अणु-अणु का कंपन जान चली!

मैंने छायावाद युग के कीर्तिस्तंभ रहे महाकवियों पंत, प्रसाद और निराला जी की एक-एक रचना शेयर करते हुए उस युग की एक झलक दिखाने का प्रयास किया था| बाद में मुझे खयाल आया कि महादेवी जी को शामिल किए बिना तो छायावाद युग की एक झलक देना भी संभव नहीं है| फिर जैसे मैंने निराला जी की उदारता और फक्कड़पन का उल्लेख किया था, उनको इस फक्कड़पन के बावजूद संभाले रखने में भी महादेवी जी का बहुत बड़ा हाथ है| उनके बीच जैसा स्नेह था, वैसा आज के कवियों के बीच कम ही देखने को मिलता है|
महादेवी जी की आज की इस रचना में उन्होंने जीवन के सभी पक्षों के आस्वादन के अनुभव का बहुत सुंदर वर्णन किया है –



अलि, मैं कण-कण को जान चली
सबका क्रन्दन पहचान चली|

जो दृग में हीरक-जल भरते
जो चितवन इन्द्रधनुष करते,
टूटे सपनों के मनकों से
जो सूखे अधरों पर झरते|


जिस मुक्ताहल में मेघ भरे
जो तारों के तृण में उतरे,
मैं नभ के रज के रस-विष के
आँसू के सब रंग जान चली।

जिसका मीठा-तीखा दंशन,
अंगों मे भरता सुख-सिहरन,
जो पग में चुभकर, कर देता
जर्जर मानस, चिर आहत मन;


जो मृदु फूलों के स्पंदन से
जो पैना एकाकीपन से,
मैं उपवन निर्जन पथ के हर
कंटक का मृदु मत जान चली।

गति का दे चिर वरदान चली।
जो जल में विद्युत-प्यास भरा
जो आतप में जल-जल निखरा,
जो झरते फूलो पर देता
निज चंदन-सी ममता बिखरा;


जो आँसू में धुल-धुल उजला;
जो निष्ठुर चरणों का कुचला,
मैं मरु उर्वर में कसक भरे
अणु-अणु का कंपन जान चली,
प्रति पग को कर लयवान चली।

नभ मेरा सपना स्वर्ण रजत
जग संगी अपना चिर विस्मित
यह शूल-फूल कर चिर नूतन
पथ, मेरी साधों से निर्मित,


इन आँखों के रस से गीली
रज भी है दिल से गर्वीली
मैं सुख से चंचल दुख-बोझिल
क्षण-क्षण का जीवन जान चली!
मिटने को कर निर्माण चली!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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