पता नहीं, उस बच्ची के कारण वे कहीं जा भी नहीं पाते थे, ऐसे में वह क्या लगन थी जो उनसे निरंतर गीत लिखवाती जाती थी!


दिल्ली छोड़ने के बाद की एक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा, मैं उस समय हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की खेतड़ी इकाई में काम करता था| मैंने चाहा कि इंद्र जी जैसे श्रेष्ठ रचनाकारों को भी कविता के मंच पर आना चाहिए| मैंने उनसे निवेदन किया तो उनकी शर्त वही थी, जिसे मैं जानता था, उन्होंने कहा कि मैं कोई मानदेय नहीं लूँगा| वे मानते थे कि कविता तो उनकी मानस-पुत्री है और बेटी की कमाई नहीं खानी चाहिए| खैर वे आयोजन में आए और हमने उनका सम्मान करने का सौभाग्य प्राप्त किया| यह संभवतः 1987 की बात है|


इंद्र जी के अनेक काव्य संकलन प्रकाशित हुए हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने नवगीत, ग़ज़ल और दोहे- सभी क्षेत्रों में अपना उत्कृष्ट योगदान किया है|


बातें तो बहुत सारी हो सकती हैं, उस एकांत साधना करने वाले नवगीत विधा के शिखर पुरुष के संबंध में, परंतु मैं यहाँ उनका एक गीत शेयर करके उनको अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहूँगा-


फूलों के बिस्तर पर
नींद क्यों नहीं आती,
चलो, कहीं सूली पर, सेज हम बिछाएँ ।

दूर-दूर तक कोई
नदी नहीं दिखती है ।
हिरणों की आँखों में
रेत प्यास लिखती है ।
घाटी में हँसते हैं,
बुत ही बुत पत्थर के,
चलो, कहीं सूने में, ख़ुद से बतियाएँ ।


आग हुई धुआँ-धुआँ
अँधियारा गहराया ।
पेड़ों पर पसर गया
गाढ़ा काला साया ।
आगे है मोड़ों पर
बियाबान सन्नाटा
चलो, कहीं पिछली पगडण्डी गुहराएँ ।


तुम से जो मुमकिन था
अभिनय वह ख़ूब किया ।
वह देखो सूर्यध्वज
जुगनू ने थाम लिया ।
मंच पर उभरने को
एक भीड़ आतुर है,
चलो, कहीं पर्दे के पीछे छिप जाएँ ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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