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कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं!

दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यिक कवि थे और आपात्काल के दौरान जब उन्होंने एक के बाद एक विद्रोह के स्वरों को गुंजाने वाली ग़ज़लें लिखीं, तब वे जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए| मुझे याद है उस समय कमलेश्वर जी साहित्यिक पत्रिका – ‘सारिका’ में निरंतर ये ग़ज़लें प्रकाशित करते थे और बाद में इनको ‘साये में धूप’ नामक संकलन में सम्मिलित किया गया|


लीजिए प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी की यह ग़ज़ल-

पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं,
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं|

इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो,
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं|

बूँद टपकी थी मगर वो बूँदो—बारिश और है,
ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं|

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है,
पत्थरों में चीख़ हर्गिज़ कारगर होगी नहीं|


आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिये जायेंगे पर,
आपकी ताज़ीम में कोई कसर होगी नहीं|

सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की अस्लियत,
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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